संतोष पटेल के काव्य संग्रह ‘जारी है लड़ाई’ पर डॉ. राकेश कबीर की बेबाक समीक्षा-नेशनल जनमत

नई दिल्ली, डॉ. राकेश कबीर

लड़ते रहो कि बिना लड़े कुछ नहीं मिलता-

हमारे विश्वविद्यालय की दीवारों पर एक नारा लिखा जाता था ‘लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को’. दुनिया के सभी समाजों में दो तरह के लोग पाए जाते हैं, एक जिनके पास शक्ति, सत्ता, उत्पादन के स्रोत, भूमि और अन्य साधन उपलब्ध है और दूसरा वह वर्ग जिसे रोज-रोज अपनी दैनिक मूलभूत आवश्यकता के लिए जद्दोजहद करनी है.

संतोष पटेल के काव्य संग्रह की कवितायें उसी वंचित, शोषित वर्ग के पक्ष में लड़ने वाली मशालधारी कवितायें हैं जो अभिव्यक्ति में एकदम सीधी हैं. संग्रह की कविताओं को एक एक करके पृष्ठ दर पृष्ठ पढ़ते जाईये तो ये साफ़ पता चलता है कि प्रतिक्रियावादियों, यथास्थितिवादियों की अमानवीय हरकतों को समझते हुए उनसे भिड़ने की जो मंशा है वो न केवल मुसलसल बनी रहती है बल्कि गझिन होती जाती है.

शोषण के जितने विविध आयाम, विविध रंग शोषक वर्ग ने बना रखें हैं उनका बहुरंगी जवाब या सामना भी उतने ही विविधधर्मा रंगों से करना सजग कवि को अच्छे से आता है.

कौन हैं कवि संतोष पटेल ?

कवि और गीतकार पिता डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना जी के सुयोग्य पुत्र संतोष जी कोई ख्याली बुनावट और शब्दों के हेर फेर वाले कवि नही हैं वे एक अधिकारी हैं, भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने को संघर्षरत एक समर्पित कार्यकर्ता, संगठनकर्ता हैं और अपने सघन कार्यों और संघर्षों से प्राप्त अनुभवों की डेहरी से निकली उनकी रचनाओं के आयाम भी विविध हैं.

बिहार राज्य के मोतिहारी जिले के एक गाँव से तालुक रखने वाले संतोष में गजब की मिठासभरी वाक्पटुता है. वे अपनी भाषाई मुहावरों का ऐसा प्रयोग करते हैं जिनमे विरोधियों और चमन चेलों को धराशायी कर देने की अद्भुत क्षमता है. मेरी अपेक्षा है कि वे ‘भोर भिनसार’ और ‘अदहन’ जैसी भोजपुरी के अपने काव्य संग्रहों की मारक कविताओं की भांति हिंदी की कविताओं में भी लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग कर अपनी रचनाओं को और धार दें.

क्या खास है ‘जारी है लड़ाई’ में ?

उनके कविता संग्रह “जारी है लड़ाई” की कविताओं का ज़िक्र करें तो हम पाते हैं कि उन्होंने सामयिक और ज्वलंत मुद्दों पर खुलकर अपनी लेखनी चलाई है. वे एक जागरुक और सचेतन कवि हैं इसका ज़िक्र वे अपनी भूमिका में खुद करते हैं, “समाज के हर क्षेत्र से प्राप्त हुए अनुभव मुझे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक विसंगतियों के विरुद्ध चुप रहने की इजाजत नहीं देते.

मेरे अनुभव मन को उद्वेलित करते करते हैं कि इन असमानताओं के खिलाफ युद्धरत रहूँ और इसकी ही परिणति है यह कविता संग्रह ‘जारी है लड़ाई’. वर्ण, जाति आधारित भेदभाव, अशिक्षा, गरीबी, भूखमरी, अंधभक्ति, अंधविश्वास और हर तरह के भेदभाव विरुद्ध लड़ने का उनका अपना दृढ संकल्प है जिसे वे केवल शब्दों में ही नहीं सड़क पर उतरकर भी करना जानते हैं जिसमे बड़े दिल से सभी को शामिल कर नेतृत्व करना भी संतोष को आता है.

संतोष की कविताओं को पढ़ते हुए एक बात स्पष्ट हो जाती है कि वे मुद्दों के माध्यम से सीधा अटैक करते हैं इसलिए मैं उन्हें ‘अभिधावादी’ या ‘डायरेक्ट अटैकवादी’ कहता हूँ.

संग्रह की पहली ही कविता है ‘माउंटेन मैन दशरथ मांझी’ जो उत्कृष्ट प्रेम के लिए दृढ संकल्प और संघर्ष की कहानी है. कवि मुमताज और ताजमहल के बरक्स फागुनी देवी और दशरथ मांझी द्वारा बनाये गये रास्ते को खड़ा करके साबित कर देते हैं कि एक आदिवासी मेहनती व्यक्ति का प्रेम शाहजहाँ के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण और ऊंचा है क्योंकि बादशाह अपने हुक्म से अपनी सुंदर पत्नी की याद में ताज का निर्माण करता है।

जिसमें राजकोष से धन खर्च होता है. मांझी की पत्नी हो सकता है कि सुकोमल और सुदर्शना न हो लेकिन दशरथ की नजर में वह सबसे सुंदर पत्नी है जिसको खोने के बाद पहाड़ को काटकर उन्होंने सुगम राह बनाई जो केवल उनके दृढ संकल्प और लगन को ही नहीं प्रदर्शित करती बल्कि प्रेम के प्रति उनके इस समर्पण से आम जनमानस का जीवन भी सदैव के लिए सुगम हो जाता है. यह प्रेम की व्यष्टि से समष्टि तक की यात्रा है जो सदियों तक मानव मात्र को प्रेरणा देती रहेगी.

