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पढ़िए प्राइमरी मास्टरों की व्यथा-कथा, “नया नया जोश है, मास्साब ! थोड़े दिन में ठंडा पड़ जाएगा….”

नई दिल्ली/लखनऊ। नेशनल जनमत ब्यूरो 

प्राथमिक विद्यालय के अध्यापकों यानि प्राइमरी मास्टर और मास्टरनियों के बारे में एक आम राय है कि ये पढ़ाते नहीं हैं, मुफ्त की सैलरी लेते हैं और मौज करते हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं लेकिन नई उम्र के जो लड़के-लड़की अध्यापक बन रहे हैं उनमें पढ़ाने की ललक भी है और स्कूल को संवारने की भी। बात बस वही है कि गेहूं के साथ घुन भी पिस रहा है।

प्राथमिक अध्यापकों की व्यथा को लेकर ऐसा ही एक पत्र सोशल मीडिया में जबरदस्त वायरल हुआ है। इसके लेखक तो ज्ञात नहीं हैं लेकिन बहुत मार्मिक और सच्चाई के साथ लिखा गया है। आप भी पढ़कर देखिए-

पत्र का कंटेंट यूपी के अलग अलग हिस्सों के सरकारी स्कूलों के अध्यापको के अलग अलग अनुभव से संकलित है-

प्रिय मुख्यमंत्री महोदय,

उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था सुधारने की आप की पहल अत्यंत ही स्वागतयोग्य कदम है। महोदय सामान्यतय: समाज में सरकारी मास्टर की प्रायोजित छवि एक नाकारा, हरामखोर टाइप व्यक्ति की बनाई जाती है। एक सरकारी प्राइमरी स्कूल का अध्यापक आप से कुछ अपने मन की बात साझा करना चाहता है।

मेहनत से पढ़ाई की, CTET, UPTET पास किया और मेरिट में आया तो ये नौकरी मिली। बहुत कुछ करना चाहता था मगर नियुक्ति पत्र मिलने से पहले किस विद्यालय पर जाना है, इसका निर्धारण “विशेष व्यवस्था” के तहत हुआ और चूंकी ईमानदारी का कीड़ा मेरे अंदर था अतः उस विशेष व्यवस्था का हिस्सा नही बना और अपने मकान से 50 किलोमीटर दूर का एक विद्यालय मिला।

फिर भी खुश था की “कर्तव्य पथ पर जो मिला यह भी सही, वह भी सही”, गुनगुनाते हुए ज्वाइन करने गया तो मेरे एक वरिष्ठ की टिप्पणी थी “नया नया जोश है थोड़े दिन में ठंढा हो जाएगा”। मैने ये सोचा की मेरे वरिष्ठ काम नही करना चाहते इसलिए ऐसा कह रहे हैं।

नौकरी का पहला दिन- 

महोदय अब अपना पहला दिन बताता हूं। अपने घर से 50 किलोमीटर दूर अनजान गांव में, सुबह सुबह स्कूल गया तो हमारे हेडमास्टर साहब झाड़ू कुदाल लेकर स्कूल साफ कर रहे थे। समय का तकाजा देखते हुए मैने भी सफाई के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्होने मुस्कराते हुए कहा “माटसाहब आदत डाल लीजिये”। मैने पूछा सफाई कर्मचारी कहा है? वो आता है 10-15 दिन में एक बार। मैने कहा कम्प्लेन कीजिये विभाग में।

फिर वही जबाब मिला “नया नया जोश है ठंडा हो जाएगा मास्टरसाहब….। बाद में उन्होंने बताया कि स्थानीय नेताओं के घर सफाईकर्मी काम करता है, हम इतनी दूर इस गांव में लड़ाई कैसे करें? विभाग में ऊपर तक पहुंंच है नेता जी की। जैसे तैसे कुछ बच्चे आये और एक बारामदे में बैठकर शोर मचाने लगे मैने कहा एक से पांच तक अलग अलग बैठाते हैं जबाब मिला “नया नया जोश……..”।

