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कांग्रेस की OBC रणनीति, राहुल बोले “राजीव जी का दौर लाना होगा जब कांग्रेस पिछड़े वर्ग की पार्टी थी”

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

राजीव गांधी जी के समय तक कांग्रेस देश के सबसे बड़े तबके-‘पिछड़े समाज’ की पार्टी थी. धीरे-धीरे ये समाज हमारी पार्टी से अलग होता गया और अपने-अपने घर बना लिये. हमें सबसे बड़े समाज को सबसे बड़े घर से जोड़ना है. कांग्रेस  में पिछड़े समाज का वाजिब प्रतिनिधित्व होना चाहिये. कांग्रेस सामाजिक न्याय के लिये पूर्णतया प्रतिबद्ध है.”- राहुल गांधी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष. कांग्रेस.

कल दिल्ली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछड़े समाज के नेताओं के साथ वर्तमान राजनातिक परिदृश्य, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने और विभिन्न संस्थानों में आरक्षण की कटौती को लेकर चर्चा की. कांग्रेस के लिये गुजरात चुनाव अहम है.

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क्या पिछड़े वर्ग को तरजीह दे रहे हैं राहुल ?

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस में पिछड़ा वर्ग का प्रमुख चेहरा माने जाने वाले अशोक सिंह गहलोत को गुजरात का प्रभारी बनाया गया है और पिछड़ी जाति के कुर्मी समाज से आने वाले पूर्व गृहराज्य मंत्री आरपीएन सिंह को झारखंड का प्रभारी बनाया गया है. कांग्रेस गुजरात में एक बार फिर से हिट फ़ॉर्मूला बनाने की तरफ बढ़ रही है.

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पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने KHAM( K-क्षत्रिय, H-हरिजन, A-आदिवासी, M-मुस्लिम) फार्मूला बनाया था, उस समय पाटीदार समुदाय गुस्से में भाजपा की तरफ चला गया था. अभी हाल में हुये पाटीदार आन्दोलन के चलते पाटीदार और ऊना काण्ड से दलित समुदाय भाजपा से कट गया है. हाल में ही शंकर  सिंह बाघेला के कांग्रेस छोड़ने से क्षत्रिय-ठाकोर समुदाय के  वोट का कांग्रेस को नुकसान होगा लेकिन पाटीदार समुदाय से इस कमी को भरने की कोशिशें कांग्रेस की तरफ से जारी हैं.

मंडल कमीशन और कांग्रेस की राजनीति- 

1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद देश में पिछड़ा वर्ग का नेतृत्व मुख्यधारा की राजनीति में आ गया. कांग्रेस इस राजनैतिक बदलाव को पहचान नहीं पाई और लगातार सवर्ण नेतृत्व पर भरोसा जताती रही. भाजपा ने इस मुद्दे में चालाकी से काम लिया और मण्डल कमीशन का प्रतिकार करने के लिये मंदिर आन्दोलन शुरू कर दिया. जिसे मंडल के बदले कमंडल का आंदोलन भी कहा जाता है. इस आंदोलन क शूरू होते ही पढ़ा लिखा ओबीसी समाज हिंदुत्व के झांसे में आ गया और बीजेपी ने हिंदुत्व के सांचे में ढले हुए OBC को नेतृत्व का मौका दे दिया.

प्रख्यात मानव विज्ञानी क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने इसे ‘कोयलिशन ऑफ़ एक्सट्रीम’ कहा है. भाजपा लगातार हिन्दुत्वादी सोशल इंजीनियरिंग के तहत पिछड़े चेहरों को जगह देती रही है. लेकिन 2014 के चुनाव ने पूरे राजनैतिक परिदृश्य को बदल दिया. साम्प्रदायिकता, हिंदुत्व, विकास, गुड गवर्नेंस आदि जुमलो के साथ ओबीसी शब्द का जमकर इस्तेमाल हुआ.

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2014 में बीजेपी ने पीएम मोदी को प्रचारित किया ओबीसी- 

शक्ति सिंह गोहिल कांग्रेस नेता ने उठाए थे मोदी से ओबीसी होने के सवाल

2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पिछड़ा वर्ग के चेहरे के रूप में खूब प्रचारित करवाया. जबकि हकीकत ये है कि नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति मोढ़-घांची को ओबीसी की सूची में शामिल कराया। इससे पहले मोदी जी की जाति सवर्ण वर्ग में आती थी. भाजपा की इस स्ट्रेटजी को कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने उठाया भी था लेकिन कांग्रेस नेतृत्व इसको भुना नहीं पाया। नतीजतन नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा को पिछड़े वर्ग का बहुतायत वोट मिला.

