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जातिवार जनगणना का समर्थन करें राजपूत, पता तो चले सवर्णवाद के नाम पर उनका हिस्सा कौन खा रहा है?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

राजस्थान में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की मौत के बहाने ओबीसी में आने वाले रावणा राजपूत को आगे कर अन्य राजूपत शासन-प्रशासन में अपनी हिस्सेदारी ना होने का गुस्सा निकाल रहे हैं। सवर्णवाद के नाम पर मलाई ब्राह्मणों ने खा ली और जातियों से लड़ने की जिम्मेदारी राजपूतों को दे दी गई।

राजपूतों को अब ये बात समझ में आ रही है। इसलिए राजस्थान में ओबीसी में आने वाले रावणा राजपूत के बहाने सामान्य में आने वाले राजपूत भी एकजुटता दिखाकर अपने सम्मान और अधिकारों की बात कहते हुए सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर पड़े हैं। राजस्थान के स्वतंत्र पत्रकार जितेन्द्र महला राजपूतों का दर्द बयां करते हुए लिखते हैं कि-

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राजपूतों के साथ जो हो रहा है, वो बहुत गलत है, सामान्य श्रेणी का सारा हिस्सा ब्राह्मण-बनिये खा जाते हैं और राजपूत भयंकर बेरोजगारी का शिकार हो गये हैं. राजपूतों को जाति जनगणना का समर्थन करना चाहिए, आख़िर पता तो चले कि सवर्णवाद के नाम पर सामान्य वर्ग का सबसे ज्यादा हिस्सा खा कौन रहा है ?

अपनी कुंठा शांत कर रहे हैं राजपूत- 

आनंदपाल सिंह मामले के ज़रिये करणी सेना और राजपूत समुदाय के लोगों ने अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कुंठा को साधने की कोशिश की है. हम सब जानते हैं कि आज़ादी के बाद राजपूतों की राजशाही चली गई. उनकी आर्थिक और राजनैतिक ताकत में ज़ोरदार गिरावट आई. शिक्षा और नौकरियों में वे तेजी से पिछड़े क्योंकि वक्त के साथ ख़ुद को बदल लेने में वे पीछे रहे.

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ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ में राजपूत पीछे छूट गए- 

दरअसल, सवर्णों के अंदर जहां ब्राह्मणों और बनियों की सामाजिक और आर्थिक ताकत आज़ादी के बाद भी कई गुना तेजी से बढ़ी. गांधी और नेहरू की जोड़ी ने ब्राह्मण और बनियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया. ब्राह्मण हर राजनैतिक पार्टी के शिखर पर बैठ गये और आरएसएस तो ब्राह्मण संगठन है ही. ब्राह्मणों ने मंदिरों, त्यौहारों, व्रतों, यज्ञों, स्कूलों में ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के जरिए समाज में ओर मजबूती हासिल की.

ठीक इसी तरह बनिये गांधी जी के स्वदेशी अपनाओ का नारा लगाते हुए और चरखा कातते दिखाई देते हुए, देखते ही देखते बजाज, बिड़ला, तापड़िया, गोयनका, सिंघानिया जैसे ब्रांड बन गये. कुलमिलाकर सवर्णों के अंदर ब्राह्मण-बनिया जोड़ी मज़े में हैं.

लेकिन राजपूतों की राजशाही चली गई. राजपूतों की बड़ी संख्या अब भी गांवों में हैं. वे शिक्षा में ध्यान नहीं दे पाये. दूसरी तरफ ब्राह्मण-बनिये शहरों में हैं और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं. सवर्ण एक तरफ नोकरियों में गैरलोकतांत्रिक तरीके से 51 फीसदी हिस्सा घेर लेते हैं, लेकिन सवर्णों के अंदर यह हिस्सा ब्राह्मण खा जाते हैं और बचा-खुचा राजपूतों को मिलता है.

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सवर्णों के अंदर राजपूत दिक्कत में- 

जिस राजपूत समुदाय ने हमेशा अपने हक़ से ज्यादा छीनकर खाया, अब सवर्णों के अंदर उनकी हालात बहुत पतली है. राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत के बाद पिछले दो दशकों में राजपूत कुंठित हो चुके हैं, वे ब्राह्मण-बनियों से अलग भी नहीं होना चाहते और सीधे-सीधे भिड़ंत भी नहीं चाहते.

वे आरएसएस और बीजेपी से अंदर ही अंदर मोलभाव कर रहे हैं. वे इस बहाने राजपूतों को एक बार फिर लामबंद कर रहे हैं. वे राजस्थान में अपनी खोई हुई हैसियत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे सवर्ण गठजोड़ के अंदर अभी बने रहेंगे क्योंकि अभी वे जाति के ज़हर को नहीं जानते और परिपक्व भी नहीं हैं. वे अभी ब्राह्मणवाद के हाथों ओर ठगे जायेंगे.

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