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सावित्रीबाई फुले: देश में पहला बालिका स्कूल खोलकर, नारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली ‘ज्ञान की देवी’

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

मनुस्मृति के नियमों को धवस्त करके महिलाओं को सम्मान से जीना सिखाने वाली, आखिरी सांस तक मानव सेवा को समर्पित कर देने वाली नारी अधिकारों की मुक्तिदाता को देश की वास्तविक ज्ञान की देवी को ‘नेशनल जनमत’ का नमन।

बहुजनों के साथ ही तथाकथित उच्च जातियों की महिलाओं को भी याद रखना चाहिए कि सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) के संघर्षो पर ही आज महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं।

डेढ़ सौ साल पहले सावित्रीबाई फुले ने पितृसत्ता और स्त्री विरोधी मान्यताओं को ध्वस्त कर स्त्री मुक्ति की जो परिभाषा रची वह सदियों तक सम्मानित की जाती रहेगी। तमाम भारतीय दलित महिला आंदोलन के साथ-साथ डा. आंबेडकर के लिए भी सावित्री बाई का संघर्ष उनका मार्गदर्शक रहा है।

आम की टहनियों की कलम से पढ़ाई शुरू की- 

अपने खेत में आम के पेड़ तले जब जोतिबा  ने उसी पेड की एक टहनी से दो कलम बनाकर सावित्रीबाई और अपनी चचेरी बुआ सगुणा बाई को देकर उसी जमीन पर पहला अक्षर लिखने को कहा।

तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि वे भारत में स्त्री शिक्षा की नींव रख रहे हैं। जब सावित्रीबाई ने उसी आम की टहनी से बनी कलम से जमीन पर पहला अक्षर लिखा तब वे कहाँ जान पायी होंगी कि वे एक अक्षर नहीं बल्कि नया इतिहास लिख रही हैं।

संघर्ष के साथ शिक्षा पूरी की- 

सावित्रीबाई ने स्वयं अपनी शिक्षा भी तमाम संघर्षो के बाद पूरी की। उस समय पुणे जैसे ब्राह्मणवादी मान्यताओं में जकड़े शहर में एक पिछड़े वर्ग की स्त्री का शिक्षा हासिल करना लगभग असंभव ही था। 1940 में पुणे की छबीलदास हवेली में स्थित ब्रिटिश महिला मिसेज मिशेल द्वारा विशेष रूप से लड़कियों के लिए खोले गये नार्मल स्कूल में उन दोनों ने पढाई शुरू की।

सावित्रीबाई को पढ़ने का बहुत शौक था। उन्होंने उसी दौरान प्रसिद्द गुलामीप्रथा के खिलाफ काम करने वाले ब्रिटिश थामस क्लार्कसन की जीवनी को पढ़ा, जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

यह जानते सावित्रीबाई को देर नहीं लगी कि शिक्षा ही गुलामी की जंजीरे तोड़ सकती है। टामर्स क्लार्कसन भी दुनिया भर में अपनी बात प्रभावी रूप से इसी लिए पहुंचा पाये क्योंकि वे शिक्षित थे।

1848 में खोला लड़कियों के लिए पहला स्कूल- 

फुले दंपत्ति ने एक जनवरी 1848 में पुणे की भिड़ेवाड़ी में लड़कियों के लिए भारत में पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल से सावित्री बाई और सगुणाबाई ने अध्यापन का काम शुरू कर भारत की पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव हासिल किया।

फुले दंपत्ति यह अच्छी तरह से जानते थे कि शिक्षा ही विकास के रास्ते खोल न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इसलिए बाह्मणवादी मानसिकता के लोगों द्वारा रास्ते में कीचड़-गोबर फेंके जाने के बाद भी वो अपने अभियान में डटी रही।

इसी सोच के साथ 15 मई 1848 को उन्होंने पुणे की एक दलित बस्ती में दूसरा स्कूल खोला। इस स्कूल में पढ़ाने के लिए जब कोई अध्यापक नहीं मिला तब सावित्री बाई और सगुणा बाई ने वहां पढ़ाना शुरू किया।

एक-एक तिनका जोड़कर 18 स्कूल खोले- 

पुणे की भिडेवाड़ी में 1 जनवरी 1848 में भारत का लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोलने के बाद मात्र 4 साल के भीतर ही 15 मार्च 1852 तक उन्होंने पूणे शहर और उसके आस पास 18 स्कूल खोले जहां सभी विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी।

सावित्रीबाई द्वारा पढ़ाए गए न जाने कितने ही छात्रों के जीवन में उससे भारी परिवर्तन आया। उनकी इन्हीं स्कूल में पढ़ने वाली दो छात्रों का जिक्र यहां जरूरी है। मुक्ताबाई, जिनका निबंध ‘मांग महारों के दुःख के विषय में और ताराबाई शिंदे, जिनके स्त्री पुरूष तुलना आज आधुनिक भारतीय स्त्रीवादी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जिस वक्त मुक्ताबाई ने इस निबन्ध को लिखा था उनकी उम्र मात्र 14 साल की थी। इस निबन्ध को पढ़कर जाना जा सकता है कि उनकी सोच सामाजिक विसमता जैसे कठिन विषय पर कितनी संवेदनशील और गहरी थी।

सावित्रीबाई फुले की तारीफ विदेशों में हुई- 

फुले दम्पत्ति द्वारा चलाए जाने वाले सभी स्कूलों में विद्यार्थियों के समग्र विकास को ध्यान में रखकर जो पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया उसमें व्याकरण, गणित, भूगोल, एशिया यूरोप व भारत के नक्शों की जानकारी, मराठों का इतिहास नीतिबोध और बालबोध जैसी पुस्तकें शामिल थीं। जिसकी प्रशंसा उस वक्त ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भी की गयी।

