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सोचिए! हिन्दी का इतना तुच्छ ज्ञान अगर किसी आरक्षित वर्ग के नेता का होता तो देश में प्रलय आ जाती

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

आजकल सोशल मीडिया पर नई दिल्ली लोकसभा सीट से बीजपी सांसद मीनाक्षी लेखी के हिंदी लेखन की चर्चा हो रही है। मीनाक्षी के बहाने सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बीजेपी के एक राष्ट्र एक भाषा की विचारधारा का भी मजाक उड़ा रहे हैं। लोगों का कहना है कि हिंदी, हिंदु , हिंदुस्तान का नारा देने वाली पार्टी की नेता को शुद्ध हिंदी लिखना भी नहीं आता. वरिष्ठ सामाजिक चिंतक सुनील यादव भी मीनाक्षी लेखी के बहाने बीजेपी की विचारधारा पर सवाल खड़े करते हुए अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं कि…

मीनाक्षी लेखी के हिंदी न लिख पाने का प्रकरण सोशल मीडिया पर तैर रहा है सवाल यह नहीं है कि वो हिंदी नहीं लिख पाईं सवाल सिर्फ इतना है कि हिंदी हिंदू हिंदोस्तान का नारा बुलंद करने वाले कितने ढोंगी हैं।

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इसके साथ जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वो यह है कि इस तरह की गलती किसी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति ने की होती तो आज क्या होता …

आरक्षण भीख है वैशाखी है देश डूब गया सब खत्म हो गया जैसा हाहाकार होने लगता । इस तरह के हाहाकारी लेखी के गलत लिखने के मुद्दे पर चुप्पी मार लिए हैं जैसे उनको साँप सूंघ गया हो। [ तो पढिए इस से जुड़ा मेरी एक पुरानी टिप्पणी]

एक खराब रिपोर्टिंग करते रिपोर्टर की वीडियो वायरल हुई इस टैग लाईन के साथ की ये आरक्षण से निकलने वाले लोग हैं, कोलकाता में ब्रिज गिर गया तो उसके इंजीनियर पर तंज़ कसते हुए उन्हे आरक्षण से इंजीनियर हुए बताया गया जबकि सच्चाई ये थे कि सभी के सभी ब्राह्मण वर्ग से थे ।

कीनिया के एक लड़के की तस्वीर को फोटोशोप करके मूत्रालय में हाथ धुलते और बेसिन में पिसाब करते दिखाकर उसे भारत के किसी आरक्षित वर्ग के लड़के से जोड़कर उसका मज़ाक बनाया गया।

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एक कमरे में एक लड़का पढ़ रहा है और 4 सो रहे हैं तो उस पढ़ते हुए लड़के को अनारक्षित वर्ग और सोए लड़कों को ओबीसी एससी एसटी कटेगरी का बता कर मज़ाक उड़ाया गया।

उरी हमले के शहीदों की लिस्ट से यादव सर नेम हटाकर जबर्दस्ती द्विज जाति के सरनेम जोड़कर न सिर्फ फर्जी शहीद लिस्ट तैयार की गयी बल्कि इससे आरक्षण को जोड़कर उसका मज़ाक उड़ाया गया.

और अभी फोटो शॉप फोटो के द्वारा बाबा साहब की तस्वीर की जगह सुभास चंद्रबोस की तस्वीर लगाकर शिक्षकों को आरक्षण के द्वारा आया बताकर मज़ाक उड़ाया गया। इस तरह की हजारो लाखों तस्वीरें मानसिक विक्षिप्तों के द्वारा सोशल मीडिया पर तैराईं जा रही हैं और आरक्षण का ही नहीं एक पूरे वर्ग विशेष का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

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प्रत्येक देश के रहवासियों की एक खास बनावट होती है यही बनावट उसके स्थानीय पहचान को निश्चित करती है। कीनिया या बेस्टइंडीज में सौंदर्य के प्रतिमान उनके रहवासियों के बीच से तय होगा ठीक वैसे ही भारत के रहवासियों की कद काठी बनावट के आधार पर ही सौंदर्य के प्रतिमान तय होंगे ।

अगर अंग्रेजों के हिसाब से देखेंगे तो कीनिया बेस्टइंडीज या भारतीय लोग किसी भी तरीके से आपको सुंदर नहीं लगेंगे क्योंकि उनके अनुसार सौंदर्य का प्रतिमान गोरा होना और लंबा होना है, भारत में आज भी अंग्रेजों के मानसिक गुलाम अंग्रेजों के प्रतिमान के आधार पर सब कुछ तय करते हैं।

