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संघ का ‘उग्र हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद’ ब्राह्मणवादी सत्ता को बनाए रखने का एक छलावा मात्र है !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

वंचितों और मजलूमों के जरूरी मुद्दों को राष्ट्रवाद के छलावे में दफन कर देने की परंपरा बहुत पुरानी रही है। जब भी आप अधिकार मांगने की कोशिश करोगे जातिवादी मठाधीश आपकी आवाज भारत माता की जय और बंदेमातरम के शोर में दबा देंगे। इस महत्वपूर्ण मुद्दे को मानवाधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक चिंतक हिमांशु कुमार ने बखूबी समझाने की कोशिश की है-

“हेडगवार ने कहा था कि शूद्रों और मलेच्छों से हिन्दू धर्म को मिलने वाली चुनौती का सामना करने के लिए हमने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की है”।।

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आधुनिक राष्ट्रवाद- 

आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय का इतिहास नए राष्ट्र-राज्यों के निर्माण के बाद से शुरू होता है। यूरोप में लम्बे समय तक युद्ध चले और वहाँ राष्ट्रों का निर्माण भाषा के आधार पर हुआ, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली आदि देश भाषा के आधार पर बने, चूंकि यह देश लम्बे समय तक युद्धों में लगे रहे थे इसलिए वहां राष्ट्रवाद दूसरे राष्ट्रों के प्रति घृणा, सेना की सर्वोच्चता और शांतिवादियों को देशद्रोही समझने पर आधारित रही।

भाप के इंजन की खोज के बाद जब पुराने ज़मींदार और रजवाड़े नए पूंजीपति और उद्योगपति बन गए। उसके बाद सरकारों पर काबू करने और अपने पक्ष में नीतियां बनवाने का खेल शुरू हुआ। इसके बाद सरकारों द्वारा जनता के फायदे के लिए खर्च करने के बजाय उद्योगपतियों के फायदे के लिए खर्च करवाना, जनता का ध्यान सरकार की इस चालाकी से हटाने के लिए राष्ट्रवाद का शोर खड़ा करना शुरू हुआ।

हिटलर और मुसोलिनी का विकृत राष्ट्रवाद इनकी प्रेरणा- 

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इस सन्दर्भ में हम इटली और जर्मनी के राष्ट्रवाद की दुर्घटनाएं देख सकते हैं, इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने पूंजीपतियों और बड़े किसानों को अपने साथ मिला कर मजदूरों की हड़तालों को तोड़ने के लिए उन पर हमला करना, लिबरल्स और साम्यवादियों पर हमला करना शुरू किया, मुसोलिनी ने भी इटली को दुनिया का सबसे ताकतवर राष्ट्र बनाने का आह्वान किया था, मुसोलिनी काली कमीजें पहनने वाले युवाओं की एक सेना रखता था जो विरोधियों पर हमला करते थे।

इसी तरह हिटलर ने भी राष्ट्रवाद का एक प्रयोग किया, हिटलर का राष्ट्रवाद जर्मन नस्ल के लोगों की श्रेष्ठता पर आधारित था। हिटलर के साथ भी वहाँ के पूंजीपति और सेना के अधिकारी थे, हिटलर ने देश के अंदर साठ लाख यहूदियों और पचास लाख उदारवादियों, कम्युनिस्टों, समलैंगिकों और राजनैतिक विरोधियों को मार डाला, इसके अलावा हिटलर ने भी जर्मनी को दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाने के लिए युद्ध छेड़ दिया।

अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले आदिवासियों ने संघर्ष शुरू किया- 

भारत तो पहले एक राष्ट्र नहीं था। भारत रजवाड़ों और छोटे-छोटे रियासतों में बंटा हुआ था। भारत में राष्ट्रवाद का उदय भारत में आज़ादी की लड़ाई के दौरान हुआ। अंग्रेज़ी राज के खिलाफ आदिवासियों ने संघर्ष शुरू किया, उसके बाद अट्ठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम हुआ, भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज खत्म हुआ और भारत को अंग्रेजों ने एक राज्य का स्वरूप देना शुरू किया, यानी एक ऐसी इकाई जिसकी एक मुद्रा हो, एक कानून हो, एक सरकार हो, एक ही सत्ता केंद्र हो।