वैसे बाद में समझ आया कि अध्यापक दो हैं कमरे तीन हैं और पढ़ाना 1 से 5 तक के लड़कों को है। तीन कमरों में से एक को गांव के किसी व्यक्ति ने कब्जा किया था। एक कि हालत ऐसी थी कि फर्श टूटा ऊपर से छत टपक रही थी। खैर कुछ छात्रों को एकमात्र बचे अपेक्षाकृत अच्छे कमरे में बैठाया और कुछ को सामने के बागीचे में आम के पेड़ के नीचे झाड़ू लगा कर।

स्वयंभू पत्रकारों का ख्याल आया तो झाड़ू उठा ली- 

एक बच्चे ने कहा गुरु जी दीजिये मैं झाड़ू लगा दूँ, तो अचानक याद आया की हर गली में कैमरे लेकर पत्रकार टाईप वीर घूम रहै हैं, बच्चे से झाड़ू लगवाने के आरोप में नौकरी भी जाएगी। खैर झाड़ू लगा के कक्षा 3,4,5 को पेड़ के नीचे बैठाया और हेडमास्टर साहब 1 और 2 को एक साथ बैठाकर पढ़ाने लगे।

महोदय मैंने देखा कि आप के RTE के नियम के तहत ऐसे लडके को कक्षा 4 में प्रवेश देने के लिए बाध्य था जिसे क, ख, ग वर्णमाला नही आता था। अब मुझे वो अलादीन का चिराग ढूंढना था, जिससे कि उस बच्चे को सिलेबस के हिसाब से “प्रकाश संश्लेषण” पढा सकूं जिसे वर्णमाला भी नही आती। सबसे कॉपी निकालने को कहा तभी मेरे हेडमास्टर साहब ने बुलाया, मास्साहब जल्दी आइये।

पढ़ाना छोड़ उनके पास गया तो उन्होंने कहा की पढ़ाई बाद में होगी, ऊपर से आदेश आया है की दिए गए फार्मेट में स्कूल बच्चों आदि की डिटेल 2 घंटे मे देना है।

चपरासी, सफाईवाला, अध्यापक के बाद अब मैं क्लर्क बन चुका था, हालांकि पहाड़ा पढ़ने को कहा था , कुछ बच्चे पढ़ते रहे और कुछ पास के बगीचे में खेलने लगे, हल्ला मचाने लगे। RTE एक्ट के तहत आप ने मेरे हाथ से डंडा छीन लिया है, फेल कर नही सकता, नाम काट नही सकता। अतः कुछ ज्यादा कर नही सकता था।

2 घंटे बाद वो लिस्ट विभाग को पहुचाने गया क्योंकि डाकिया और कुरियर वाला भी मैं ही हूँ।

सरकारी भोजन यनि मिड डे मील- 

वापस आया तो मिड डे मील बन चुका था हेडमास्टर साहब ने “खाना चेक किया गया” वाले कालम में रजिस्टर पर साइन करने को कहा। मैं चेक करने गया, रजिस्टर में सब्जी दाल और रोटी थी मगर बनी तो खिचड़ी थी , खाने की कोशिश किया दो चम्मच भी नही खा पाया, अभी तक जिंदा बची रही अंतरात्मा रो रही थी कि ये खाना बच्चे कैसे खाएंगे?

मैने हेडमास्टर साहब से बताया, उन्होंने बोला कि इमोशनल मत होइए खाना मैं नही बनाता मुखिया जी बनवाते हैं। जो बनवाते थे उनके पास गया तो जबाब था कि “नए नए आए हैं मास्साहब ! बगल के गांव में चूल्हा ही नही जला महीनों से, उससे तो बहुत अच्छे हैं हम” वैसे भी आप पढ़ाने मे ध्यान दीजिए घर बार से दूर आये हैं नौकरी करने न कि लड़ाई करने।

