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‘जातिवाद- भ्रष्टाचार’ के गठजोड़ से बनी वकीलों की लिस्ट निरस्त करने के लिए OBC-SC वकीलों का प्रदर्शन

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

उत्तर प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में कानून मंत्री बृजेश पाठक की ब्राह्मण जाति के वकीलों का वर्चस्व और प्रदेश स्तरीय संगठन की बागडोर संभाल रहे एक बीजेपी नेता के भ्रष्टाचार की खबरों को ‘नेशनल जनमत’ ने प्रमुखता से उठाया था। सामाजिक संगठनों और सोशल वेबसाइट्स की ताकत का ही असर है कि सरकार को इस जातिवाद और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से तैयार की गई सराकारी वकीलों की नियुक्ति की समीक्षा का आदेश देना पड़ा है।

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परम जातिवादी लिस्ट जारी करने वाले कानून मंत्री ब्रजेश पाठक का कहना है कि “सरकारी वकीलों की सूची में अनियमितताओं की जानकारी हमारे पास आई है। यह बहुत चिंता का विषय है। इस मामले की जांच कराई जा रही है।” 

लेकिन ओबीसी-एससी वर्ग के वकीलों का साफ कहना है कि ये जातिवादी लिस्ट है इसकी समीक्षा कराने जैसी गोलमोल बात करने के बजाए इसे तुरंत निरस्त की जाए। क्योंकि इसके बारे में असमंजस की स्थिति बनी हुई है, सरकार स्पष्ट करे कि लिस्ट कैंसिल की गई है या नहीं और निरस्त होने के बाद अगली सूची में ओबीसी-एससी वर्ग के वकीलों को भी उनकी योग्यता के हिसाब से पर्याप्त हिस्सेदारी दी जाए।

पिछड़ा वर्ग एव अनुसूचित जाति अधिवक्ता मोर्चा न किया प्रदर्शन- 

शनिवार को लखनऊ में पिछड़ा वर्ग एव अनुसूचित जाति अधिवक्ता मोर्चा के बैनर तले हजरतगंज स्थित गाँधी प्रतिमा पर धरना देकर वकीलों ने सरकारी वकीलों की लिस्ट को तत्काल निरस्त करने की बात कही। सरकारी वकीलों की सूची में जातिवाद औऱ भ्रष्टाचार की बात सामने आने के बाद भी कानून मंत्री द्वारा समीक्षा करवाने की बात कहने पर पिछड़ा वर्ग एव अनुसूचित जाति अधिवक्ता मोर्चा ने कहा कि सरकार की मंशा में खोट नजर आ रहा है।

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वकीलों ने चेतावनी भी दी कि यदि सरकार न ओबीसी-एससी के वकीलों को शामिल करते हुए अगली संशोधित सूची ना जारी कि तो 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा।  धरने में पिछड़ा वर्ग एव अनुसूचित जाति अधिवक्ता मोर्चा के संयोजक शिव पूजन मौर्या , अरुण पटेल , पीयूष पटेल , कुलदीप वर्मा , दिवाकर सिंह , राम पूजन मौर्या , बलराम यादव , मनीष वर्मा , राकेश वर्मा ,राजेश वर्मा ,तेजबली सिंह , मनोज वर्मा ,धनुषधारी , मनीष वर्मा समेत सैकड़ो वकील शामिल हुए .

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समझिए पूरा जातिवादी गणित- 

इलाहाबाद में 311 सरकारी वकीलों में 282 सवर्णों की नियुक्ति हुई थी- 

दरअसल इसी 7 जुलाई को 311 सरकारी वकीलों की नियुक्ति की गई। जिनमें से 282 सरकारी वकील सवर्ण हैं और उसमें भी 151 ब्राम्हण है , और 65 क्षत्रिय। इस लिस्ट में स्थायी अधिवक्ता (उच्च न्यायालय), मुख्य स्थाई अधिवक्ता, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता और ब्रीफ होल्डर (क्रिमिनल) और ब्रीफ होल्डर सिविल के पद हैं। इसमें  311 में से अकेले 216 पद ठाकुर- ब्राह्मणों को दे दिए गए। यानि 70 फीसदी ब्राह्मण-ठाकुरों को सरकारी वकाली बनाया गया।

