राम तो नेपाली निकले ! नेपाल के PM का दावा राम का असली जन्मस्थान भारत में नहीं नेपाल में है !

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो

पेरियार रामासामी नायकर, अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा, पेरियार ललई यादव, बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा समेत तमाम तर्कवादी, मानववादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले विचारकों ने राम को हमेशा एक काल्पनिक चरित्र माना है।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ ‘ में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि शुंग वंश के शासक पुष्यमित्र शुंग को ही राम के रूप में वाल्मीकि ने चित्रित कर उनका यशगान किया गया। राम कोई अलग से ऐतिहासिक चरित्र नहीं है।

तर्कवादियों का कहना है कि राम का न कोई लिखित इतिहास है न इतिहासकारों ने कहीं जिक्र किया है। आखिर राम का समय और काल क्या है? केवल धार्मिक पुस्तकों रामायण और रामचरित मानस के आधार पर राम के अस्तित्व को तर्क नहीं आस्था, विश्वास और श्रद्धा के नाम पर भगवान मानने की परम्परा रही है।

विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा खास तौर पर भारतीय जनता पार्टी ने राम के नाम का चुनावी इस्तेमाल भी खूब किया। भारत में विवादित ढ़ांचा गिराए जाने के बाद से ही राम मंदिर हमेशा एक ज्वलंत चुनावी मुद्दा बना रहा।

अब ऐसे समय में जब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद राम का मंदिर बनने की प्रक्रिया अयोध्या में जारी है। उसी समय नेपाल के प्रधानमंत्री ने नया दावा कर भारत के आस्थावानों को चौंका दिया है।

नेपाल के मौजूदा प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि राम की असली अयोध्या भारत में नहीं बल्कि नेपाल के वाल्मिकी आश्रम के पास है। उन्होंने कहा कि कहा कि हम लोग आज तक इस भ्रम में हैं कि सीता का विवाह जिस राम से हुआ है वह भारतीय हैं… वह भारतीय नहीं बल्कि नेपाली ही हैं

वाल्मिकी रामायण का नेपाली अनुवाद करने वाले नेपाल के आदि कवि भानुभक्त की जन्म जयन्ती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ओली ने‌ कहा कि भारत ने ‘नकली अयोध्या’ बनाकर नेपाल की सांस्कृतिक वजूदों पर अतिक्रमण किया गया है। भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण के लिए नकली अयोध्या का निर्माण

दुनियाभर में 300 तरह की रामायण हैं-

गौरतलब है कि दुनियाभर में रामायण के 300 अनुवाद हैं। जिसमें अलग-अलग रामायणों में सबके अलग-अलग किरदार हैं। किसी के मुताबिक रावण सीता का अपहरण कर उन्हें लंका उठा ले जाता है तो किसी रामायण के मुताबिक सीता रावण की पुत्री होती है।

इन्ही अलग-अलग कथा कहानियों को देखते हुए दक्षिण भारत के पेरियार रामासामी नायकर ने तमिल में सच्ची रामायण नाम की एक किताब लिखी थी जिसमें इन काल्पनिक चरित्रों पर विस्तार से सवाल उठाए गए थे। इस पुस्तक का प्रचार उत्तर भारत में पेरियार ललई यादव ने सच्ची रामायण की कुंजी नाम से हिंदी में छपवाकर किया और उसे हाइकोर्ट से केस जीतकर वितरित भी करवाया।

यही वजह है कि अर्जक संघ के संस्थापक उत्तर प्रदेश में 6 बार विधायक व वित्त मंत्री रहे महामना रामस्वरूप वर्मा जी ने रामायण की प्रतियां विधानसभा के बाहर ही जलवा दी थीं उनका कहना था कि ये सब किताबें पाखंड और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली हैं साथ ही छुआछूत-वर्ण व्यवस्था को भी बढ़ावा देने वाली हैं।

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