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PM साहब! लाल किले से आकाश में हाथ घुमाकर भाषण देने से आप ज़िम्मेदारी से मुक्त थोड़े न हो जाएंगे !

नई दिल्ली। मृत्युंजय प्रभाकर (नेशनल जनमत) 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज परंपरा अनुसार दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया. यह एक ऐसी परंपरा है जो आज़ादी के वक़्त से चली आ रही है. आम तौर पर इसे प्रधानमंत्री अपने देश के लिए किए गए सरकार के योगदान, सरकारी योजनाओं की प्रगति, और भविष्य की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की चर्चा करते हैं.

इसके साथ ही समाज के अलग-अलग वर्गों की चिंताओं और उस क्षेत्र में किए जा रहे अपने प्रयासों को भी उजागर करते हैं. इनके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंधों पर सरकार अपने प्रयासों को जनता के सामने रखने का काम करती है.

ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश के 70वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में किन मुद्दों को स्थान दिया. उससे ही यह स्पष्ट होगा कि सरकार की दशा-दिशा क्या है और वो आगे क्या करने का इरादा रखती है.

मोदी सरकार के अब तक के तीन साल के कार्यकाल में तीन मास्टरस्ट्रोक हैं या उसे सरकार और उसके लोगों ने मास्टरस्ट्रोक की तरह प्रोजेक्ट किया है.

पहला ‘सर्जिकल स्ट्राइक’. पहला मास्टर स्ट्रोक था. पाकिस्तान के साथ बनते बिगड़ते संबंधों और निरंतर हो रही आतंकवादी घटनाओं और सीमा पर गोली बारी के बीच सेना द्वारा किए गए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की रूटीन कार्यवाई की इस सरकार ने खूब वाहवाही लूटी थी. पाकिस्तान को लेकर यदा-कदा आज भी सरकारी पार्टी के प्रवक्ता कड़े बोल और तेवर दिखाते रहते हैं.

लेकिन अफ़सोस कि आज जब चीन भारत के सीमा क्षेत्र के आस-पास पिछले 2 महीनों से लगातार हठधर्मी दिखा रहा है और न सिर्फ चीनी समाचारपत्र बल्कि उसके राष्ट्रपति तक भारत के खिलाफ सीधे तौर पर अल्टीमेटम दे रहे हैं, ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री की तरफ से उस पर कोई बयान न देना न सिर्फ आश्चर्यजनक है बल्कि एक गहरी आशंका को भी जन्म देता है.

पिछले 2 महीनों से देश का हर वो शख्स जो थोड़ा-बहुत भी देश की फ़िक्र करता हो, इस आशंका से वशीभूत है कि क्या चीन और भारत एक और लड़ाई के मुहाने पर हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री को स्पष्ट रूप से देश को यह बताना चाहिए था कि आखिर चीन से तनातनी का रूप क्या है और सरकार उसे सुलझाने के लिए क्या सब कदम उठा रही है. ऐसी कोई बात न करके प्रधानमंत्री ने उन आशंकाओं को और बल ही प्रदान किया है जो देश भर के चौक-चौराहों पर उठते आ रहे हैं.

अब बात उनकी करते हैं जो प्रधानमंत्री ने कहा.

दूसरा मास्टरस्ट्रोक ‘नोटबंदी’ रही है. ‘नोटबंदी’ से जाने कितने ही तरह के फायदे देश को समझाए गए थे. आतंकवाद और भ्रष्टाचार का खात्मा उसमें से सबसे प्रमुख फायदे गिनाए गए थे.

नोटबंदी के एक साल बाद नतीजे सबके सामने हैं. प्रधानमंत्री इस पर अब चुप हैं. उन्होंने देश को इस बार कैशलेस और लेसकैश इकोनोमी में ले जाने के फायदे भी नहीं गिनाए. गिनाया तो सिर्फ इतना कि ३ लाख करोड़ बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गया है. वही जो नोटबंदी के वक़्त उम्मीद व्यक्त की गई थी कि इतना काला धन बैंक में वापस आएगा.

लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है. प्रधानमंत्री एक निजी एजेंसी ‘मार्ग’ के हवाले से यह बोल रहे हैं. आश्चर्य की बात है कि आरबीआई इस मसले पर चुप है. उसने नोट गिनने वाले मशीन खरीदने के लिए निविदा आमंत्रित किया है. अभी पिछले हफ्ते ही वित्त राज्यमंत्री अर्जुन मेघवाल संसद में पूछे गए सवाल पर सिर्फ इतना बता पाए कि अभी नोटों की गिनती शुरू भी नहीं हुई है.

अब सवाल उठता है कि जो आंकड़ा वित्त मंत्रालय के पास नहीं है वो प्रधानमंत्री के पास कहाँ से आ गया? क्या आरबीआई वित्त मंत्रालय को कोई और जवाब देती है और प्रधानमंत्री को कोई और? या कि संसद में जैसे मंत्री सवाल के जवाब में झूठ बोलकर काम चलाने लगे हैं वैसे ही प्रधानमंत्री अब लाल किला से भी जनता को झूठ बोल रहे हैं?

तीसरा मास्टरस्ट्रोक जीएसटी  एक देश एक टैक्स बोलकर और इसके जाने कैसे-कैसे फायदे गिनाकर इसे लागू करवाया गया. आश्वाशन दिए गए कि ये-ये चीज़ें सस्ती हो जाएँगी. जनता को इसका फायदा होगा. प्रधानमंत्री को यह बताना चाहिए था कि जीएसटी का कितना लाभ पिछलेमहीने से अब तक जनता को मिला है. किन वस्तुओं के दाम कम हुए और आगे क्या होने वाला है.

