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राष्ट्रनिर्माता: राजनीति और ऊंची प्रतिमाओं के खांचे से कहीं विशालकाय है सरदार का कद

नई दिल्ली, नीरज भाई पटेल (नेशनल जनमत) 

टुकड़ों में बंटी रियासतों का एकीकरण करके उसे राष्ट्र का स्वरूप देने वाले सरदार बल्लभ पटेल देश के सच्चे राष्ट्रनिर्माता थे। ऐसे राष्ट्रनिर्माता जिनके लिए देश अपने घर, परिवार, नाते, रिश्तेदार और जाति के बंधनों से भी परे था। सरदार श्री ने अपना पूरा जीवन आज के नेताओं की तरह अपने बच्चों को राजनीति में या उद्योगपति बनाने में ना लगाकर देश को समर्पित कर दिया था।

स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों और आधुनिक भारत के निर्माताओं में सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्थान अग्रणी विभूतियों में है. गुजराती किसानों को अंग्रेजी शासन के शोषण के विरुद्ध लामबंद कर स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े लौह पुरुष ने राष्ट्रनीति को गढ़ने में अहम भूमिका निभायी.

सैकड़ों रियासतों को भारत में विलय की समस्या का समाधान कर उन्होंने भारत को एक वृहत राष्ट्र का आकार दिया. जिसके लिए सरदार पटेल ने निवेदन से लेकर कठोर निर्णय की नीति भी अपनाई। हैदराबाद के निजाम को सरदार ने अपना लौहपुरुष रूप दिखाकर विलय के लिए बाध्य किया।

सरदार का व्यक्तित्व मोदी सरकार की कथित सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा का रत्तीभर मोहताज नहीं है। सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में अभी तक जितना लिखा गया सुना और पढ़ा गया वो उनके कद के हिसाब से शायद बहुत कम हैं क्योंकि उनकी उपलब्धियों को सही मायने में समझा ही नहीं गया।

न जाने क्यों कांग्रेस ने सरदार-सुमिरन प्राय: छोड़ दिया और भाजपा समेत संघ परिवार ने उन्हें अपने रंग में रंगना शुरू कर दिया! जैसा कि गोपाल कृष्ण गांधी ने एक बार अपने अनूठे अंदाज में कहा था, यह मामला एक छोर पर ‘अनुपयोग’, तो दूसरे छोर पर ‘दुरुपयोग’ का है.

सही मायने में सरदार को समझने का मतलब क्या है? इसके बार में दोराया नहीं होगी कि सरदार को भारतीय एकता के शिल्पी (आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन यूनिटी) के रूप में पहचाना जाना चाहिए।

सरदार की दृढ़ इच्छाशक्ति- 

सरदार ने जूनागढ़ रियासत का मसला प्रोविजनल गवर्नमेंट यानी अनंतिम सरकार के जरिये हल करते हुए स्थानीय संवेदना को ध्यान में रखते हुए सोमनाथ मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया।

जहां तक सोमनाथ मंदिर के निर्माण की बात है, तो सरदार ने अयोध्या की तरह विवादास्पद ढांचा ध्वंस कराने की जगह ‘रूल ऑफ लॉ’ की मर्यादा का पालन किया।

भारतीय एकता के स्तंभ हैं- यह कहते वक्त यदि केवल उनके द्वारा देशी रियासतों के विलय को ही याद करेंगे, तो इससे हम सरदार को एक सीमित दायरे में बांध देंगे। संविधान सभा की चार समितियों के वे सदस्य थे।

सलाहकार समिति और प्रांतीय संविधान समिति के वे अध्यक्ष थे और संचालन समिति व राज्य समिति में वे सदस्य की हैसियत से शामिल थे. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का दायित्व निभाते हुए सरदार ने जाे एक प्रशासनिक पहल की थी, वह ‘ऑल इंडिया रेडियो’ की उर्दू सर्विस के शुरू होने की थी।

किसान नेता से देश के उपप्रधानमंत्री तक का सफर- 

एक और बात. वल्लभ भाई को ‘सरदार’ की जनउपाधि कब मिली? सरदार पटेल ने गुजरात के एक छोटे से तालुके बारडोली के किसानों को संगठित करके उन्हे उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया। स्थानीय लोगों की मानें तो वल्लभ भाई को सरदार की उपाधि वहां की महिलाओं ने दी थी गांधी जी ने नहीं।

जब सरदार का निधन हुआ, पश्चिम के एक प्रतिष्ठित अखबार ने उन्हें ‘भारत का बिस्मार्क’ कहा था. लेकिन ये सोचने की बात है कि भारत दर्जनों जर्मनी को अपने में समाये हुए है।

स्वतंत्रता की पहली सालगिरह पर सरदार पटेल का संदेश

आज का दिन, हमारी स्वतंत्रता की पहली वर्षगांठ, हमारी प्रगति में एक विशेष चरण है, जहां से हम आगे और पीछे देख सकते हैं. हम उस उत्साह को अपने मन में याद करते हैं, जिसके साथ पिछले वर्ष अपनी स्वतंत्रता में हमने प्रवेश किया था।

