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खामोशी से बैठे पिछड़ों ! अगला नंबर मेरा या आपका हो सकता है, वे आंदोलनकारियों को कुचल रहे हैं

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

अगला नाम मेरा या आपका या किसी का भी हो सकता है, तैयार रहें. वे एक-एक करके सबको कुचल रहे हैं, अगर हम नहीं सुधरे तो कभी तो हमारी बारी भी आयेगी.

रोहित वेमुला को न्याय नहीं मिला. रोहित चौधरी को न्याय नहीं मिला. नज़ीब को न्याय नहीं मिला. अख़लाक़ को न्याय नहीं मिला. अफराजुल को न्याय नहीं मिला. पहलु ख़ान को न्याय नहीं मिला. जाट आरक्षण आंदोलनकारियों को न्याय नहीं मिला.

2 अप्रेल के भारत बंद के आंदोलनकारियों को न्याय नहीं मिला. मनुवादी उर्फ़ आरएसएसवादी पुलिस, प्रशासन,सरकार, न्यायपालिका और शिक्षा संस्थानों ने इन्हें कुचल दिया.

भीम आर्मी के चंद्रेशखर आज़ाद और यूनियनिस्ट मिशन के मनोज दूहन ज़ेल में हैं और भीम आर्मी के सचिन वालिया की गोली मारकर हत्या की गई है, महावीर खिलेरी और ध्रुव राठी पर बीजेपी और आरएसएस के लोगों ने दिल्ली में एफआईआर की है, उनको गिरफ्तार करके चंद्रेशखर और मनोज दूहन की तरह जेल भेजा जा सकता है.

अब सवाल उठता है कि इन तमाम मामलों में हमने क्या किया ?

पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के इलाके में आरएसएस विचारधारा की पार्टी बीजेपी के राज़ में जाट, अनुसूचित जाति और मुसलमान निशाने पर हैं. लगातार इन समुदायों पर अलग-अलग तरीके से दमन जारी है, इसके साथ-साथ मनुवादी ताकतों ने इन समुदायों को बहुत चालाकी से जाति, नस्ल और धर्म की नफरत सिखाने वाली रणनीति से बांट दिया है.

उन्होंने मुसलमानों, अनुसूचित जातियों और जाटों की एकजुटता और भाईचारे में दरार डाल दी है. वे इंसानों को कभी जाति के आधार पर बांटते हैं, कभी नस्ल के आधार पर और कभी धर्म के आधार पर. हम आपस में लड़ते रहते हैं और फासीवादी ताकतें लगातार हमारे नौज़वान आंदोलनकारियों औऱ क्रांतिकारियों को कुचलती रहती हैं.

आरएसएस की प्रयोगशाला में नफरत की खेती- 

पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान आरएसएस की नई प्रयोगशाला हैं. वे गुजरात से यहां शिफ्ट हो गए हैं. वे हमें जातिवाद सीखा रहे हैं, नस्लवाद सीखा रहे हैं, सांप्रदायिकता सीखा रहे हैं और हमारे नौज़वान यह सब बहुत आराम से सीख रहे हैं और आपस में ही लड़ रहे हैं.

इस इलाके के जाट, अनुसूचित जातियां और मुसलमान एकजुट होकर चंद्रेशखर के लिए नहीं लड़ें, मनोज दूहन के लिए नहीं लड़ें, पहलु ख़ान-अखलाक और अफराजुल के लिए नहीं लड़ें.

वे गिरोहों में रहते हैं और ऐसे मौकों पर जाट सिर्फ मनोज दूहन के लिए लड़ते हैं, अनुसूचित जातियां सिर्फ चंद्रेशखर आज़ाद के लिए लड़ती हैं और मुसलमान सिर्फ पहलु-अख़लाक और अफराजुल के लिए लड़ते हैं. अपवाद नियम नहीं होता. बहुसंख्यक और बहुत बड़ी आबादी का यहीं हाल है.

कुल मिलाकर इस इलाके के लोग अभी इंसान नहीं बन पाए हैं. उन्होंने इसी इलाके के छोटूराम, चरणसिंह, भगतसिंह और कांशीराम जैसे राष्ट्रनायकों और महापुरूषों के सपनों को बेच खाया है.

ये नवयुवकों के लिए तबाही का दौर है- 

वे महापुरूषों के विचारों को नहीं मानते और दिन-रात कुतर्क करते हैं. आपस में नफरत की चरस बोते हैं, वे आरएसएस के लिए काम करते हैं. जो क़ौमे अपने महापुरूषों के विचारों को भूला देती हैं, वे तबाह होती हैं. इस समय तबाही का दौर हैं. नफरत का दौर हैं. हमारे बच्चे और नौज़वान तबाह हो रहे हैं, वे नफरत सीख रहे हैं.

चंद न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक, शांतिप्रिय, संवैधानिक और इंसानियत पसंद चंद्रशेखर, मनोज, नज़ीब, सचिन, राहुल, महावीर और ध्रुव जैसे लोगों मनुवादी-फासीवादी-नाजीवादी ताकतें आसानी से कुचल देती हैं, कुचल रही हैं.

जब तक जाट चंद्रेशखर आज़ाद, सचिन वालिया और पहलु खान के लिए नहीं लड़ते, अनुसूचित जातियां मनोज दूहन-राहुल चौधरी, महावीर खिलेरी और ध्रुव राठी के लिए नहीं लड़ती, जब तक मुसलमान चंद्रेशखर आज़ाद और मनोज दूहन के लिए नहीं लड़ते तब तक न्याय की उम्मीद नहीं है. हम न्याय और इंसाफ की लड़ाई नहीं लड़ सकते.

हम दर्द का रिश्ता कायम किए बिना न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकते. इंसान बने बिना न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकते. जाति-नस्ल और नफरत सीखाने वाले धर्म का नाश किए बिना न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकते.

अगर हम एकजुट नहीं हुए और न्याय के लिए इंसान नहीं बने तो मनुवादी, फासीवादी, तानाशाही, अलोकतांत्रिक, आरएसएसवादी और भाजपाई ताकतें हमें कुचल देंगे. हमारे नौज़वान आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों को मनुवादी ताकतें रोज कुचल रहीं हैं,

अगर हम एकजुट नहीं हुए तो वे हमें भी कुचल देंगे, इस बात का हमें कोई मलाल नहीं है कि अंज़ाम क्या होगा लेकिन दिल को यह दिलासा रहेगा कि हम तमाम जोखिम उठाकर न्याय के लिए लड़ें-इंसानियत के लिए लड़ें. संविधान और लोकतंत्र के लिए लड़ें.

( लेखक जितेंद्र महला राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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