वे लिखते हैं क्योंकि दशरथ मांझी/आज व्यष्टि से समष्टि का परिचायक बन चुका है। व्यक्तिवाचक से भाववाचक/लाख अभावों के बाद श्रमण संस्कृति का यह प्रेम बादशाह के विरह और प्रेम से बड़ा हो जाता है और ऐसा कहना ही प्रतिबद्ध कवि की ज़िम्मेदारी है.

घंटियाँ बजती हैं तो अपनी तरफ खींचती हैं भक्त को मंदिर की तरफ, विद्यार्थी को स्कूल की तरफ और फेरीवालों की घंटी बच्चों को अपनी तरफ मिठाई, फल या खेल तमाशे के लिए. तय लोगों को करना है कि किधर जाना है?

कवि जागरूक व्यक्ति है वह कहता है कि फेरीवालों की घंटियां रोजी-रोटी से जुडी हैं इसलिए वे महत्वपूर्ण हैं, अम्बुलेंस को रास्ता देना चाहिए ताकि किसी बीमार व्यक्ति की जान बच सके. घंटियाँ अलग-अलग आवाजों में बजकर अपने सन्देश दे रही हैं लेकिन कवि की सम्वेदना देखिये वह बीमार और श्रम करने वाले के पक्ष में खड़ी है.

‘जूता’ शीर्षक कविता में कवि की कल्पना की रेंज देखिये वह विविध रंग-रूप में बने जूतों को परमार्थ में लगा हुआ बताते हैं जो अनेको तरह के कार्य संपादित कराने में मदद करता है. वस्तु कोई भी हो उपयोग, दुरूपयोग व्यक्तियों और उनकी सोच पर निर्भर करता है. व्यंग्य के माध्यम से समाज व्यवहार में आ रही गिरावटों की तरफ गम्भीर संकेत है यह कविता.

कवि का हृदय बहुत विशाल है वह सामाजिक व्यवहार में बेहद कुशल है. हम सभी जानते हैं कि व्यक्ति अच्छा हो या बुरा उसके मरने के बाद लोग उसके गुणों की चर्चा कर अच्छा ही बताते हैं ‘बेचारा बहुत अच्छा आदमी था’ .

कवि अपने धुर विरोधी और दुश्मन के बीमार होने पर सहयोग करने को तत्पर हैं तो उसके मरने के बाद उसकी बुरी यादों को बोझ की तरह ढोने से परहेज करने की बात करता है जो कि उसकी प्रगतिशीलता का परिचायक है. मरने के बाद तो कर्जदार व्यक्ति के खिलाफ जारी रिकवरी भी नाकाबिल घोषित कर बट्टे खाते में डाल दी जाती है. रोजी-रोटी और अच्छे जीवन अवसरों की तलाश में आदमी अपने जन्मस्थल से दुसरे स्थानों प्रायः शहरों की तरफ ‘पलायन’ करता है.

समाजशास्त्री एहसानुल हक साहब ने अपनी किताब ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ पोपुलेशन’ में पलायन के विभिन्न कारणों की विस्तार से चर्चा की है. अभावग्रस्त जिंदगी और गरीबों की सवारी ट्रेन से भूखे प्यासे परिवारों की यात्रा का सजीव चित्र कवि की दृष्टि से अछूती नहीं रह पाती,  रहे भी कैसे कवि की मातृभूमि बिहार में हैं और वहां के गरीबों का बड़ी संख्या में प्रदेश से बाहर पलायन की त्रासदी को वो शिद्दत से जानते समझते हैं.

इतना ही नहीं उनके पिता डॉ. मस्ताना ने कोरोना वायरस की महामारी में देशव्यापी बंदी के दौरान घर वापस लौटते मजदूरों के दुःख दर्द को बेहद भावनात्मक तरीके से अपने गीत में प्रस्तुत किया है: ‘चलत राह मजदूर पसीना डेगे डेग बोवत बा/अंजुरी में बटोर लीं जवन उ दुखवा ढोवत बा’ पलायन तो दुखद था ही अबकी बार घर वापसी सदी की सबसे बड़ी त्रासदी बनकर आई.

कवि संतोष अपने समय के आंदोलनों से जुड़े रहे हैं. दिल्ली में ज्योति (निर्भया) के साथ हुए दर्दनाक रेप और बाद में उनकी दुखद मृत्यु और उसके बाद उभरे आन्दोलन से भी संतोष जी बहुत करीब से जुड़े रहे. रेप पीड़ित एक लड़की के असहनीय दर्द को उन्होंने एक चिड़िया के मेटाफर में बांधा है. भीड़ में अकेले जीने की नगरीय मजबूरियों के अँधेरे कोनों में जाने कितने बहशी दरिन्दे भी पलते हैं जो मासूम परिंदों का शिकार कर उनसे अपनी हवस मिटाने की ताक में लगे रहते हैं.