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किसानों के बीच राहुल का जाना इसी रणनीति का हिस्सा है- 

आज ओबीसी वर्ग मोदी सरकार की योजनाओ, क्रिया-कलापों से उपेक्षित महसूस कर रहा है. ओबीसी वर्ग मूलतः किसान है तथा उत्पादन और कृषिगत व्यापार में असंगठित क्षेत्र में आता है. पिछले तीन सालों में जिस तरह से मोदी सरकार बड़े पूंजीपतियों पर मेहरबान हुई है उससे ये वर्ग आर्थिक रूप से उपेक्षित हुआ है। नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण को खामोशी से खत्म करने का जो खेल हो रहा है उससे पिछड़े समाज को काफी निराशा हुई है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया बोले हां मैं भी कुर्मी हूं- 

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अभी हाल में महाराष्ट्र, गुजरातस मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में जितने भी किसान आन्दोलन हुए उनमें बहुतायत में भागीदारी ओबीसी समाज से रही है. किसान आंदोलनों में राहुल गांधी की मौजूदगी कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत है. मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानो पर बर्बर गोलीबारी के बाद किसान पूरी तरह से आंदोलित है. कांग्रेस की तरफ से ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश में लगातार किसानो के बीच जा रहे हैं. इतना ही नहीं 2016 में एक रैली में सिंधिया ने आशंकाओं पर विराम लगाते हुए कहा था, हां मैं भी कुर्मी हूं. इस बयान के बाद मध्यप्रदेश में उनको कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा बनाने के लिए कुर्मी समाज में आवाज भी उठने लगी हैं।

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वहीं दूसरी ओर  नोटबंदी और GST लागू होने से असंगठित क्षेत्र भयानक बेरोजगारी का शिकार हुआ है. इसका असर ओबीसी समाज पर भी पड़ा है और उनके बीच बेरोजगारी बढ़ी है. कांग्रेस यदि उनके पास पहुंचती है और उनके मुद्दे संसद से लेकर सड़क तक में उठती है तो ये बड़ा वर्ग 2019 में कांग्रेस की तरफ रुख कर सकता है.

गुजरात चुनाव में कांग्रेस भेजेगी यूपी से पिछड़े नेता-

दिल्ली के कांग्रेस सम्मलेन में 8 से 10 राज्यों के कांग्रेस के प्रमुख ओबीसी नेताओं की बैठक में ये भी तय हुआ कि कई ओबीसी नेताओं को गुजरात चुनाव में भेजा जायेगा. उत्तर प्रदेश की राजनीति ओबीसी नेतृत्व के बिना असंभव है. भाजपा ने मोदी, केशव प्रसाद मौर्य, अनुप्रिया पटेल, ओमप्रकाश राजभर को आगे कर चुनावी जंग जीती है. कांग्रेस की उत्तर प्रदेश यूनिट में भी ओबीसी नेतृत्व की  मांग उठ रही है. प्रदेश में किसान पुत्र के रूप में पहचान बना रहे तरुण पटेल ओबीसी वर्ग से कांग्रेस से प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे है.

दिल्ली की मीटिंग में राहुल गांधी के साथ तरूण पटेल

छात्र राजनीति से आये  तरुण पटेल कांग्रेस से लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ चुके है और वर्तमान में प्रदेश में संगठन सचिव है. तरुण पटेल युवाओ और किसानो में खासे लोकप्रिय है और हरी पगड़ी उनकी पहचान बन चुकी है. टीम राहुल गांधी के कोर मेम्बर माने जाते है. यदि कांग्रेस नेतृत्व अपने संगठन में तरुण पटेल जैसे युवाओ को प्रदेश की कमान सौपेगी और ओबीसी के मुद्दों जैसे मण्डल कमीशन की सिफ़ारिशो को लागू करवाना और जाति-जनगणना के आंकड़ो को लागू करवाने के लिये केंद्र सरकार पर दबाव बनाना आदि को अपनी प्राथमिकता में रखे तो 2019 में पांसा पलट सकता है.

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बदलती हुयी कांग्रेस की पहली परीक्षा गुजरात चुनाव है, फिर उसके बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने है. कांग्रेस ओबीसी वर्ग के दर्द और अहसास को महसूस कर पाती है कि नहीं, यह देखना बाकी है.

(लेखक अनूप पटेल यूपी के बुंदेलखंड के बांदा के निवासी हैं. जेएनयू में शोधार्थी और सोशल एक्टीविस्ट हैं, वर्तमान में लखनऊ में रहकर शिक्षण कार्य कर रहे हैंं) 

 

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