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“सहारनपुर हिंसा की जड़ मुजफ्फरनगर दंगों और जाटों को हिंदू बनाये जाने में है”

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

देश में लोकतंत्र और संविधान को बचाये रखने के लिए किसी भी जाति को अति हिन्दुत्ववाद से बचना होगा. लच्छेदार शब्दों से बनी छद्म राष्ट्रवादिता के भ्रमजाल से बाहर आना होगा. चौधरी चरण सिंह के समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश दंगों और जातीय संघर्ष के लिए बल्कि किसानों के संघर्ष के लिए जाना जाता था. लेकिन अब वहां के माहौल में ऐसी कौन सी चीज घुल गई कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश अशांत हो गया. कहीं ये सोची समझी रणनीति और राजनीतिक साजिश तो नहीं.

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स्वतंत्र पत्रकार और राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता जितेन्द्र महला बता रहे हैं कि कैसे जाटो को बीजेपी और संघ वाला हिन्दू बवाकर अन्य जातियों और धर्म के खिलाफ लड़वा दिया गया पढ़िए उनका लेख-

चौधरी चरण सिंह के रहते धर्म राजनीति में नहीं घुस पाया- 

पश्चिमी यूपी का  इलाक़ा चौधरी चरण सिंह का इलाक़ा रहा है. जाटों की राजनीतिक और सामाजिक जागृति का प्रतीक रहा है. इसी इलाके ने चरण सिंह को अविभाजित उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री, देश का प्रधानमंत्री बनाया. इसी इलाके ने दशकों तक किसान एकता के बल पर दिल्ली की नाक में दम करके रखा. चौधरी चरण सिंह, महेंद्रसिंह टिकैत और दूसरे किसान नेताओं ने कभी भी राजनीति में धर्म को नहीं घुसाया.

वे राजनीति और धर्म को हमेशा अलग-अलग रखते थे. मनुवादी स्वयं सेवक संघ और बीजेपी को कभी भी उन्होंने पश्चिमी यूपी में फटकने नहीं दिया. चरणसिंह के प्रधानमंत्री रहते हुये मंडल कमीशन की स्थापना हुई और बाद में वहीं मंडल कमीशन ओबीसी के लिए शिक्षा और नौकरियों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी या आरक्षण का आधार बना.

चौधरी चरणसिंह ने यूपी, बिहार, हरियाणा और राजस्थान में सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव डाली. जिस पर आगे चलकर लालू यादव, मुलायमसिंह यादव, कांशीराम, मायावती, नितीश कुमार जैसे नायकों ने अपना-अपना रास्ता बनाया.

मुजफ्फरनगर दंगा प्रायोजित था- 

साल 2013 में 27 अगस्त से 13 सितंबर तक चले मुजफ्फरनगर दंगों ने इस पूरे इलाक़े को सामाजिक और राजनीतिक रूप से बदल कर रख दिया. यह दंगा संघ प्रयोजित दंगा था, जिसमें बाद में बीजेपी के संगीत सोम की गिरफ्तारी हुई. बीजेपी और भारतीय किसान यूनियन के सत्रह नेताओं पर एफआईआर दर्ज़ हुई. दंगों में 21 दिनों में 43 लोगों की ज़ान गई और 93 लोग घायल हुये.

मुजफ्फरनगर दंगों को ब्राह्मणवादी मीडिया ने ख़ुलकर जाट-मुस्लिम दंगों के तौर पर प्रचारित किया. 30 अगस्त 2016 को नंगला मंदौड़ में जाटों की महापंचायत में बीजेपी नेताओं ने मुसलमानों से बदला लेने का आह्वान किया. जाटों को ज़मकर हिंदू बनाम मुसलमान के खेल में धकेला गया. बार-बार उनको हिंदू के नाम पर भड़काया गया और मुसलमानों के ख़िलाफ खड़ा किया गया.

यहीं से जाट जाट नहीं रहें वे बीजेपी वाले हिंदू बन गये- 

जाटों ने अपने इतिहास, महापुरुषों और विरासत को भुला दिया. ऐसा होते ही इस पूरे इलाके की पकड़ जो अब तक जाटों के पास थी, वह पकड़ सवर्णों के हाथ में चली गई और जाटों को हिंदू बना दिया गया. बाद में कैराना, सुनपेड, अखलाक़ और बिजनौर एक के बाद एक होते चले गये.

सहारनपुर उसी कड़ी का अगला हिस्सा है. जाट बीजेपी वाले हिंदू बनकर मदहोश पड़े हैं और मुसलमानों और दलितों को मनुवादी स्वयं सेवक संघ और उसकी राजनीतिक शाखा बीजेपी ने आंच पर चढ़ा दिया है. यह इलाका मुसलमानों और दलितों के लिए सबसे मुश्किल जगह बन गया है. धीरे-धीरे इसका असर राजस्थान हरियाणा तक हो रहा है. राजस्थान में पहलु ख़ान की हत्या भी इसी माहौल का नतीजा है. यह इलाका गंभीर रूप से जातिय और धार्मिक नफरत की तरफ बढ़ रहा है.

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पिछड़ी जाातियों को अपना हक मांगना होगा- 

यहाँ से हमें सबक मिलता है कि पिछड़ी जातियों के संघ के चंगुल में फंसने से भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह ख़तरे में आ जाता है. देश के मुसलमानों और दलितों का ज़ीना दूभर हो जाता है. बाबरी विध्वंस के समय जिस तरह पिछड़ें संघ के चंगुल में फंसे थे, ठीक वैसे ही आजकल जाटों, यादवों, पटेलों और दूसरी पिछड़ी जातियों का संघ के चंगुल में जाने का दौर है.

पिछड़ी जातियों का हिंदू बनना भारतीय संविधान और लोकतंत्र पर गंभीर ख़तरा है. इससे देश के सबसे कमजोर तबके मुसलमानों, दलितों, मजदूरों, युवाओं, औरतों और किसानों पर अंतहीन शोषण का सिलसिला शुरू हो गया है.

भारतीय लोकतंत्र और संविधान को बचाये रखने के लिए पिछड़ी जातियों को संघ के चंगुल से बचाना ही एकमात्र विकल्प है.

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