पुरुष वर्चस्व वाले समाज में स्त्री को भोग मात्र की वस्तु समझने वाले दरिन्दे देश भर में ऐसे कुकृत्य रोज ही करते ही रहते हैं. कवि को उम्मीद है कि जन आंदोलनों से ही महिलाओं के हक में कुछ बेहतर रास्ता निकलेगा. हमें यह जानना होगा कि अन्य क्षेत्रों में होनी वाली पॉलिटिक्स की तरह साहित्य में भी ‘पॉलिटिक्स ऑफ़ पब्लिकेशन’, ‘पॉलिटिक्स ऑफ़ नालेज’ और ‘पॉलिटिक्स ऑफ़ इग्नोरेंस’ लगातार चलती रहती है.

कवियों का भी अपना एक नेक्सस है-

सार्वजनिक संस्थानों में बैठे तमाम मठाधीश और अध्यापकीय आलोचक (फतवा विशेषज्ञ) ये ठान के बैठे हैं कि वे केवल अपनी विचारधारा को पीठ पर लादकर घूमने वाले चमन चेलों को ही बड़ा लेखक, कवि, आलोचक इत्यादि घोषित करेंगे, उनको ही अच्छे बड़े प्रकाशनों से छापेंगे, उन्हें ही बड़े बड़े पुरस्कार मिलेंगे, सिलेबस में उन्हें ही पढाया जाएगा. इस बेईमानी को अपना साध्य और साधन बनाये मठाधीश जान बूझकर प्रतिभाओं को इग्नोर करते हैं, उनका ज़िक्र भी नहीं करना चाहते है या तुच्छ समझकर बुराई करते हैं.

कहने वाले तो आजकल प्रेमचन्द्र के साहित्य को कूड़ा साबित करने में लगे हैं जिन्हें दुनिया कथा सम्राट कहती है. कवि का दुरुस्त मत है कि फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया ने सबको लोकतान्त्रिक अवसर उपलब्ध कराया है कि वे खुलकर लिखे, पढ़े और बोले दुनिया उन्हें सुनेगी.

प्रसिद्ध समाजविज्ञानी जुरगेन है बारमॉस ने मुक्त संचार की पैरवी इसीलिए की थी क्योंकि इससे लोकतंत्र मजबूत होता है. इसी विषय पर संग्रह में एक अन्य कविता है “राजनीति साहित्य की” जो स्पष्ट करती है कि राजनीति जीवन के हर क्षेत्र को गहरे प्रभावित करती है.

गुलामों की फौज ने बनाई काल्पनिक मुख्यधारा-

मुख्यधारा एक नकारात्मक शब्द है जो कुछ लोगों को अपना एकतरफा प्रभाव बनाये रखने का माध्यम बनती है. अपने को मुख्यधारा का ध्वजवाहक कहने वाले लोग तो फणीश्वरनाथ रेणु जैसे महान शब्द शिल्पी साहित्यकार को भी आंचलिक होने का ठप्पा लगाते हैं. यह शब्द इन्ही बेईमानों के अहंकार का प्रतीक है जो दूसरों को कमतर साबित करने में जीवन गुजार देते हैं.

साहित्य से लेकर मीडिया तक ऐसे ढेर सारे तथाकथित मुख्यधारा के चमचे भारी संख्या में पाए जाते हैं जिनकी खासियत यह है कि अपनी ख़ास मुख्यधारा में बहुसंख्यक आबादी का प्रवेश वर्जित है चाहे वह कितना ही प्रतिभावान हो. कवि ठीक ठीक पहचान करता है कि ये मुख्यधारा वाले इतने डरपोक हैं कि सबके लिए समान रूप से उपलब्ध सोशल मिडिया पर पाबंदियां थोपने के लिए षड्यंत्र रचते रहते हैं जिनसे सावधान रहने की जरूरत है.

आदिवासियों-जनजातियों के लिए जल-जंगल-जमीन का मुद्दा बहुत अहम् रहा है जिसके लिए तमाम संघर्ष होते रहे हैं लेकिन लड़ाई अभी भी जारी है. झारखंड और बंगाल के आदिवासी समुदायों की गरीबी का फायदा उठाकर नगरों में बसे दलाल उन्हें नौकरी के नाम पर बहला-फुसलाकर दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में ले जाते हैं. जहाँ उनका शारीरिक-मानसिक-आर्थिक हर तरह का असह्य शोषण होता है.

यदि उनका अपना जल-जंगल-जमीन भू माफियाओं ने कब्जा लिए तो सांस्कृतिक वंचना तो होगी ही प्राकृतिक असंतुलन से कोरोना वायरस की तरह फैलने वाली वैश्विक महामारियां इंसान को जीने नहीं देंगी. ब्राजील का सनकी राष्ट्रपति अमेजन वर्षा वनों का काटकर अपने मित्र पूंजीपतियों को जमीन देने में लगा है जिसके कारण दुनिया के फेफड़े कहे जाने वाले इन वनों, उनमें रहने वाले आदिवासियों, जंगली पशु-पक्षियों पर खतरा उत्पन्न हो गया है.