अफ़सोस कि प्रधानमंत्री ने इस पर कुछ भी बोलना मुनासिब नहीं समझा. उन्होंने बस अपनी ही पुरानी बात दोहरा दी कि एक लाख पचहत्तर हजार फरजी कंपनियां बंद हो गईं. यह आंकड़ा पहले से विवादित है. आज तक सरकार ने ऐसी कोई लिस्ट जारी नहीं की. अगर बंद हुई भी तो देश को इसका क्या फायदा हुआ? उन्हें यह भी बताना चाहिए था.

प्रधानमंत्री ने लाल किला के प्राचीर से कहा कि अब हमारे नौजवान लोगों को रोजगार देंगे. प्रधनमंत्री जी इसके साथ यह बताना भूल गए कि ‘स्टार्ट अप इंडिया’ कहाँ गिरा हुआ है. देश भर में कितने स्टार्ट अप शुरू हुए और कहाँ पहुंचे? ‘मेक इन इंडिया’ स्लोगन से देश में कितना उत्पादन बढ़ा है? जबकि फैक्ट्री उत्पादन में देश का रिपोर्ट नेगेटिव जा रहा है.

महिमामंडित योजनाओं का हश्र भी तो बताइए- 

आखिर धूम-धाम से शुरू की गई सरकारी योजनायों का क्या हस्र हुआ? क्या यह जानना जनता का हक नहीं है कि उसके पैसे जिन योजनाओं पर पिछले सालों में लुटाये गए वो किस गति को प्राप्त हुए. अरबों का विज्ञापन देकर देश और जनता को क्या मिला? रोजगार देने में सरकार की नियत और निति दोनों पर सवाल उठ रहे हैं. लाखों-लाख नौकरियां ख़त्म की जा रही हैं.

हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाली मोदी सरकार पिछले साल मात्र १६ हज़ार लोगों को नौकरी दे पाई. ऊपर से नोटबंदी से 2 करोड़ से भी ज्यादा लोग गैर-नियोजित ढांचे में बेरोजगार हुए सो अलग. ऐसे में नौजवान अब लोगों को रोजगार देंगे कहना उनके जख्म पर नमक छिड़कने के बराबर ही है.

मोदी सरकार इस नारे के साथ चुनकर आई थी कि किसानों के उपज मूल्य में अगले ५ साल में तीन गुनी बढ़ोतरी करेगी. वादे के हिसाब से यह लक्ष्य 2019 में पूरा करना था. लेकिन मोदी जी अब उसके लिए २०२२ का लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं. इसका सीधा सा मतलब है कि उन्होंने मान लिया है कि 2019 तक वो यह नहीं कर पाएंगे. देश भर में किसानों की दुर्दशा छुपी हुई नहीं है.

अंबानी के बच्चों से तो मिले किसानों से कब मिलेंगे?

बीजेपी शासित राज्यों में ही किसान आत्महत्या सबसे भयावह रूप में सामने आई है. महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक इसके बड़े उदाहरण हैं. ऐसे में अपने ही लक्ष्य से मुकरना यह दिखाता है कि यह सरकार किसानों को लेकर कितनी संवेदनशील है. जिस प्रधानमंत्री के पास मुकेश अम्बानी के बच्चों से मिलने की फुर्सत हो, क्रिकेटरों और अभिनेताओं से मिलने की फुर्सत हो वह महीनों तक तमिलनाडू से आये किसानों से मिलने का समय नहीं निकाल पाता. मोदी जी अफ़सोस से यह कहना पड़ रहा है कि आप लाल किले के प्राचीर से जो झूठ बोल रहे हो वह मान्य नहीं है.

सबसे मजेदार बात जो प्रधानमंत्री मोदी जी ने कही वह यह कि ‘आस्था के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और अब भारत छोड़ो नहीं भारत जोड़ो के नारे का समय है. आह, आपकी इस अदा पर देश क्यों न कुर्बान हो जाए. अब इस देश को और इसके प्रधानमंत्री को क्या यह भी बताना पड़ेगा कि आस्था के नाम पर हिंसा करने वाले कौन हैं. कौन हैं जो देश जोड़ने की जगह देश तोड़ने वाली हरक़तें दिन रात करते रहते हैं. इसके लिए प्रधानमंत्री सिर्फ उनके त्वीट्स ही देख लेते तो उन्हें पता चल जाता जिनको वो ट्वीटर पर फॉलो करते हैं.

इससे भी मजेदार बात उन्होंने काश्मीर को लेकर कही कि गाली और गोली से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता. क्या प्रधानमंत्री जी यह कहना चाहते हैं कि काश्मीर में मासूमों पर सेना द्वारा चलाए गए पैलेट गन अपने आप चल गए? या वो ये कहना चाहते हैं कि पाकिस्तान की तरह भारतीय सेना भी अब सरकार के नियंत्रण के बाहर है?

क्या हम यह समझें कि काश्मीर में जो बीजेपी शासन में है और जो केंद्र में बीजेपी शासन में है उन दोनों से प्रधानमंत्री का कोई लेना-देना नहीं है. फिर वो दिन-रात किसका प्रचार करते घूमते हैं. या वो ये कह रहे हैं कि वो मात्र नाम मात्र के प्रधानमंत्री हैं. उनसे कुछ संभल नहीं रहा.

अरे प्रधानमंत्री जी कम से कम अपने किए को तो हिम्मत से स्वीकार कीजिए. गलती हुई हो तो माफ़ी मांगिए और फिर नीतियों में फेर-बदल कीजिए. ये आकाश में हाथ घुमाकर बोल देने से आप ज़िम्मेदारी से मुक्त थोड़े न हो जाएंगे!

(लेखक मृत्युंजय प्रभाकर रंगकर्मी, लेखक और सामाजिक चिंतक हैं)

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