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‘राष्ट्रवाद’ एक कंपलीट पैकेज है, जो समाज के मुद्दों की राजनीति न कर काल्पनिक प्रतीक खड़े करता है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

देश में एक तरफ इस तरह के लोग हैं जो अपने अधिकारों के लेकर सक्रिय हुए हैं और शासन सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं। तो वहीं दूसरी तरफ सरकार प्रायोजित राष्ट्रवादी लोग हैं जो आपको हक मांगने की आवाज को देशभक्ति के झूठे शोर के नीचे दबा देना चाहते हैं। आप उसका प्रतिकार करोगे तो देशद्रोही करार दे दिए जाओगे।

ऐसे ही आंडबर से बनाए राष्ट्रवाद के कंपलीट पैकेज की पड़ताल करता ये लेख पढ़िए-

राष्ट्रवाद वास्तविक मुद्दों की राजनीति नहीं करता बल्कि काल्पनिक प्रतीक खड़े करता है जैसे राष्ट्र का गौरव, राष्ट्र को ताकतवर बनाना, अपने पड़ोसी देश को धूल चटाना, अपने दुश्मन सम्प्रदाय के लोगों को सबक सिखाना आदि। 

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हिटलर का राष्ट्रवाद बनाम भारत- 

हम इटली और जर्मनी के राष्ट्रवाद की दुर्घटनाएं देख सकते हैं, इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने पूंजीपतियों और बड़े किसानों को अपने साथ मिला कर मजदूरों की हड़तालों को तोड़ने के लिए उन पर हमला करना, लिबरल्स और साम्यवादियों पर हमला करना शुरू किया, मुसोलिनी ने भी इटली को दुनिया का सबसे ताकतवर राष्ट्र बनाने का आह्वान किया था, मुसोलिनी भी काली कमीजें पहनने वाले युवाओं की युवकों की एक सेना रखता था जो विरोधियों पर हमला करते थे।

इसी तरह हिटलर ने भी राष्ट्रवाद का एक प्रयोग किया, हिटलर का राष्ट्रवाद जर्मन नस्ल के लोगों की श्रेष्ठता पर आधारित था। हिटलर के साथ भी वहाँ के पूंजीपति और सेना के अधिकारी थे, हिटलर ने देश के अंदर साठ लाख यहूदियों और पचास लाख उदारवादियों, कम्युनिस्टों, समलैंगिकों और राजनैतिक विरोधियों को मार डाला, इसके अलावा हिटलर ने भी जर्मनी को दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाने के लिए युद्ध छेड़ दिया।

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भारत में कैसे शुरू हुआ राष्ट्रवाद का खेल- 

भारत तो पहले एक राष्ट्र नहीं था। भारत रजवाड़ों और छोटे-छोटे रियासतों में बंटा हुआ था। भारत में राष्ट्रवाद का उदय भारत में आज़ादी की लड़ाई के दौरान हुआ। अंग्रेज़ी राज के खिलाफ आदिवासियों ने संघर्ष शुरू किया, उसके बाद अट्ठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम हुआ, भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज खत्म हुआ और भारत को अंग्रेजों ने एक राज्य का स्वरूप देना शुरू किया।

इस बीच दलितों में भी नई चेतना आनी शुरू हो गई थी। पूना में सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले और फातिमा शेख ने महिलाओं शूद्रों और मुसलमानों की शिक्षा की शुरुआत कर दी थी।

इससे घबरा कर भारत के सवर्ण और आर्थिक सत्तावान वर्ग के लोगों ने अंग्रेजों के बाद भी सत्ता अपने हाथों में रखने के लिए हिन्दू महासभा की स्थापना की, इसमें से कुछ लोगों ने निकल कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। हेडगवार ने कहा था कि शूद्रों और मलेच्छों से हिन्दू धर्म को मिलने वाली चुनौती का सामना करने के लिए हमने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की है| इसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दू महासभा ने हिन्दू राष्ट्र का निर्माण और उसके लिए उग्र राष्ट्रवाद की राजनीति शुरू की। 