हमे सीख लेनी होगी नहीं तो मास्क-सैनीटाइज़र और वेंटीलेटर से जान नहीं बचने वाली. इसी के साथ कवि का संवेदनशील मन ‘अग्नि’ शीर्षक कविता में कहता है कि पेट की आग यानि कि भूख सबसे बड़ी आग है जिसके दबाव में गरीब इन्सान घोर धूप भरी दोपहरी में शहर के चौराहे पर मजबूरी भरी मुस्कान लिए बड़ी कम्पनियों के उत्पाद बेचने के लिए कार और मोटरसाइकिल वाले अमीरों से गुजारिश करता रहता है.

भूख के खिलाफ इस लड़ाई को हर कोई न देख सकता है न पढ़ सकता है लेकिन कवि हमें उसको पढ़ने के लिए प्रेरित करता है अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए. अगली रचना में वे पुनः कवि की नजर मजदूर चौक पर रोज खुद की बोली लगवाने वाले श्रमिकों पर पड़ती है जिनमें राज मिस्त्री, पेंटर तक हैं. लेकिन चुनाव का समय आने पर उन्हें रैलियों में ले जाने वाले बहुत सारे पूछ्निहार मिलते हैं क्योंकि उन्हें खाना-रुपया सब मिलता है और मेहनत भी कुछ ख़ास नहीं करना पड़ता.

ग्रामसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक ये नजारे आम हैं और गरीब जनता अपने तात्कालिक लाभ के लिए तैयार मिलती है क्योंकि कवि के अनुसार उसे और समय तो कोई लाभ शायद ही मिल पाता है इसलिए ‘प्रत्यक्ष लाभ’ को वे बुरा नहीं मानते हैं और यही इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बना है. ‘रैली’ शीर्षक कविता भी इसी आम हो चली सामाजिक बुराई के खतरों से आगाह करती है.

‘दलित और नव-दलित दो शब्दों या अवधारणाओं पर संग्रह में दो कविताएं हैं. अमेरिका में ‘ब्लैक पैंथर मूवमेंट’ के तर्ज पर भारत में ‘दलित पैंथर्स’ आन्दोलन खड़ा हुआ. आगे चलकर दलित शब्द से भारत देश के वंचित-शोषित और छुआछूत की शिकार मेहनतकश जनता ने अपनी अस्मिता को जोड़कर राजनीति, साहित्य और जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में आन्दोलन खड़े किये.

समाजशास्त्री प्रोफेसर विवेक कुमार (2005) के अनुसार, “दलितों को अनेक नामों चंडाल, अवर्ण, नामशुद्रा, परीहा, आदि-द्रविड़, वंचित वर्ग, वंचित हिन्दू, हरिजन आदि नामों से जाना और पुकारा जाता रहा है. वास्तव में दलित शब्द पूर्व-अछूत लोगों के लिए प्रयुक्त किया था. जिनका सामाजिक संरचना में एक विशिष्ट स्थान था और वे सामाजिक तौर पर बहिष्कृत भी थे”.

एक वर्ग विशेष से जुड़ी अस्मिता वाले इस शब्द के प्रयोग पर कोर्ट से प्रतिबंध लगने पर कवि की प्रतिक्रिया है: यह शब्द नहीं पूरे बहुजनों का /अस्मितासूचक शब्द है/तभी तो तुम डर गए और लगा दी रोक/ इसी शब्द पर/ जो शब्द है /’दलित’ दलित शब्द अस्मिता से इस तरह जुड़ चुका है कि ‘दलित अस्मिता’ और ‘दलित दस्तक’ जैसी पत्रिकाएं निकलती हैं समाचार चैनल चल रहे हैं.

प्रोफेसर सुखदेव थोरात का इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीस नामक संस्थान कई सालों से चल रहा है. फिक्की की तर्ज पर दलित उद्मियों का ‘डिक्की’ संगठन भी संचालित है. भारत भावनात्मक लोगों का देश है इसीलिए राजनीति में भावनात्मक मुद्दे बेहद निर्णायक साबित होते हैं जो मुद्दे भवनात्मक नहीं होते उन्हें विमर्श से गायब कर दिया जाता है ये कवि का मानना है आप का क्या मत है आप जाने.

ज्ञानी कौन होता है ? जिसके ऊपर हावर्ड बेकर की लेबलिंग थ्योरी के अनुसार विद्वान् लोग अपना ठप्पा-मुहर लगाकर रजिस्ट्री कर देते हैं. ऐसे विद्वानों का कुनबा आपस में जुड़े गोत्रों में से चुने हुए लोगों का आपस में ‘पीठ खुजाऊ’ प्रक्रिया जिसे ‘अप्रोप्रिएशन’ भी कह सकते हैं, माध्यम से विद्वता का तमगा बांटते रहता है जिसे विद्वान कवि दिनेश कुशवाह जी अपनी लम्बी कविता ‘उजाले में आजानुबाहु’ में पोल खोल करते हैं. ऐसे ‘ज्ञानी’ पुरुष आपको ज्ञान के दायरे में आपको घुसने नहीं देंगे इन्हें कवि की नजर से पहचान लीजिये. कमजोर, वंचित ‘लाचार’ लोगों की मदद न कर पाने की वेदना कवि के मन में सदैव रहती है.

