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मोदीराज में रिटायरमेंट के बाद क्यों बोलते हैं लोग, अब SBI चेयरपर्सन बोलीं नोटबंदी ‘अधूरा’ फैसला था

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों की गिरफ्तारी, हमलों और हत्याओं से इतना तो साफ है कि ये सरकार बोलने की आज़ादी और आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर रही है। मोदी सरकार में फैले खौफ का एक बड़ा प्रमाण ये भी है कि जब कोई नौकरशाह रिटायर हो जाता है तब अपने मन की बात करता है।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने रिटायरमेंट के बाद नोटबंदी को असफल योजना बताया था। अब भारतीय स्टेट बैंक की  चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने गुरुवार को रिटायरमेंट होते ही नोटबंदी की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं।

पूर्व एसबीआई चेयरपर्सन ने कहा बैंकों को नोटबंदी की तैयारी के लिये और समय दिया जाना चाहिए था, इतना बड़ा फैसला जल्दबाजी में अधूरी तैयारियों के साथ लिया गया। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के दौरान बैंकों पर काफी दबाव पड़ा है। अरुंधति ने एक मीडिया कार्यक्रम में कहा, अगर हम किसी नई तरह की चीज के लिये पूरी तरह से तैयार होते हैं, तब यह ज़्यादा सार्थक और बेहतर होता।

उनकी ये टिप्पणी मोदी सरकार की नोटबंदी की तैयारी पर सीधा सवाल उठती है। साथ ही नोटबंदी दौरान बैंकों में पैसे की कमी और इस कारण जनता द्वारा उठाई गई परेशानियों का कारण भी बताती है।

अब सोशल मीडिया में इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि मोदी सरकार में अधिकारी अपने मन की बात क्यों नहीं कर पाते। एसबीआई की चेयरपर्सन रहते हुए अरुंधती ने ये बयान क्यों नहीं दिया? क्या उन्हें किसी का डर था ? इसी तरह आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपना कार्यकाल ख़त्म होने के एक साल बाद सितम्बर 2017 में नोटबंदी को लेकर चुप्पी तोड़ी।

राजन ने कहा था कि वो नोटबंदी के पक्ष में नहीं थे। इस तरह के विघटनकारी फैसलों से अल्पावधि में होने वाले नुकसान इसके लम्बी अवधि से होने वाले फायदों से ज़्यादा होंगे।

इस बारे में कांग्रेस नेता तरुण पटेल कहते हैं कि मोदी सरकार लोकतंत्र के हर स्तम्भ को खत्म कर तानाशाही रवैये के साथ शासन चलाना चाहती है। सिर्फ कुछ गिने चुने लोग ही सरकार में फैसले ले रहे हैं। नौकरशाहों को भी सच बोलने पर अपना पद जाने का डर बना हुआ है। आप लोग पत्रकार विनोद वर्मा के मामले में छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार का रवैया देख ही रहे हैं।

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