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राजस्थान के सवर्णों की सत्ता में सेंध लगा रही है जाट और मीणा की ये जोड़ी

नई दिल्ली। नेशनल जनमत डेस्क

निर्दलीय विधायक और किसान नेता हनुमान बेनीवाल के विधानसभा निलंबन को रद्द करने की मांग को लेकर पूरे राजस्थान में जोरदार आंदोलन चल रहा है. लेकिन राजस्थान की सवर्णवादी माीडिया खामोश है. किसान नेता हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा की किसान हुंकार रैली को मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया. इतना ही नहीं इस रैली के बाद ये दोनों उच्च वर्गों की आंख में खटक गए. मीडिया इनके प्रदर्शन, इनकी भीड़ को दिखाने से दूर भागने लगा

इसकी बजह आपको बखूबी समझ आएगी और आप ये भी जान पाएंगे कि हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा मिलकर राजस्थान के उच्च वर्गों को क्यों खटक रहे हैं. पढ़िए राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता और वंचित तबके की हिस्सेदारी की मांग उठाने वाले जितेन्द्र महला क्या लिखते हैं.

सत्ता के ढांचे में सुराख कर दिया है बेनीवाल और मीणा ने- 

राजस्थान में इस वक़्त जननेता हनुमान बेनीवाल बीजेपी और कांग्रेस के विरोध में सबसे मजबूत आवाज़ हैं. उन्होंने बीजेपी और कांग्रेस की सत्ता की अदला-बदली के ख़ेल को निर्णायक रूप चुनौती दे दी है. उन्होंने उच्च जातियों के सत्ता वर्चस्व को हिला कर रख दिया है. उन्होंने बीजेपी और कांग्रेस को चुनौती देकर तथाकथित उच्च वर्गों के घमंड को चुनौती दी है, जिनका हमेशा से मानना रहा है कि सत्ता पर क़ाबिज होने की क़ाबिलियत उन्हीं में हैं, राज उन्हीं को करना चाहिये. हनुमान बेनीवाल ने समाज के सत्ता के ढ़ांचे में सुराख़ कर दिया है

मीडिया का जातिवादी चरित्र- 

उच्च वर्गों ने बीजेपी और कांग्रेस के साथ मिलकर बेनीवाल और मीणा के ख़िलाफ मोर्चा खोल दिया है. बीजेपी और कांग्रेस लगातार बेनीवाल और मीणा पर जातिवाद का आरोप लगा रहें हैं. वे मीडिया को मैनेज करने की गैर-लोकतांत्रिक गतिविधियों में लगे हुये हैं, उन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को स्वतंत्र रिपोर्ट करने से रोका है.

जनता के बनते हुये विचारों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही हैं. किसान हुंकार महारैली को लेकर पिछले साल मीडिया ने बहुत ही सतही कवरेज की थी. यह वहीं मीडिया है जिसने 2011 में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में जुटी चंद हज़ार लोगों की भीड़ को बेतहाशा कवरेज दी थी. जिस मीडिया ने 2013 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में लहर बनाई थी.

जो मीडिया लगातार मुरथल में जाटों के ख़िलाफ गैंग रेप की झूठी ख़बर चलाकर उन्हें बदनाम करता है, जो मीडिया गुर्जर-मीणाओं के आपसी विवाद को बहुत चटकारे के साथ चौबीसों घंटे दिखाता है. जिस मीडिया को डांगावास और मिर्चपुर पसंद है. जिस मिडिया को जाटों और मुसलमानों के मुरादाबाद दंगे और कैराना पसंद है. उस मीडिया को जाटों, मीणाओं, गुर्जरों, दलितों और मुसलमानों की एकता पसंद नहीं है क्योंकि ऐसा करने से उच्चे वर्गों के हितों के नुकसान होता है. उन्हें सिर्फ हिंदू बनाम मुसलमान पसंद है.  जिससे बीजेपी और कांग्रेस को ज़मकर खाद-पानी मिलता है.

किसान-मजदूर-युवाओं के लिए नया विकल्प – 

जितेन्द्र महला कहते हैं कि किसान हुंकार रैली किसानों, मजदूरों, युवाओं और कमजोर वर्गों की ऐतिहासिक और सांझा रैली थी. सत्ता पक्ष और उच्च वर्गों को इसलिए इन दोनों का साथ पसंद नहीं है क्योंकि ये उनकी मानसिकता में सुराख कर रहे हैं. हनुमान बेनीवाल और किरोड़ीलाल मीणा की पूरी टीम को यह आदत डाल लेनी चाहिये कि उन्हे मुख्य धारा का मीडिया कवरेज नहीं देगा, उसके हित उच्च वर्गों की सत्ता को बचाना है. वह बिका हुआ है. वह असली जातिवादी मीडिया है. उसे सवर्ण पार्टियाँ पसंद है. उसने आज तक दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक पार्टियों के साथ न्याय नहीं किया. वह हमारे साथ भी न्याय नहीं कर सकता. हमें फेसबुक, यू-ट्युब, वाट्सएप पर बने रहना चाहिये. यहीं हमारा भरोसमंद मीडिया है.

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