दिल्ली के निर्भया काण्ड के बाद उपजे आन्दोलन ने पीड़ित परिवार को हर तरह से मदद प्रदान की. उस मदद और समर्थन का उपयोग आगे इस तरह के अपराध को रोकने और पीड़ित लोगों की सहायता में होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और लोगों की संवेदना और सहानुभूति लूटकर लोग बेहद स्वार्थी हो गये.

इस बात से आन्दोलन से करीब से जुड़े कवि को मानसिक वेदना हुई और उसने अपनी लानत-मलानत भेजी बहुत ही साफ़ शब्दों में. चिड़िया तो शिकार हो गयी लेकिन उसके बाद लोगों ने अपनी ज़िम्मेदारी नही निभायी जिससे क्षुब्ध होना लाजिमी है.

कबीर दास ने कहा था ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’, कवि ने भी अपने शब्दों में प्रेम की इस मानवीय जगत में सर्वत्र कमी पायी और मेरा भी मानना है कि यह मानवीय समाज प्रेम के खिलाफ बसी हुई एक बस्ती है इसीलिए हर तरफ भेदभाव और मारकाट मची रहती हैं. प्रेम करना सचमुच बहुत कठिन है

कवि कहता है : बस चाहिए निर्वहन की शक्ति/वस्तुतः प्रेम ही है/ भक्ति और मुक्ति. हम लोग कहते हैं पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले थीं लेकिन प्रत्येक घर में एक सावित्रीबाई होती है और वह है हमारी माँ. वह सब कुछ भले न जानती हो लेकिन अपने संतान के लिए क्या सही है वह जानती है. वह इतनी बड़ी संरक्षक होती है कि सामने वाला कितना भी बड़ा और ताकतवर हो अपने संतान की रक्षा के लिए उससे भिड़ने में संकोच नहीं करती, कमजोर नहीं पड़ती, कवि उस माँ को बड़ी शिद्दत और इज्ज़त से याद करता है जो काबिले तारीफ़ है.

कुंठित और पागल लोग कोई जरुरी नही कि डॉक्टर द्वारा घोषित किये गये हों और उसके द्वारा लिखी गयी पर्ची का दवा खाते हों, वे समान्य और शांत आदमी के भेष में हमारे आपके बीच में रहते हुए खुद ही कुछ पर्चे लिखकर कुंठित मानसिकता वश दूसरों के राह में मुश्किलें खड़ी करके खुश होते हों. ऐसे पागलों की कमी नहीं है और हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें अच्छे डॉक्टर से दिखाकर उनका इलाज समाज हित में कराये.

‘जननायक एक्सप्रेसएक ट्रेन का नाम है जो मजदूरों को उनके मूल स्थान से दूसरे स्थानों तक लेकर जाती है और आती भी है. लोग बाहर जाते हैं कि कुछ पैसे कमाकर मां-बाप और अपने बच्चों की मूलभूत जरूरतों को पूरा कर पायेंगे और इन्हीं उम्मीदों के सहारे भारी भीड़ वाली उबाऊ और मुश्किलों वाली लम्बी यात्राएं करने को बहुत सारी जनता मजबूर है.

जिस तरह रेणु जी की कहानियों में ट्रेन, स्टेशन, कुली, खलासी, स्टेशन मास्टर जैसे तमाम चीजे आती हैं वैसे ही संतोष जी की कविताओं में ट्रेन और उसके बदहाल यात्री बार-बार आ जाते हैं. वैसे ट्रेन सामाजिक गतिशीलता की भी परिचायक है. दास प्रथा पर रोक लगने के बाद ठेका मजदूरी प्रथा का अविष्कार अंग्रेजों ने करेबियन देशों मे अपने खेतों में काम करने के लिए किया.

बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से उस समय जाति व्यवस्था से पीड़ित तत्कालीन अछूत जातियों तथा पिछड़ी जातियों के लोग एक बेहतर और समानतावादी समाज में जीने की उम्मीद लिए ‘गिरमिटिया’ मजदूर बन अनजान जगहों की यात्रा पर निकल गए. इस यात्रा में उन्होंने तमाम यातनाये झेलीं, ब्रिटिश कालोनियों पर उनका खूब शोषण हुआ. उनसे जानवरों की तरह काम लिया गया. विरोध करने वालों को जेल में डाला गया.

इतिहास की इन घटनाओं को अभिमन्यु अनंत ने अपने उपन्यासों (लाल पसीना), हग टिंकर ने अपने शोध पुस्तकों (ए न्यू सिस्टम ऑफ़ स्लेवरी), वृज वी लाल (चलो जहाजी), समाजशास्त्री आर. के. जैन ने अपने शोध पत्रों और किताबों में दर्ज किया और बताया कि जातीय शोषण से मुक्त होने की चाह में लोग विदेश गए लेकिन धीरे-धीरे जाति और उसकी बुराइयाँ सब जगह पहुँच गयी.

