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मोदी राज में किसानों की आत्महत्या 42 फीसदी बढ़ी, खेतिहर जातियां बन गई हैं वोट बैंक

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक किसानों के आंदोलन जारी है. अपनी बदहाली पर रो रहे किसान की समस्या ये है कि उसकी कोई सुनने वाला नहीं. क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 42 फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई है.

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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 6 जनवरी 2017 के आंकड़ों के मुताबिक देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 41.7 प्रतिशत बढ़ गई है. मरने वाले किसानों में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के हैं। रिपोर्ट में एक दिलचस्प बात यह भी है कि कर्ज की वजह से आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसानों ने सरकारी बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से कर्ज लिया था और वे दीवालिया हो गए थे।

कुर्मी-पाटीदार- कुनबी- पटेल जैसी किसान जातियों की स्थिति खराब- 

मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन में मरने वालों में कन्हैयालाल पाटीदार, बबलू पाटीदार, प्रेम सिंह पाटीदार चैनराम पाटीदार, अभिषेक पाटीदार हैं। यह गुजरात मूल के कुनबी पाटीदार समुदाय से हैं। इसी तरह से महाराष्ट्र में संतरे व अंगूर की खेती करने वाले ज्यादातर मराठा-कुनबी हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में इन्हें कुर्मी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में महतो कहा जाता है। इन्हीं से मिलती जुलती कृषक जातियां आंध्र प्रदेश की रेड्डी, कम्मा, तेलंगाना के कापू, कर्नाटक के लिंगायत, वोक्कालिंगा और वेल्लाल हैं।

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आरक्षण, गैर आरक्षण और ऊंच नीच में विभाजित इन एक ही जातियों/पेशेवरों का कोई राष्ट्रीय स्वरूप नहीं है। इनका कोई राष्ट्रीय अस्तित्व नहीं है। अलग अलग दलों में बंटे और राजनीतिक पिछलग्गू के रूप में अपनी अपनी खिचड़ी अलग अलग पकाते हैं।

अगर आरक्षण के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश और बिहार के कुर्मियों को अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण है, जबकि गुजरात के पटेल-पाटीदार और महाराष्ट्र के मराठा-कुनबी में कुछ को और कापू, रेड्डी को आरक्षण नहीं मिलता है। महाराष्ट्र में कुछ कुनबी को आरक्षण मिल रहा है, कुछ आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कापू- जिसका शाब्दिक अर्थ होता है खेती करने वाला- में तेलागा और बालिजी दो हैं। बालिजी को आरक्षण है, तेलागा को नहीं। बिल्कुल मराठा-कुनबी वाला मामला तेलागा-बालिजी का है।

किसानों की क्या है समस्या- 

असल समस्या क्या है इन किसानों की ? पिछले 3 साल से कृषि उत्पादों के मूल्य आधे से भी कम रह गए हैं। किसान जहां पिछले साल 50 रुपये किलो अंगूर बेचता था, इस साल 14 रुपये किलो बिका। किसानों का संतरा तो 2 रुपये किलो तक बिका।
मंदसौर में पिछले साल मेथी 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल थी जो इस साल 2,500-3,000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है। नासिक के लासलगांव मंडी में प्याज पिछले साल 800 रुपये क्विंटल था, जो अब 300 से 400 रुपये क्विंटल है। सोयाबीन के भाव पिछले साल के 3,500-3,600 रुपये क्विंटल से घटकर इस साल 2,700-2,800 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गए हैं। आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च पिछले साल के 12,000 रुपये प्रति क्विंटल से घटक इस साल 2,500-3,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है, जिसकी वजह से तेलंगाना के गुंटूर, कुर्नूल, खम्मम में किसानों ने अपनी फसलें जलाईं और सड़कें जाम की.

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मध्य प्रदेश के रतलाम, नीमच आदि वाले इलाके में किसान न सिर्फ सोयाबीन, गेहूं और चने की खेती करते हैं, बल्कि वे मसाले, औषधीय पौधों, मेथी, धनिया, जीरा, अजवाइन, अदरक, इसबगोल, सफेद मूसली व अश्वगंधा की खेती करते हैं। उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में तंबाकू की खेती होती है।

फलों और औषधीय पौधों में आमदनी ज्यादा होती है, लेकिन लागत भी खूब लगती है। इसके पहले किसान बैंकों से कर्ज लेते थे और फसल बिकते ही चुका देते थे। अब किसान दीवालिया हो रहे हैं। कुछ आत्महत्या कर रहे हैं, कुछ विरोध प्रदर्शन करके सरकार की लाठियां और गोलियां खा रहे हैं।

अब सुनने में आ रहा है कि मध्य प्रदेश में जिन किसानों की हत्या की गई है, शिवराज सरकार ने उनके शव पर एक करोड़ रुपये रख दिए हैं।
किसानों की असल समस्या कर्जमाफी या सब्सिडी देने को लेकर नहीं है। वे अपने उत्पादों का दाम मांग रहे हैं। उन्होंने बैंकों से कर्ज लेकर मोटी पूंजी लगाकर अनाज उपजा दिया, लेकिन उसका दाम नहीं मिल रहा है।

इस सरकार ने ई- मंडी बनाने के चक्कर में पूरी मंडी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। नोटबंदी ने मौजूदा मंडी व्यवस्था की कोढ़ में खाज पैदा किया। परिणाम यह है कि किसानों का माल औने पौने भाव बिक रहा

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