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जरूरी मुद्दों को कैसे राष्ट्रवाद के नाम पर दबा देते हैं- 

गोरक्षा, पकिस्तान, राष्ट्रगान, जेएनयू, चाइनीज झालर जैसे काल्पनिक मुद्दे छद्म राष्ट्रवादी  यह लोग जनता के बीच में उछालते रहते हैं ताकि जनता असली मुद्दों के बारे में ना सोच सके।  राष्ट्रवाद हमेशा जनता के मुद्दों जैसे रोज़गार, किसानी, शिक्षा न्याय आदि को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

राष्ट्रवाद वास्तविक मुद्दों की राजनीति नहीं करता बल्कि काल्पनिक प्रतीक खड़े करता है जैसे राष्ट्र का गौरव, राष्ट्र को ताकतवर बनाना, अपने पड़ोसी देश को धूल चटाना, अपने दुश्मन सम्प्रदाय के लोगों को सबक सिखाना आदि।

राष्ट्रवाद एक पूरा पैकेज होता है जिसे स्वीकार करने के बाद आपको पूरा मूर्ख और जन विरोधी बनना पड़ता है, ऐसा नहीं हो सकता कि आप राष्ट्रवाद की कोई एक बात स्वीकार कर लें और बाकी में आप प्रगतिशील बातें स्वीकार कर लें। जैसे अगर आप राष्ट्रवादी हैं तो फिर आपको कश्मीरियों से नफरत करनी पड़ेगी, महिला आन्दोलन को औरतों के दिमाग का फितूर कहना पड़ेगा, आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई का विरोध करना पड़ेगा, दलितों की समानता की लड़ाई को हिन्दू धर्म को कमज़ोर करने की साजिश बताना होगा, मजदूरों की लड़ाई को कामचोर और आलसी मजदूरों की बदमाशी कहना होगा, आपको कहना होगा कि उद्योगपति ही देश का विकास कर सकते हैं, और यह पर्यावरण की बात करने वाले विदेशी एजेंट हैं।

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प्रगतिशीलता की भी कुछ शर्त हैं- 

दूसरी तरफ प्रगतिशीलता की भी यही शर्त है कि आपको पूरा प्रगतिशील बनना पड़ेगा, ऐसा नहीं हो सकता कि आप मजदूरों की मजदूरी तो बढ़ाने की तरफ हों, लेकिन मजदूर अपनी पत्नी को पीटे तो आप चुप रहें, या आदिवासियों के अधिकारों के मुद्दे पर काम करने वाले लोग मुसलमानों से नफरत करें या दलितों के सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले कश्मीरियों को गाली देंगे तो यह नहीं चलेगा।

पहले हम गांव में चलने वाले आंदोलनों में जाकर उन्हें समर्थन दे देते थे, तब हमसे कोई अन्य मुद्दों पर हमारे विचारों के बारे में नहीं पूछता था। कई बार किसानों के आंदोलनों में हम समर्थन देते थे जबकि वे किसान भाजपा समर्थक भी होते थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अब बाढ़ का विरोध करने वाले आन्दोलन में जब हम जाते हैं तो हमसे उस गांव के युवा पूछते हैं कि आपकी कश्मीर पर या छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के मुद्दे पर क्या राय है ?

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अब गांव का युवा भी फर्जी राष्ट्रवाद के चंगुल में है, उस युवा के दिमाग में राष्ट्रवाद का पूरा ज़हरीला पैकेज भरा गया है, अब उसकी हरेक मुद्दे पर वही राय है जो संघ चाहता है।

राष्ट्रवाद का यही नुकसान है, इसमें लोग फर्जी नफरतों में मज़ा लेने लगते है और अपनी ज़िन्दगी से जुड़े मुद्दे पर बात करना बंद कर देते हैं। 

(लेखक हिमांशु कुमार मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और आजकल हिमांचल प्रदेश में रह रहे हैं)

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