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1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई जिसमें अनेकों विचारधारा के लोग शामिल हुए और ऐसा लगने लगा कि भारत एक राष्ट्र बन रहा है, आजादी की सुगबुगाहट भी शुरू हो गई थी। दलितों में भी नई चेतना आनी शुरू हो गई थी। पूना में सावित्री बाई फुले- ज्योतिबा फुले और फातिमा शेख ने महिलाओं शूद्रों और मुसलमानों की शिक्षा की शुरुआत कर दी थी।

सवर्णों ने अंग्रेजों के बाद सत्ता अपने पास रखने के लिए हिन्दू महासभा बनाई- 

दलित चेतना और मुस्लिम शिक्षा से घबरा कर भारत के सवर्ण और आर्थिक सत्तावान वर्ग के लोगों ने अंग्रेजों के बाद भी सत्ता अपने हाथों में रखने के लिए हिन्दू महासभा की स्थापना की, इसमें से कुछ लोगों ने निकल कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। हेडगवार ने कहा था कि शूद्रों और मलेच्छों से हिन्दू धर्म को मिलने वाली चुनौती का सामना करने के लिए हमने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की है।

इसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दू महासभा ने हिन्दू राष्ट्र का निर्माण और उसके लिए उग्र राष्ट्रवाद की राजनीति को शुरू किया,
हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना भारत के परम्परागत शासक वर्ग ने की थी।

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भारत का परम्परागत शासक वर्ग कौन था ?

पहले भारत में राजा थे, राजा की सेना के अधिकारी थे, पुरोहित थे, और व्यापारी थे। यह लोग शरीर से मेहनत नहीं करते थे, इनके पास सामाजिक सत्ता थी, राजनैतिक सत्ता थी और आर्थिक सत्ता भी थी, यही भारत का शासक वर्ग था।

दूसरी तरफ भारत में किसान थे, मजदूर थे और कारीगर थे। इन लोगों को शूद्र और नीच घोषित किया गया, इन लोगों के धन एकत्र करने पर बंदिश लगाई गई और बड़े टैक्स लगा दिए गए। इन लोगों को सामाजिक तौर पर नीचा घोषित किया गया और राजनैतिक तौर पर इन्हें बिल्कुल कमज़ोर रखा गया। मनुस्मृति में लिखा गया कि यदि कोई शूद्र धन एकत्र कर ले तो राजा को चाहिए कि वह उस धन को ले ले।

भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान यह साफ़ होने लगा था कि आजादी के बाद भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की स्थापना होगी भगत सिंह, डॉ. अम्बेडकर और गांधी तीनों ही समानता और न्याय की बात कर रहे थे।

शासक जातियों को लगा समानता आएगी तो हमारी जातिगत सत्ता छिन जाएगी- 

वैसे तो जाति और आर्थिक वर्ग अलग-अलग होता है लेकिन भारत में जो सवर्ण जातियां हैं वही उच्च वर्ग भी हैं,ऐसे में यह शासक जातियां जो शासक वर्ग भी था वे डरने लगी थीं, इन्हें लगा कि अगर समानता आ गयी तो हमारा सब कुछ खत्म हो जाएगा, इसलिए इन्होनें भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा को स्थापित करना और उसे हवा देना शुरू कर दिया।

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समाज में समानता नहीं हिंदू पुर्नजागरण लक्ष्य बनाते हुए इन्होंने कहा कि भारत के नौजवानों को हिन्दू मुस्लिम-समानता, और शूद्रों की समानता के लिए नहीं बल्कि हिन्दू राष्ट्र, और स्वर्णिम युग की पुनर्स्थापना के लिए काम करना चाहिए। तो भारत के राष्ट्रवाद की नींव एक सम्प्रदाय की सर्वोच्चता और सवर्ण जातियों की श्रेष्ठता पर रखी गई।