हताश हो के हेडमास्टर साहब के पास गया और कहा कि शिकायत करूंगा। उन्होंने कहा की ये भी कर लो “नया नया जोश है….”। मैने तुरंत अधिकारी को फोन लगाया और स्थिति बताई उन्होने कहा मास्टर साहब प्रेक्टिकल बनिये एडजेस्ट करके चलना पड़ता है। थोड़ी ही देर में मुखिया जी की XUV विद्यालय गेट पर थी। मेरे कम्प्लेन की जानकारी उन तक पहुंच गई थी।

मुखिया जी ने मुझे पुनः अपने दो मुस्टंडों के साथ खड़ा हो के समझाया, मास्टर साहब सिस्टम में आप नए हैं, आराम से पढ़ाइये दो चार दिन न भी आएंगे तो हम लोग देख लेंगे कोई समस्या नही होगी। हम ये अकेले नही लेते, सब तक पहुंचता है। कम्प्लेन का फायदा नहीं। बगल के एक गांव के मास्टर की गांव वालों द्वारा कुटाई का उदाहरण भी दे दिया गया। ख़ैर ये हरामखोर बनने और अपना जमीर बेचने का पहला दिन था, जिसकी गवाही मिड डे मील के रजिस्टर पर किया गया मेरा हस्ताक्षर चीख चीख के दे रहा था। आज की पढ़ाई पूरी हुई।

नौकरी का दूसरा दिन- 

महोदय अगले दिन मुझे गांव मे जा के सर्वे करना था। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कोई डेटा मांगा था जिसको तुरंत देना था। अतः अगले दिन मैं सफाईकर्मी, चपरासी के बाद मास्टर नही बन पाया उस दिन सर्वेयर बने रहे। बच्चे बागीचे में खेलते रहे। हेडमास्टर साहब कभी कक्षा 1 तो 2 तो कभी 5 के बच्चे को संभालते रहे।

3 -4 दिन बाद मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो आधो के पास कॉपी पेंसिल नही। पूछने पर बताया कि पापा बम्बई कमाते हैं पैसा भेजेंगे तो खरीदा जाएगा, कुछ ने कहा कि अगले हफ्ते बाजार से ले आएंगे। महोदय हमारा सत्र तो अप्रैल से शुरू हो जाता है मगर किताब मिलना शुरू होती है जुलाई से और अर्धवार्षिक परीक्षा बीतने के बाद भी पूरी किताबे नही मिलती। कई विषयों की किताबें पूरे साल नही मिली।

पता करने पर जबाब आया जब छप के आएगा मिल जाएगा। सरकार का काम है, ऐसे ही होगा। रोपिया, सोहनी और कटिया के समय बच्चे खेतो में जाते हैं और अधिकारीगण हमारे पीछे की बच्चे कहां है।

महोदय पढ़ाई के लिए सोशल अवेयरनेस वाले प्रोग्राम का बजट किस गड्ढे में जाता है जो हम मास्टर कटिया में सहायता करने के लिए भी तैयार होते हैं। क्योंकि बच्चा तभी आएगा जब कटिया हो जाएगा।

कुछ बच्चे एक दिन चौराहे पर मिले और बताया कि गुरु जी अब मैं बोरे पर जमीन पर बैठकर नही पढूंगा। शिशु मंदिर में 50 रुपया फीस है और बेंच पंखा दोनो है। उधर सरकार की ओर से अध्यापको को गुणवत्ता मेंटेन करने की वार्निंग जारी हो चुकी थी।

बोरे पर टपकती छत में 2 अध्यापक, गुणवत्ता के साथ क्लर्क, चपरासी, स्वीपर की नौकरी के बाद 1 से 5 क्लास को पढ़ाते हुए । सुना है मी लार्ड ने बेंच लगवाने को कहा था मगर आज तक वो कागज से आगे नही आया।