फिल्मों और साहित्य ने भी उन्हें भारत से जोड़कर रखा लेकिन संतोष जी देखते हैं कि जिस शोषण से बचने को वे बाहर गये उसी को अपनी पहचान बनाकर फिर एक ‘फाल्स आइडेंटिटी’ में गिर्मित्य लोग फंस चुके हैं. उनकी ऐसी समझ ‘सुभाषचन्द्र कुशवाहा’ जी के लोकरंग कार्यक्रम में सन 2018 में कैरेबियन देशों से आये कलाकारों और विद्वानों से सम्पर्क होने से बनी जो कि उचित ही लगती है. वे लिखते हैं: बहुत आसान है भेड़ चाल में चल जाना/ अब मुझे आश्चर्य नहीं/ एक गिरमिटिया का हिन्दू बन जाना.

पितृसत्तात्मकता पर प्रहार-

स्त्री-पुरुष समान हैं ऐसा भारत देश के महान संविधान ने व्यवस्था कर दी. प्रकृति ने भी दोनों को बनाकर कोई भेदभाव नहीं किया था लेकिन पितृसत्तावादी समाज येन-केन प्रकारेण महिलाओं के अधिकारों मे परम्पराओं के नाम पर कतर-ब्योंत करता रहता है.

सबरीमाला मंदिर मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के प्रवेश का अधिकार दिलाया लेकिन कानून और परम्परा में संघर्ष जारी है. कवि गदगद है कि महिलाओं ने वर्षों पुरानी भेदभाव वाली परम्परा को तोडकर बड़ा काम किया है. कवि व्यक्ति स्वातंत्र्य का पक्षधर है वह जातिगत, क्षेत्रिय, भाषाई, धार्मिक हर तरह के भेदभाव ऊँच-नीच का विरोध करता है.

इस प्रतिरोध के स्वर उसकी रचनाओं में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. ‘जन्मना शुद्र जायते, संस्कारात द्विजम उच्येत’ ये भारतीय शास्त्रों की वाणी है.प्रत्येक मनुष्य आजीवन सीखता है और अपने में सुधार करता है जो कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. लेकिन जन्म के आधार पर किसी को कमतर ठहराना एक दूषित प्रवृत्ति है.

मैक्स वेबर के हवाले से कहें तो जीवन अवसरों (लाइफ चांसेस) का एक व्यक्ति के जीवन में निर्णायक महत्व होता है. हमारा संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार देता है कि वह अपनी सुविधा अनुसार अपने पसंद से अपना धर्म, अपनी जीवन पद्धति चुने और बालिग़ लोग अपना जीवन साथी चुन सकते हैं (राईट ऑफ़ चॉइस).

‘आनर किलिंग’ कविता में कवि रुढ़िवादी समाज में महिलाओं के कंधे पर इज्जत का सारा बोझ डालकर उनके अधिकार हनन करने, उनकी निर्मम हत्या करने वालों की भर्त्सना करता है. ये जाति/गोत्र/धर्म/ तुम्हारी बनाई चीजें हैं/ जिससे तुम करते हो अपना अहम शांत/ करते हो मजबूत समाज में/ पितृसत्ता, जातिवाद और धर्म को/करके प्रेम और प्रेमियों की हत्या नाम देते हो/ आनर किलिंग का लड़की ने प्रेम कर लिया तो इज्जत चली गयी ये सोच पूरे देश में एक समान तरीके से फैली आदिवासी समाजों को अपवादस्वरूप छोड़कर.

पुरुष के बनाये कानून का पालन नहीं किया तो जिंदा जला देने तक के कुकृत्य करते हैं ये सभ्य कहलाने वाले मानव. हमें इनका प्रतिकार करना ही होगा. मैडम प्रेम चौधरी ने अपनी किताब ‘द वील’ और कई लेखों में हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में खाप पंचायतों द्वारा प्रेमियों के खिलाफ दिए जाने फैसलों और प्रेमियों के जान लेने के कई कारणों में अंतरजातीय विवाहों के साथ-साथ संपत्ति के विभाजन के डर को भी बताया है.

संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है ‘निरपेक्ष’ जिसमे कवि रंग बदलने और सबके साथ सेट हो जाने वाले सियारों, अपने स्वार्थवश घोर आत्मकेंद्रित हो चुके व्यक्तियों को ललकारता है और उन्हें बिना पेंदी का लोटा कहता है जो जीवन भर इधर-उधर लुढकते रहते हैं. जन कवि बल्ली सिंह चीमा को यहाँ याद करना अपरिहार्य हो जाता है जो कहते हैं: ‘घोषित करो किस ओर हो तुम/ आदमी हो या आदमखोर हो तुम’ जो इंसान बुरे को बुरा और गलत को गलत न कह सके, अमानवीय कृत्यों का विरोध न कर सके उसकी गिनती इंसानों में नहीं की जा सकती वे निरा आत्मसंतुष्ट जानवर मात्र हैं.