इस प्रतिमान ने गोरे होने, पतले होने से लेकर लंबे होने तक के तमाम प्रोडक्ट का एक बड़ा बाजार भारत को बना दिया। दुनिया भर में ब्लैक एंड ह्वाईट का विभाजन और संघर्ष साफ तौर पर देखा जा सकता है। कुछ अपवादों को छोड़ दीजिए जिसके लिए ‘करिया बाभन गोर चमार इनसे रहो सदा होशियार’ टाईप घोर नस्लीय टिप्पणियाँ प्रचलित हैं तो भारत में यह विभाजन सवर्ण और अवर्ण के विभाजन के रूप में आता है।

इसमें श्रमशील जातियों को बाक़ी जातियों से आप उनके बनावट रहन सहन के बारीक फर्क के आधार पर अलग कर सकते हैं। इन्हीं बनावट के आधार पर यहाँ के 85 प्रतिशत आबादी हमेशा मनुवादियों के टावर पर चढ़ी रहती है वह हर समय इनको नीचा दिखाने का प्रोपगंडा रचते रहते हैं।

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जिस तरह पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुष केंद्र में होता है और स्त्री हाशिये पर होती है उसी तरह समाज में वर्चस्ववादी शक्तियाँ केंद्र में और दलित पिछड़ी जातियाँ और आदिवासी समुदाय हाशिये पर फेक दिया जाता है।
सदियों से ज्ञान और संसाधनों पर कब्जा जमाए लोग अपनी झूठी बौद्धिक श्रेष्ठता के मवाद को किसी न किसी फ्रस्टेशन से बाहर निकालते रहते हैं.

अगर ये फ्रस्टेशन न निकलेगा तो वे और मानसिक विक्षिप्त होंगे इसलिए ये सब निकलना जरूरी भी है। एक पूरे समुदाय को ज्ञान से बहिष्कृत करके उनके श्रम पर एय्यासी करने वाले लोगों को शर्म भी नहीं आती है उससे अपनी तुलना करने में ।

अरे भाईयों गुरुकुल से लेकर आज तक शिक्षण संस्थानों पर आपका कब्जा रहा कभी उन्हे इनके पास फटकने तक नहीं दिया अब जब संवैधानिक प्रावधानों के तहत इस समाज से लोग शिक्षा में आ रहे हैं तो आप उनका मज़ाक उड़ा रहे हो.

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आपको तो सोचना चाहिए कि अभी इतने छोटे समय में दलित पिछड़ा तथा आदिवासी समुदाय बोलने लगा है अपने सवाल डंके कि चोट पर पुछने लगा है । वह इतिहास पढ़ ही नहीं रहा है उसमें अपने गुमनाम नायकों को तलाश भी रहा है।

वह मानसिक गुलाम नहीं हैं वह अपने खिलाफ की गई साजिसो को पहचान रहा है उसके खिलाफ मुखर हो रहा है । जहां भी जा रहा है किसी भी पोस्ट पर जा रहा है तो बेहतर काम कर रहा है।

एक तरफ खेतों में खट रहा है तो दूसरे तरफ सीमा पर खड़ा देश की सुरक्षा कर रहा है ।उसके पास काम का एक रेंज हैं। उसमें आपकी तरह नफरत नहीं है ।

अब सवाल- दुनिया के 300 विश्वविद्यालयों में कितने भारतीय विश्वविद्यालय हैं ? जबकि 99 प्रतिशत विश्वविद्यायों के कुलपति और 70 प्रतिशत शिक्षकों के पदों पर आपकी कब्जेदारी है ?

गुरुकुल से लेकर आज तक विश्वगुरु का दंभ भरने वाले लोगों ने किन शिक्षण सिद्धांतों का विकास किया ?? यह याद रहे कि 99 प्रतिशत शिक्षण सिधान्त पाश्चात्य विद्वानों ने विकसित किए हैं ।

ज्ञान के सभी क्षेत्र में चौतरफा कब्जा जमाए आपलोगों ने किन चीजों कि खोज की ? जबकि ह्यूमन बॉडी को कंफर्ड देने वाली सभी चीजों की खोज विदेशियों ने की है।

इसलिए मेरा विनम्र आग्रह है कि समाज में नफरत बहुत फैल चुकी है अब तो चैन लीजिए हुजूर आपलोग ।

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