इन उग्र राष्ट्रवादियों ने मुसोलिनी और हिटलर को अपना आदर्श बनाया और उसी की नकल पर काली टोपी, परेड करना और हथियार रखना शुरू किया। इन्होंने भगत सिंह की फांसी का मज़ाक उड़ाया। सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज से लड़ने के लिए अंग्रेजों की फ़ौज में भारतीय युवकों का भर्ती करने का अभियान चलाया। इनके पास हथियार थे इन्होंने कभी भी अंग्रेजों के खिलाफ उन हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन आजादी मिलते ही गांधी को गोली मार दी।

दो राष्ट्रों का सिद्धांत इनकी उपज- 

इन्हीं लोगों की साम्प्रदायिक नफरत के कारण भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत मुस्लिम लीग से पहले हिन्दू महासभा ने पारित किया था।

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आजादी मिलते ही इन लोगों ने भारत की आजादी को समानता और न्याय से मोड़ कर राम मन्दिर की तरफ मोड़ने का षड्यंत्र किया और 1948 में ही ताला तोड़ कर रात को बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रख दीं।

राम को नायक बनाकर हिस्सेदारी के आंदोलन को धर्म के नीचे दफना दिया- 

जिस कलेक्टर नायकर ने बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रखवाई वह बाद में जनसंघ के टिकट पर सांसद बना। यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि राम के बारे में तब तक भारत की जनता नहीं जानती थे, यहाँ तक की भक्ति काल जो मुगलों के समय में ही विकसित हुआ, उसमें कृष्ण पर तो लिखा गया लेकिन राम पर नहीं लिखा गया।

राम पर वाल्मीकी ने संस्कृत में रामायण लिखी थी, लेकिन जनता संस्कृत नहीं जानती थी इसलिए राम के बारे में आम लोग नहीं जानते थे और ना ही तब तक कोई राम मन्दिर बना था। तुलसीदास ने अवधी भाषा में राम चरित मानस लिखी और राम का चरित्र आम जनता को पता चला, उसके बाद अयोध्या में राम मन्दिर बनने शुरू हुए, अयोध्या में चार सौ से ज्यादा मन्दिर हैं और उन सभी के पुजारियों का दावा है कि उन्हीं का मन्दिर असली राम जन्म भूमि है।

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बाबर के समय नहीं था राम मंदिर- 

तुलसीदास अकबर के समय में हुए थे और उसके बाद मन्दिर बने हैं। अकबर बाबर का पोता था, इसका मतलब है मन्दिर पोते के टाइम में बने, तो उस मन्दिर को दादा ने कैसे तोड़ दिया ? लेकिन भाजपा ने इसी झूठ को अपनी राजनीति का आधार बनाया।

शाखाओं के माध्यम से अपनी अतिवादी सोच बच्चों पर थोपने का षडयंत्र- 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपनी शाखाओं, सरस्वती शिशु मन्दिरों और विवेकानन्द फाउंडेशन के माध्यम से बच्चों, युवकों और बुजुर्गों सब को अपना शिकार बनाया और उनके दिमागों में ज़हर भरना जारी रखा। इसके परिणाम स्वरूप इनके पढ़ाये हुए लोग आज नौकरशाही में, राजनीति में, पुलिस में फौज में, न्याय पालिका में बैठ गए हैं। यह लोग आज भारत की सत्ता पर पूर्ण रूप से कब्ज़ा कर चुके हैं।

इनके ऊपर आज कार्पोरेट का वरदहस्त है, यह लोग कानूनों में बदलाव करके उन्हें फायदा पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं, ज़मीनों पर कब्जा करवाना, और सरकारी नियंत्रण वाले उद्योगों को इन कार्पोरेट के हवाले करने का इनका काम चल रहा है। इनके हाथ में सत्ता बनी रहे इसके लिए यह लोग जनता को हिन्दू मुसलमान, ईसाई विरोध, कम्युनिस्टों का विरोध, गांधी का विरोध करने में लगा रहे हैं।

कुल मिलाकर राष्ट्रवाद का यही नुकसान है, इसमें लोग फर्जी नफरतों में मज़ा लेने लगते है और अपनी ज़िन्दगी से जुड़े मुद्दे पर बात करना बंद कर देते हैं,

 

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