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राष्ट्रपति चुनाव: पढ़िए उ.प्र. के विधायक के वोट की कीमत क्यों है देश में सबसे अधिक ?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी  तेज हो गई हैं. भाजपा ने राजनीतिक दलों की घेरेबंदी भी शुरू कर दी है. इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शिव सेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से बातचीत भी हुई है. कांग्रेस भी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपनी राजनीति को धार देने में जुट गई है. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक टीकाकार  जेन साहब उस्मानी ने कुछ महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं.

राष्ट्रपति का चुनाव 17 जुलाई को होना है. नामांकन करने की अंतिम तिथि 28 जून तक है. दोनों मुख्य दलों की ओर से प्रत्याशी फाइनल हैं.  जहां NDA की ओर से बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद हैं तो वहीं UPA की ओर से बिहार की बेटी एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार हैं जिनके पिता जवाहर लाल नेहरू के कैबिनेट से लेकर मुरार जी देसाई की सरकार में उप प्रधानमंत्री रह चुके हैं, जिनके नाम एक और बड़ा रिकार्ड है सबसे अधिक समय तक केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने का.

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इस बार राष्ट्रपति चुनाव में क्या है सामाजिक – राजनीतिक समीकरण- 

इस बार राष्ट्रपति चुनाव में एक और बात बहुत मजेदार दिखाई पड़ रहा है. दोनों दलों की ओर से दलित प्रत्याशी उतारकर दलित वोट बैंक को आगामी लोकसभा चुनाव में अपने-अपने पाले में करने की जोरदार कोशिश हो रही है और कौन कितना कामयाब होता है ये तो 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद साफ़ होगा.

कोविंद की जीत लगभग तय है, नीतीश का भी है कोविंद का समर्थन- 

जहां वोट की बात है तो अब-तक तो ये साफ़ हो चुका है की NDA के प्रत्याशी कोविंद की जीत तय है और इस में NDA को पांच विपक्षी दलों का भी समर्थन प्राप्त है TRS, YSRCP, AIADMK, BJD और संघ मुक्त राजनीति की हुंकार भरने वाले नीतीश कुमार की JDU का भी समर्थन प्राप्त है. समर्थन देने वाले दलों में YSRCP को छोड़कर चारों दल अपने अपने राज्यों में सत्ता में है जिससे NDA की राह आसान हो चुकी है. UPA सहित 17 दलों की ओर से एक प्रत्याशी उतारकर मजबूत विपक्ष होने का संदेश जनता तक जा चुका है और विपक्ष के इस निर्णय से 2019 के लोकसभा चुनाव में NDA के विरुद्ध एक मजबूत गैर भाजपा गठबंधन बनने की रूपरेखा भी दिखाई दे रही है.

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राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा सांसद ,राज्यसभा सांसद और विधायक देते हैं वोट- 

राष्ट्रपति चुनाव में संसद के दोनों सदनों के चुने गए सदस्य वोट देते हैं. फिलहाल लोकसभा में 543 और राज्यसभा में 233 यानी कुल 776 निर्वाचित सदस्य हैं. इसके अलावा देश की सभी विधानसभाओं के 4120 सदस्य भी राष्ट्रपति के चुनाव में वोट देंगे. इनमें दिल्ली और पांडुचेरी के भी विधायक शामिल हैं. किसी राज्य के एक विधायक के वोट की कीमत राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होती है. एक विधायक के वोट की कीमत 1971 की जनगणना और राज्यों में विधायकों की संख्या के आधार पर तय की जाती है.

इसका फॉर्मूला है- राज्य की जनसंख्या (1971 में)/विधायकों की संख्या×1000 उदाहरण के तौर पर यूपी के विधायक के वोट का मूल्य 208 है जो की सबसे अधिक है. वहीं सिक्किम के विधायक के वोट का मूल्य महज 7 है. सभी विधायकों के कुल वोटों के मूल्य जितना ही सांसदों के वोटों का मूल्य होता है.

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ऐसे निकाला जाता है एक विधायक के मत का मूल्य- 

राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू यानी संख्या निकालने के लिए:- 1971 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या को वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाए, परिणाम में जो भी संख्या आए, उसे फिर से 1000 से भाग दिया जाए. इसके बाद जो परिणाम निकलेगा, वह उस राज्य के एक विधायक के वोट की वैल्यू होगी. इस तरह प्रत्येक राज्य के विधायकों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.

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ऐसे निकाला जाता है एक सांसद के मत का मूल्य- 

सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए:- सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या को जोड़ते हैं. लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को जोड़कर जो परिणाम आए, उससे राज्यों के कुल वोट में भाग देते हैं. इससे जो परिणाम आए, वह एक सांसद के वोट की वैल्यू होगी. कुल सांसदों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों की संख्या को एक सांसद के वोट की वैल्यू से गुणा करते हैं. अब राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों और कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू जोड़ेंगे, जो परिणाम आए, वह मतदान में कुल पड़ने वाले वोटों की संख्या है.

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