देखिए जातिवाद का खेल-  

4 मुख्य स्थाई अधिवक्ता-  ब्राह्मण- 3

25 अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता-  ब्राह्मण -12, ठाकुर- 7

103 स्थाई अधिवक्ता –   ब्राह्मण- 60, ठाकुर- 17

65 ब्रीफ होल्डर  सिविल-  ब्राह्मण-34,  ठाकुर- 8

114 ब्रीफ होल्डर क्रिमिनल-  ब्राह्मण-42,  ठाकुर-33

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हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच में भी खेल- 

इसी तरह हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 210 सरकारी वकीलों की नियुक्ति की लिस्ट जारी की गई जिसमें 185 सवर्ण वकीलों के नाम है। 185 में भी 119 वकील अकेले ब्राह्मण हैं। इसमें ओबीसी के मात्र 15 वकील और एससी के सिर्फ एक वकील का नाम है।

 प्रदेश स्तर के एक बड़े संगठन नेता के भ्रष्टाचार में लिप्ट होने की खबर- 

बीजेपी प्रदेश कार्यालय के एक बड़े प्रभावशाली प्रदेश स्तर का संगठन संभाल रहे नेता का नाम इस पूरे भ्रष्टाचार में सामने आया है। नाम ना छापने की शर्त पर सरकारी वकील के दावेदार एक अधिवक्ता ने बताया कि उक्त नेता के एक आदमी ने मुझसे कहा था 10 लाख रूपये दो काम सेटल करवा दूंगा। इसके बाद मैं उन नेताजी से मिला भी लेकिन मैंने देखा वहां तो बड़े स्तर पर लेनदेन चल रहा है और इतने पैसे की व्यवस्था ना कर पाने के कारण मैं दबे पांव वापस आ गया।

ये कहानी सिर्फ एक वकील की नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में वकीलो और पत्रकारों के बीच सरकार आने के बाद कद्दावर हो चुके प्रदेश के बाहर से आए इस नेता की लेनदेन की खबरें आम हो चुकी हैं। लोगों का तो यहां तक कहना है कि अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी जमकर जातिवाद और भ्रष्टाचार चल रहा है। सपा के समय में मलाई मार रहे अधिकारी यहां नतमस्तक होकर पैसा पहुंचा दें समझो उनकी मलाईदार पोस्टिंग फिर से पक्की।

कानून मंत्री के जातिवाद का खुला खेल- 

311 वकीलों की लिस्ट में 151 यानि अकेले तकरीबन पचास प्रतिशत ब्राह्मण जाति के वकीलों की नियुक्ति पर कानून मंत्री और बसपा से बीजेपी में आए नेता ब्रजेशपाठक पर भी जातिवाद के आरोप लगे हैं। खुद की स्वीकृति से जारी हुई लिस्ट पर हंगामा मचने के बाद कानून मंत्री का कहना है कि “सरकारी वकीलों की सूची में अनियमितताओं की जानकारी हमारे पास आई है। यह बहुत चिंता का विषय है। इस मामले की जांच कराई जा रही है।”

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कई अधिवक्ताओं के नाम एओआर में दर्ज नहीं-

खबर ये भी आ रही थी कि योगी सरकार ने जिन वकीलों को सरकारी वकील का ओहदा दिया है, उनमें से कई का हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एडवोकेट ऑन रोल (एओआर) में नाम ही दर्ज नहीं है। इसलिए राज्य सरकार की ओर से नियुक्त 311 नए सरकारी वकीलों में दर्जनों वकीलो को शासकीय अधिवक्ता अधिष्ठान ने ज्वाइन करवाने से मना कर दिया है।

हाईकोर्ट में किसी भी वकील के वकालत करने का प्रथम सबूत होता है कि उसका नाम एओआर सूची में दर्ज हो। इन नवनियुक्त सरकारी वकीलों में गिरीश तिवारी, प्रवीण कुमार शुक्ला, शशि भूषण मिश्र, दिवाकर सिंह, वीरेंद्र तिवारी एवं दिलीप पाठक शामिल हैं जिनको सरकारी वकील तो बना दिया है लेकिन इनका नाम एओआर में था ही नहीं।

 

 

 

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