हम इसके तुरंत बाद की त्रासदियों और दुखों को याद करते हैं, बेहाल, अधनंगे और मामूली सामान लिये आये सीमा पार से शरणार्थियों के रेले को याद करते हैं, हमारे अस्तित्व और स्थिरता के लिए गंभीर आंतरिक खतरों को याद करते हैं।

प्रसन्न और शांत कश्मीर घाटी पर पड़ोसी देश के द्वारा किये गये अमानवीय और बर्बर अत्याचार को याद करते हैं, सीमा पर फासीवादी रजाकारों के समर्थन से हैदराबाद की सेना की बर्बरता को याद करते हैं, साथ ही अन्य परेशानियों और जटिल समस्याओं को याद करते हैं, जिनसे हमें जूझना पड़ा है।

प्रथम गणतंत्र दिवस पर दिया गया सरदार का संदेश-

आज से ठीक बीस वर्ष पूर्व भारत के लोगों ने पूर्ण स्वतंत्रता का पवित्र संकल्प लिया था. इस संकल्प के पीछे सभी की प्रतिबद्धता तथा अपनी नियति पर आस्था से उत्पन्न होनेवाली शक्ति थी. हालांकि, हमने 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता हासिल की, लेकिन वह उस संकल्प के लिहाज से पूरी नहीं थी. आज ईश्वर की कृपा से उस संकल्प को पूर्ण रूप से पूरा किया गया है.

आज का दिन जब भारत ने गणतंत्र का दर्जा पाया है, इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा. विदेशी शासन के रूप के समाप्त हो जाने के साथ, अब हम कानूनन और असल में अपने स्वामी बन गये हैं और अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं या फिर उसे नष्ट कर देते हैं.

हालांकि, हमें सदियों के शोषण और बंधन से उबर पाने में समय लगेगा, अभी भी बहुत त्याग की जरूरत होगी, जब तक कि ताजा खून भारत की नसों में न बहने लगे. हमने आजादी हासिल करने के लिए बहुत मेहनत की है.

उसे तर्कसंगत बनाने के लिए और अधिक मेहनत की जरूरत होगी. इसलिए, हमें इस अवसर के उत्सव को हल्के ढंग से नहीं मनाना चाहिए, बल्कि आज हमें यह शपथ लेनी है कि हम एक स्वतंत्र देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में सही और सक्रिय भूमिका निभायेंगे, क्योंकि इस देश को अभी अपने पैरों पर खड़ा होना है और इसे अपना पूर्ण रूप प्राप्त करना है. हम सभी के साथ दैवी मार्गदर्शन और सहयोग बना रहे, यही कामना है.

सांप्रदायिकता पर पटेल के विचार- 

सरदार पटेल ने इस बात पर बल दिया कि हमारा लक्ष्य सभी वर्गों के नागरिकों को जितना जल्दी हो सके समानता के स्तर पर लाने तथा समस्त वर्गीकरणों, भेदों व विशेषाधिकारों को समाप्त करने का है.

बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक दोनों को उनके दायित्व का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि यह सबके हित में है कि सेक्युलर राज्य की वास्तविक और प्रामाणिक नींव डाली जाए. हमें यह समझना होगा कि भारत में केवल एक ही समाज है

हिन्दू राष्ट्र बनाने का सुझाव खारिज कर दिया था- 

वे तूफानी बयानबाजी नहीं करते थे. लेकिन उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक संगठनों का विरोध और धर्मनिरपेक्षता में अपनी आस्था घोषित की. महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना उनकी इस आस्था को मजबूत करता है।

जून, 1947 में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का सुझाव खारिज करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे यहां अल्पसंख्यक भी हैं, जिनकी सुरक्षा हमारी ही प्राथमिक जिम्मेदारी है. राज्य सबके लिए है और इसमें जाति या धर्म का कोई भेदभाव नहीं है.’

हमारे देश के स्वाधीनता-आंदोलन और स्वतंत्र गणराज्य के नव निर्माण में अग्रणी जननेता सरदार वल्लभ भाई पटेल गंभीर व्यक्तित्व, त्यागमय चरित्र, कूटनीति-कौशल और संकल्पनिष्ठा के बल पर स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद के सच्चे अधिकारी माने जाते थे. मगर गांधीजी की मोह मय इच्छा से, पद-मोह त्यागकर, उन्होंने नेहरू के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

दो साल में 565 रियासतों का एकीकरण किया था- 

जब अंग्रेजो ने भारत छोड़ा, तब वे स्वतंत्र शासक बनने के स्वप्न देख रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि स्वतंत्र भारत की सरकार उन्हें बराबरी का दर्जा दे। उनमें से कुछ लोग तो संयुक्त राष्ट्र संगठन को अपना प्रतिनिधि भेजने की योजना बनाने की हद तक चले गये थे। ऐसे दुविधापूर्ण समय में 1947 से 1949 के बीच दो वर्षों की अवधि में उन्होंने रिकॉर्ड समय में 565 देशी रियासतों को भारत से जोड़ने में कामयाबी पाई थी।

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