जाति के आधार पर भेदभाव और उसका दंश कवि को बार-बार चुभता है वह कहता है ‘जाति है कि जाती नहीं’. मरने के बाद भी लोगों को जाति के आधार पर अलग श्मशान में जलाने के लिए विवाद होते हैं. अली अनवर अपनी पुस्तक ‘मसावात की जंग’ और अन्य में बताते हैं कि मुस्लिम धर्म में भी निम्न समझे जाने वाले मुसलमानों के अलग कब्रिस्तान हैं. यह मानव निर्मित शोषण परक, अमानवीय व्यवस्था है जिसे कवि समाज से खत्म कर वापस उन्ही किताबों में भेजना चाहता है. जहां से आकर समाज में ये फैलती रही है.

लोकतंत्र और पार्टी पोलिटिक्स की कमियों पर गाहे बगाहे टिप्पणी भी कवि ने की है और हमे सांपनाथ-नागनाथ से सचेत रहने की सलाह देते रहते हैं. महिलाओं के बारे में नकारात्मक बाते फैलाई जाती रही है और लोग बड़ी सतही सोच के साथ कहते रहते हैं कि ‘नारी नरक का द्वार है’. हम सभी की जननी मां नारी ही हैं उनके बारे में ऐसा कहना सर्वथा निंदनीय है. हमे महिला शक्ति का सम्मान करना चाहिए ये बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए.

बुजुर्ग मां-बाप वृद्धाश्रम में कुत्ते गोद में-

हम सभी अपनी जीवन यात्रा को तय करते हुए वृद्ध होते हैं. परिवार व्यवस्था में लोग साथ रहते हुए अपनी वरिष्ठ पीढ़ियों का सम्मान और देखभाल करते रहे हैं लेकिन शहरों के तंग होते घरों में अब बड़े तंगदिल लोग रहने लगे हैं जो मॉडर्न कहलाने के लिए विभिन्न जाति-प्रजाति के कुत्तों को तो कार और गोंद में लिए हुए घूमते हैं और स्टेस्ट्स दिखाते हैं लेकिन जीवन की ‘गोधूलि’ में अपने बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रमों में गैरों के भरोसे छोड़ देते हैं.

यह सामाजिक स्खलन है, माँ-बाप का अपमान है. संयुक्त परिवार की ‘टूटती साँसे’ ज़िम्मेदारी से थामनी होंगी. आगे कवि का ध्यान रचनाकारों के सम्मान की तरफ जाता है. वे लिखते हैं किसी साहित्यकार का सच्चा सम्मान उसकी कृतियों में जो मानवता के प्रति लिखा रचा गया है उसकी चर्चा हो सम्मान से पढ़ा जाए केवल फेसबुक पर आर.आई.पी. या ‘श्रद्धान्जलि’ लिखकर कोरम पूरा करने को कवि ठीक नही मानता.

लोभ और लालसाओं के बशीभूत होकर जीवन भर ‘घुटन’ में जीना और भगदड़ मचाने से कोई लाभ नहीं. कोरोना वायरस जैसी महामारी ने लोगों को संयम के साथ जीने की अच्छी सीख दी है.

‘जगा दो’ सबको उनके मुद्दों के प्रति यही साहित्यकार का दायित्व है. संतोष जनजीवन में व्याप्त विरोधाभास को लगातार पकड़ते हैं. वे दिल्ली महानगर में रहते हैं जहाँ आधुनिकतम

सुख-सुविधाओं से लैस बड़ी-बड़ी कोठिया और फ़ार्महाउस हैं तो दूसरी तरफ सडक किनारे झुग्गी-झोपड़ियों की कतारें हैं. दोनों में रहते आदमी ही हैं लेकिन ये ‘गैप’ खत्म नहीं हो पा रहा. कवि इसके कारणों की पड़ताल भी करता है. ‘

तोड़ती पत्थर’ को आज भी सबसे महान प्रगतिवादी कविता कहते नहीं अघाते आलोचक लोग लेकिन ‘महानगरों की शोभा’ पर लिखने वालों की तरफ उनकी नजर नहीं जाती. इन्ही शहरों में एन.जी.ओ. का चोखा धंधा भी फलता-फूलता है जिसमें सरकार या निजी दान कर्ताओं से फंड लेकर कागजी किले बनाये जाते और प्रस्तुत किये जाते हैं.

संतोष अपनी कविताओं में ‘ढोंग’ का पर्दाफाश करते हुए चलते हैं. सच्ची कविता ‘युद्ध के विरुद्ध’ होती है क्योंकि युद्ध होने से कुछ हथियार बेचने वालों का ही लाभ होता है बाकि सबका नुकसान ही है.

कविवर दिनेश कुशवाह भी तो कहते हैं कि ‘युद्ध में मरता तो आदमी ही है’. तमाम साजो सामान, टैंक, गोला- बारूद के बाद भी युद्ध में इंसान ही मरते हैं इसलिए किसी भी तरह के युद्ध को टालने की भरसक कोशिश होनी चाहिये. देश के संसाधनों का लाभ उठाकर ऊँची डिग्रियां लेने के साथ ही लोग पासपोर्ट बनवाकर विदेश में अच्छी जीवन शैली और ढेर सारा रुपया कमाने के लिए चले जाते हैं लेकिन वहीँ से देश के बारे में आदर्शवादी और कभी-कभी फिजूल की बातें करते रहते हैं. अगर उन्हें कुछ सही चाहिए तो देश में रहकर ठीक करने का प्रयास करना चाहिए.