पुणे विश्वविद्यालय के मेजर कैन्डी ने इस विषय पर अपने वृतांत में लिखा इन स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों विशेषकर लड़कियों की लगन और कुशाग्र बुद्धि देखकर मुझे बहुत संतोष हुआ। इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर काफी ऊंचा है।

देश में पहली मुस्लिम लड़की को अध्यापिका बनाया- 

सावित्री बाई और ज्योतिबा ने शूद्रों-अतिशूद्रों के अलावा अल्पसंख्यक वर्ग के स्त्री पुरूषों की शिक्षा को भी जरूरी माना और फातिमा शेख जो उनके ही स्कूल की छात्रा थी, उसे अपने एक स्कूल में अध्यापिका बनाकर देश की पहली मुसलमान अध्यापिका होने का गौरव प्रदान किया।

फातिमा शेख फुले दंपत्ति के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण स्त्री नेतृत्व के रूप में जानी जाती है। परिवर्तन और सामाजिक न्याय में धर्मनिरपेक्ष सोच का भी शामिल होना जरूरी है यह लड़ाई तभी सफल होगी जब सभी जाति और धर्म की स्त्री शिक्षित होगी।

महिलाओं की मुक्तिदाता- 

सावित्रीबाई भारत की पहली स्त्री शिक्षिका ही नहीं बल्कि उन्हें पहले नारी मुक्ति आंदोलन के नेतृत्व का भी गौरव हासिल है। 1892 में उन्होंने महिला सेवा मंडल के रूप में पुणे की विधवा स्त्रियों के आर्थिक विकास के लिए देश का पहला महिला संगठन बनाया।

इस संगठन के माध्यम से सावित्रीबाई छोटे-छोटे ऐसे कई उद्योग जिसका प्रबंधन उन अशिक्षित महिलाओं द्वारा हो सके उसकी जानकारी उन्हें देतीं। सावित्री बाई यह अच्छी तरह से जानती थीं कि सामाज से निष्कासित इन स्त्रियों का जीवन सुरक्षित नहीं है।

सावित्रीबाई मानती थीं कि महिलाओं का सम्मान से जीवित रहना बड़ी चुनौती है इसके लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना ही एकमात्र उपाय है।

धार्मिक मान्यताओं को पीछे छोड़ा- 

सावित्रीबाई ने कई धार्मिक मान्यताओं को तोड़ा और स्त्रियों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए जागरूक किया। स्त्री की सदियों पुरानी शारीरिक और मानसिक रूप से गुलाम छवि को ध्वस्त कर उसे स्वतंत्र इंसान के रूप में जीने के लिए प्रेरित किया।

ज्योतिबा के समय में पुणे शहर की पहचान विधवा स्त्रियों की यौन हिंसा के केन्द्र के रूप में थी। जहां अक्सर गर्भवती विधवा स्त्रियां आत्महत्या करने पर मजबूर हो जातीं। फुले दम्पत्ति ने 28 जनवरी 1853 में अपने पड़ोसी मित्र और आंदोलन के साथी उस्मान शेख के घर में बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की।

जिसकी पूरी जिम्मेदारी सावित्रीबाई ने सम्भाली वहां सभी बेसहारा गर्भवती स्त्रियों को बगैर किसी सवाल के शामिल कर उनकी देखभाल की जाती उनकी प्रसूति कर बच्चों की परवरिश की जाती जिसके लिए वहीं पालना घर भी बनाया गया।

विधवा ब्राह्मण के बेटे को गोद लिया- 

विधवाओं के साथ समस्या कितनी विकराल थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 4 सालों के अंदर ही 100 से अधिक विधवा स्त्रियों ने इस गृह में बच्चों को जन्म दिया। जिसमें अधिकांश स्त्रियां ब्राहमण थीं।

1873 में ऐसी ही एक ब्राह्मण विधवा स्त्री काशीबाई की प्रसूति स्वयं सावित्रीबाई ने की और उसके बेटे को गोद ले लिया। उसका नाम यशवंत रख उसकी परवरिश पूरी जिम्मेदारी के साथ पूरी की। उनका यही बेटा बाद में चलकर डॉक्टर बना और फुले दंपत्ति के आंदोलन को आगे बढ़ाने में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सत्यशोधक समाज की बागडोर संभाली- 

1890 में ज्योतिबा की मृत्यु के बाद 1893 सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्रीबाई को सौंपी गयी। उन्हें सर्व सम्मति से अध्यक्ष चुना गया। सावित्रीबाई ने 4 सालों तक सत्यशोधक समाज का प्रबंधन कुशलता से किया। 1896 में महाराष्ट्र में पड़े सूखे के दौरान सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर वे रात-दिन लोगों की मदद करती रहीं।

अगले ही वर्ष 1897 में पूणे शहर में प्लेग की महामारी फैल गयी। जब अधिकांश लोग शहर छोड़कर भाग गये सावित्रीबाई और उनके पुत्र वहीं रहकर बिमार लोगों की सेवा करते रहे। प्लेग से संक्रमित एक व्यक्ति को सावित्री बाई अकेले ही कंधों पर उठाकर यशवंत के अस्पताल ले गयीं।

प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए वे स्वयं भी संक्रमण की चपेट में आ गयीं और इसी कारण उनकी मृत्यु हो गयी। सावित्रीबाई अपने जीवन के अंतिम दिन 10 मार्च 1897 तक इंसानियत के लिए संघर्ष करती रहीं।

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