खुद के घर से बोरा भी ले आया- 

‘नया नया जोश था अतः पढ़ाना जारी रखा’ खुद के घर से बोरा ले आया, कॉपी, पेंसिल बच्चों को दी अब भी वो घर से काम करके नही आते, क्योंकि उनके अभिभावक की काउंसलिंग का काम भी हमारा है और वो हम कर नही पाते, क्योंकि पापा बम्बई कमाते हैं। मम्मी पर्दा करती है, बाबा अनपढ़ है।

6 माह बीत गए, मुझे सफाईकर्मी, चपरासी, क्लर्क, सर्वेयर,और समय मिले तो मास्टर की नौकरी करते करते..किताबे अब भी पूरी नही जो मिली भी वो बच्चे के बस्ते मे धूल खा रही है। बच्चे वर्णमाला सीख गए किताब अब भी नही पढ़ पाते.. साहब की चेकिंग हुई। पीठ थपथपाई गई, ये तो क ख ग भी नही जानते थे, मास्साहब आप ने कमाल कर दिया, 3 का बच्चा अब वर्णमाला सुना सकता है। मैं कुंठित गर्व के साथ छद्म संतुष्टि के अहंकार में मुस्करा दिया।

मैंने कमरे फर्श छत और चटाई की बात की, हां हां सब मिलेगा, सब कुछ नोट करके साहब ले गए। चेकिंग हुए 4 माह बीत गए, कुछ नही बदला। सुना है साहब की बदली होने वाली है। आज साहब से मिलने गया। सर वो बच्चे आज भी पेड़ के नीचे ही पढ़ते हैं, कुछ व्यवस्था? तभी साहब ने बीच में रोकते हुए कहा शासन से फंड अगले 6-8 महीने में आएगा, उसके बाद जो अधिकारी होगा उसको एप्लिकेशन दीजियेगा।

बारिश आती रही, छत टपकती रही, बच्चे खेलते रहे- 

बारिश आती रही बच्चे खेलते रहे, छत टपकती रही, मैं कुर्सियां तोड़ रहा था मैं धीरे धीरे मैं हरामखोर हो रहा था। ड्रेस वितरण शुरू है और उसी “विशेष व्यवस्था” के तहत ड्रेस खरीदना है। वही जो बताई गई है।

अचानक एक दिन अन्तरात्मा जाग गई। मिड डे मील से लेकर ड्रेस, स्कूल की चटाई, थाली से लेकर टपकती छत, सफाईकर्मी की गैरहाजरी से लेकर विशेष व्यवस्था का काला सच फाइल में बना कर डीएम कार्यालय दे आया। संभवत: डीएम साहब ने वार्निंग दे दी साहब को…

और आज सुबह मेरा विद्यालय 8 बजकर एक मिनट पर चेक हुआ। हेडमास्टर साहब 8 बजकर 5 मिनट पर आने के अपराध में स्पष्टीकरण देंगे और शिक्षण अधिगम में कमी पाई जाने पर कर्तव्यों का सम्यक निर्वाहन न करने के कारण मैं निलंबित करके किसी अन्य गांव में भेज दिया गया। मुखिया जी क़ह रहे हैं मैने पहले कहा था सब सिस्टम है मास्साहब। मगर आप का “नया नया जोश ले डूबा आपको………

6 माह बाद……

संस्पेंशन वापस हो चुका है. मेरी नियुक्ति घर के पास के एक विद्यालय में हो चुकी है. मैने “विशेष व्यवस्था” को स्वीकार कर लिया है…मुखिया जी बहुत खुश हैं मुझसे .. मास्टरी के साथ साथ ई रिक्शा चलवाने का बिजनेस शुरू कर दिया है…अब मेरी अंतरात्मा मर चुकी है। क्या करता कितने दिन संस्पेंड रहता व्यवस्था से लड़कर. परिवार को भूख से मरने से बचाने के लिए मैंने अपनी अंतरात्मा को मार दिया. मैं हरामखोर हो गया..

क्यों बना??  किसने बनाया?? छोड़िये ये सब महोदय ये मास्टर होते ही हैं नाकारा कामचोर..
धन्यवाद।

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