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गर्व करिए ! इस देश में अंगरक्षक ना सही राष्ट्रपति के घोड़ों की लीद उठाने लिए OBC-SC के पद आरक्षित हैं

नई दिल्ली। नेशनल  जनमत ब्यूरो 

देश में जहां पिछले रास्ते से आरक्षण खत्म करने की कवायद जारी है, वहीं अमानवीय कार्यों में आज भी दलित-ओबीसी के लिए अघोषित आरक्षण लगा हुआ जिसे कोई भी खत्म भी नहीं करना चाहता।

हैरत की बात देखिए देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए भी जातिवादी विज्ञापन निकाला गया है। अंगरक्षक में दलित ओबीसी नहीं चाहिए लेकिन घोड़े की लीद उठाने के लिए ओबीसी-एससी ही चाहिए। अब देखिए बकायदा हल्ला मचाकर एक दलित समाज के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाया गया है तो रामनाथ कोविंद क्या बदलाव ला पाते हैं इन जातिवादी आदेशों में।

राष्ट्रपति के अंगरक्षक के पद पर भर्ती का विज्ञापन सुर्खियों में है। इस विज्ञापन के अनुसार, आज़ादी के 70 साल बाद भी राष्ट्रपति का अंगरक्षक ख़ास धर्म और जाति के लोग ही बन सकते हैं। अंगरक्षक के पद के लिए भर्ती रैली होगी जिसमें सिख (मजहबी, रामदासिया, एससी और एसटी को छोड़कर) जाट और राजपूत की भर्ती की जाएगी।

सिर्फ तीन जाति के लोगों को यह पद दिए जाने पर लोग सवाल खड़े कर रहे हैं। इसमें ब्राह्मणों के लिए भी जगह नहीं। राष्ट्रपति के अंगरक्षक अकसर घोड़ों पर उनके आगे पीछे चलते नजर आते हैं। इन घोड़ों की देखभाल और लीद उठाने के लिए आरक्षण का ख्याल रखा गया है।

लीद उठाने के लिए तीनों पद आरक्षित-

घोड़ों की लीद उठाने के लिए तीन पद हैं। इसमें ओबीसी के लिए एक पद है। वहीं एससी के लिए दो पद हैं। अभ्यर्थियों को दसवीं पास के साथ घोड़ों की देखभाल का एक साल का एक्सपीरियंस भी होना चाहिए। इसमें आवेदन की तिथि निकल चुकी है। वहीं टेस्ट 16 अगस्त को होगा।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हो गई थी लीद एलर्जी-

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को कुछ दिनों पहले घोड़े की लीद से एलर्जी हो गयी। राष्ट्रपति अपनी शाही बग्गी में बैठकर संसद की संयुक्त बैठक को संबोधित करने पार्लियामेंट जा रहे थे। वहां पहुंचकर उन्होंने अपना अभिभाषण तो ठीक-ठाक पढ़ दिया लेकिन उसके बाद उन्हें छींकें आने लगीं। तुरंत राष्ट्रपति भवन के स्पेशल डॉक्टर को बुलाया गया, जिसने उन्हें एलर्जी की पुष्टि कर दी।

उनकी देखभाल कर रहे डॉक्टर लोकेश लिद्दर ने बताया कि “राष्ट्रपति जी को ‘एलर्जी’ हुई है, जो अक्सर घोड़ों के संपर्क में आने से हो जाती है। मैं पहले भी कई बार मना कर चुका हूं कि उन्हें बग्गी में नहीं चलना चाहिये लेकिन मेरी सुनता कौन है!”

“हमारे राष्ट्रपति के लिये करोड़ों रुपये की मर्सिडीज लिमोजिन खड़ी हैं और वे गोलों-हथगोलों से भी सेफ़ हैं। लेकिन उनमें खड़े-खड़े जंग लग रहा है और ये सैंकड़ों घोड़ों को पाल रहे हैं, वो भी सिर्फ़ 500 मीटर के लिये! और उसकी भी नौबत साल में दो बार ही आती है!” -डॉ. लिद्दर ने हैरानी जताते हुए कहा।

 

इस भर्ती प्रक्रिया पर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक  चिंतक  दिलीप मंडल लिखते हैं…

यह भी कोई देश है महाराज?
राष्ट्रपति भवन में इस समय अनुसूचित जाति का एक नागरिक बैठा है। लेकिन अनुसूचित जाति का कोई शख़्स उनकी सुरक्षा करने वाली अंगरक्षक टुकड़ी में तैनात नहीं हो सकता। आदिवासी भी नहीं। पटेल, अहीर, मौर्य, कुम्हार, तेली कोई नहीं। मुसलमान, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी भी नहीं।

यह भारत सरकार का नियम है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। आज कई अख़बारों में राष्ट्रपति अंगरक्षक की भर्ती की सूचना है। यह सेना की एक यूनिट है।

सरकार ने साफ़ कहा है कि हिंदू राजपूत, हिंदू जाट और जाट सिख ही अप्लाई कर सकते हैं। यह परंपरा आज़ादी के समय से जारी है।

हरियाणा के रेवाड़ी के एक यादव जी ने सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि हम इस फ़ौज में क्यों नहीं जा सकते।

इसपर सेना ने 2013 में हलफ़नामा दाख़िल किया कि यह सही है कि तीन जातियों के लोगों को ही राष्ट्रपति का बॉडीगार्ड बनाया जाता है। “लेकिन यह जातिवाद नहीं है।”

 

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