You are here

8 विद्रोहियों की गिरफ्तारी के बाद भी पेरियार की धरती पर सुअरों को पहना ही दिया गया जनेऊ

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

पेरियार रामास्वामी नायकर की धरती से एक क्रांतिकारी विद्रोह का आगाज हुआ है. ब्राह्मणवादियों के जनेऊ नेक्सस या जनेऊ गठजोड़ के कारण गैरबराबरी और जातिवाद से ग्रसित समाज ने 7 अगस्त को तमिलनाडु में सुअरों का उपनयन संस्कार कर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज कराया।

टीपीडीके संगठन का क्रांतिकारी कदम- 

तमिलनाडु के संगठन Thanthai Periyar Dravidar Kazhagam (TPDK) ने एक पोस्टर जारी करके घोषणा की थी कि 7 अगस्त को चेन्नई के संस्कृत कॉलेज में सुअरों को ब्राह्मणों का पवित्र धागा यानि जनेऊ पहनाया जाएगा। इस प्रदर्शन को ‘Panrikku Poonool podum porattum’, नाम दिया गया।

इसी घोषणा के तहत तमिलनाडु में जातिवाद से पीड़ित समाज ने जातिवादी दंश का विरोध करते हुए सुअरों का उपनयन संस्कार किया। इसके खिलाफ ‘थंथई पेरियार द्रविडर कझगम’ के आठ लोगों को शहर की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

डेक्कन क्रॉनिकल की खबर के अनुसार, ‘थंथई पेरियर द्रविडर कझगम’ नामक सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं ने ब्राह्मणवाद के विरोध स्वरूप सुअरों को जनेऊ पहनाया। फ्रिंज यूनिट के स्वयंसेवक लगभग 10 बजे रॉयापेटा में इकट्टा हुए और सुअर के चार बच्चों को लेकर आए लेकिन पुलिस कर्मियों से उनकी झड़प हो गई।

इसी बीच एक कार्यकर्ता ने सुअर को जनेऊ पहना ही दिया। इसके बाद संगठन के 8 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

रॉयापेटा पुलिस ने बताया कि आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143 , 147 , 188, 153 ए (धर्म, वंश आदि) और पशु क्रूरता अधिनियम 1960 की रोकथाम के तहत मामला दर्ज कर आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

इसे भी पढ़ें- पढ़िए, कैसे पिछड़ों को मानसिक गुलाम बनाकर उनके अंदर से संघर्ष की ताकत खत्म कर दी जाती है !

7 अगस्त ही क्यों चुना गया था ? 

इस विरोध प्रदर्शन के आयोजकों ने बताया कि 7 अगस्त को इस कार्यक्रम को रखने के पीछे एक खास मकसद था। दरअसल सात अगस्त को तमिलनाडु के ब्राह्मणों का पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन तमिलनाडु के ब्राह्मण वार्षिक समारोह करके पवित्र धागा यानि जनेऊ बदलते हैं। इसलिए हमने इसी दिन इस जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन स्वरूप सुअर को जनेऊ पहनाया।

इसे भी पढ़ें-राष्ट्रपति चुनाव के बाद फिर उठी मांग, लोकतंत्र बचाने के लिए EVM बैन करो या आधार कार्ड से लिंक करो

जनेऊ पर टारगेट क्यों ? 

टीपीडीके संगठन के चेन्नई अध्यक्ष एस कुमारन कहते हैं कि ब्राह्मण जनेऊ पहनकर अपने आप को अन्य समाज से अलग और श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश करते हैं और चार वर्णों के सिस्टम को मजबूती से निभाते हुए दलितों के साथ भेदभाव करते हैं इसलिए हम एक जानवर को जिसे ये लोग गंदा समझते हैं उसे जनेऊ पहनाएंगे।

इसे भी पढ़ें-OBC पीएम का कैबिनेट सचिवालय बना जातिवाद का अड्डा, 53 अधिकारियों में एक भी OBC नहीं

इसके अलावा एस कुमारन कहते हैं कि इस समय केन्द्र में संघ के लोग मजबूत होने से संघी ब्राह्मणों का अन्य वंचित जातियों के प्रति अत्याचार बहुत बढ़ गया है। इसलिए इस कार्यक्रम  को करना बहुत जरूरी हो गया था।

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा था कि कि-

टिप्पणी नम्बर – 1 

पेरियार की धरती से एक और अभिनव प्रयोग।

जनेऊ अगर किसी को पवित्र बनाता है, तो वराह में क्या बुराई है?

बलात्कारी, हत्यारे, ठग, डकैत, कालाबाजारिए, सभी जब जनेऊ पहनने के कारण समाज में श्रेष्ठ और सबसे ऊपर हैं, तो सूअर भी श्रेष्ठ बनेगा।

मेरी टिप्पणी – अब ऊँची जातियों को जन्म का अहंकार छोड़कर भारतीय गणराज्य का सामान्य नागरिक बन जाना चाहिए। संविधान निर्माता यही चाहते थे।

जाति अगर कर्म से तय होती, तो बलात्कारियों के जनेऊ परिवार वाले उतार लेते।

इसे भी पढ़ें-ये कौन सी योग्यता? हारी हुईं ईरानी के पास 2 मंत्रालय, 7वीं बार के MP संतोष गंगवार सिर्फ राज्यमंत्री

टिप्पणी नम्बर- 2

मशहूर लेखिका और एक्टिविस्ट मीना कंडासामी ने 2013 में काले रंग के जनेऊ के साथ तस्वीर डालकर एक साथ ब्राह्मण सत्ता और पुरुषसत्ता को चुनौती दी थी। तमिलनाडु में यह सब सांस्कृतिक जागरण का हिस्सा है।

अब वहाँ के पेरियारवादी लोग सूअरों का यज्ञोपवित यानी उपनयन संस्कार करना चाहते हैं। जाति का श्रेष्ठताबोध जब तक रहेगा, तब तक बहुसंख्यक लोग उसे चुनौती देते रहेंगे। राष्ट्रीय एकता के लिए जनेऊ का त्याग करें।

इसे भी पढ़ें-मेरिटवादियों इस आरक्षण के खिलाफ नहीं लगाओगे नारे, APOLLO हॉस्पीटल में सिर्फ ‘ब्राह्मणों’ को नौकरी

टिप्पणी नम्बर- 3 

क्या इन तस्वीरों से माल्या जी या भागवत जी की मानहानि होती है?

बल्कि यह धागा तो उनका जन्मजात गर्व है। यह उन्होंने अर्जित नहीं किया है। वे भ्रष्ट हैं तो भी पहनते हैं। समाज को तोड़ने जैसा गंदा काम करते हैं, तो भी पहनते हैं। हिंदू धर्म के 95% लोगों से अलग दिखाने वाली इस पहचान को वे गर्व से क्यों धारण करते हैं?

संविधान निर्माता इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोग जन्मगत श्रेष्ठताबोध से मुक्त नहीं हो पा रहे है। संविधान सभा के आख़िरी भाषण में 25 नवंबर, 1949 को बाबा साहेब ने जातिभेद को भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़े ख़तरों में बताया था।

तमिलनाडु में पेरियारवादियों ने शांतिपूर्ण प्रतिरोध के तौर पर, वराह को जनेऊ पहनाने का फ़ैसला किया है। जातिमुक्ति के लिए अब संघ और शंकराचार्यों को पहल करनी चाहिए। सवर्ण उन्हीं की बात सुनते हैं।

Related posts

Share
Share