कवि निर्धन, निर्बल, वंचित और शोषित जन के लिए सस्ते और सुलभ न्याय का पक्षधर है और उनकी कई इस बात को बार-बार कहा गया है.कवि टेलीविजन जिसको कभी ‘इडियट बॉक्स’ कहा जाता था आज बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. यह एजेंडा सेटिंग करता है, दिन भर समाचार चैनल लोगों के बेडरूम और ड्राइंग रूम में शोर करते रहते हैं.

धारावाहिकों में भूत-प्रेत और अवैज्ञानिक तथ्यों का प्रचार और कई तरह की आपतिजनक चीजें दिखाई जाती हैं जो कि ठीक नहीं है. लोकतंत्र के इस चौथे खम्भे को ज़िम्मेदारी से अपना दायित्व निर्वहन कर राष्ट्र को मजबूत बनाने में योगदान करना चाहिए. कवि घास को एक सकारात्मक प्रतीक के रूप में प्रयोग करता है जिसको गांधी, अम्बेडकर, नेल्सन मंडेला ने लोकहित में सजाया-संवारा और परतंत्रता और असमानता से मुक्ति दिलाई.

हर तरह के आन्दोलन में नारों की अहम भूमिका होती है जो बड़ी आसानी से जुबान पर चढ़ जाते हैं और लोगो को खुद से जोड़ लेते हैं लेकिन ये नारे वास्तविक मुद्दों से जुड़े होने चाहिए न कि जनता को केवल आश्वासन देने मात्र तक रह जाएँ.

कवि देश के प्रत्येक संस्थान में प्रतिनिधित्व और आरक्षण का समर्थक है. ताकि देश के संसाधनों का लाभ प्रत्येक देशवासी तक पहुँच सके. तमाम बुद्ध, फुले, आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, ललई यादव और जगदेव कुशवाहा, सिद्धू-कान्हू जैसे क्रांतिनायकों ने जिस समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था उसे स्थापित किया जाने का कार्य अभी अधूरा है जिसको पूरा करने के लिए लगातार लड़ने की जरुरत है. जिसे कवि असली लड़ाई कहता है.

आदमी की पहचान उसकी जन्मभूमि से जुड़ी होती है चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए अपने घर लौटने की चाहत होती है. गांव वाले आपको शहरी कहते हैं और दिल्ली-मुंबई वाले आपको बिहारी या भैये कहते हैं और कभी-कभी एक नकारात्मक मुद्रा में भी बोला कहा जाता है. देश अपना है और हम कहीं भी अपनी मर्जी से जा सकते है, बसकर रोजी रोटी कमा सकते हैं.

गाँव से शहर में जाकर बस गये लोगों की हालत ‘त्रिशंकु’ जैसी हो जाती है जिसे समाजशात्री ‘लिमिनल स्पेस’ कहते हैं, मतलब न इधर के न उधर के. ये स्थिति माइग्रेंटस को बहुत कचोटती है. दास या गुलाम की शास्त्रीय व्यवस्थाएं, दासी-देवदासी, अ न्यू सिस्टम ऑफ़ स्लेवरी में हग तिनकर ने ‘इंडेंचरड लेब्रर्स’ या गिरमिटिया मजदूरों को नये जमाने का गुलाम या दास ही कहा है लेकिन कवि संतोष मानसिक गुलामों को सबसे निकृष्ट कोटि का मानते हैं और उनका आह्वान करते हैं कि शिक्षित हो अपनी गुलामी से मुक्त हो और सबके लिए एक सुंदर समाज बनाने में लगो.

अपनी अंतिम कविता में कवि घोषणा करता है कि ‘जीत अन्ततोगत्वा हमारी होगी’ और इसके पीछे का जो आत्मविश्वास है वह समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा की नींव पर टिका है जो हर तरह के भेदभाव को मिटाकर मानवतावाद की स्थापना करने को दृढसंकल्प है. इस दिशा में जो कारवां चल पडा है वह रुकने वाला नहीं है.

कवि संतोष का पहला हिंदी काव्य संग्रह जारी है लड़ाई एक बहुआयामी संग्रह है जिसमे जीवन की विविध रंग हैं इसलिए पठनीय है. संतोष के यहाँ उम्मीद के साथ संघर्ष के गहरे रंग हैं. सलाह ये है कि एक जैसी कवितायेँ एक खंड में आयें, एक कविता के बीच में पैराग्राफ बने शब्दों की मितव्ययिता हो, पंक्तियाँ को और सुव्यवस्थित किया जाये.

कथ्य तो है ही शानदार शिल्प पर थोड़ा और काम हो. एक बेहतरीन काव्य संग्रह के लिए संतोष जी को बधाई.

लेखक डॉ. राकेश कबीर जेएनयू से पीएचडी हैं व ‘नदिया बहती रहेंगी’, कुंवरबर्ती कैसे बहे ? के लेखक होने के साथ ही PCS ऑफीसर भी हैं।

36 Comments

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