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क्यों बनता है कोई फूलन या ददुआ? बुंदेलखंड के बीहड़ और सामंतवाद की दास्तान

नई दिल्ली। अनूप पटेल (नेशनल जनमत ब्यूरो) 

कल से लेकर आज तक सोशल नेटवर्क खासकर फेसबुक और व्हाट्सएप में फूलन देवी से जुड़े पोस्ट्स वायरल हो रहे हैं. कुछ लोगों ने फूलन देवी को भारतीय नारीत्व का प्रतीक बताया, बलात्कारियों को सबक सिखाने वाली वीरांगना बताया, सवर्ण मानसिकता को उसी की भाषा में जवाब देने वाली नायिका बताया, बुलेट से लेकर बैलेट तक की सार्थकता को साकार करने वाली बताया.

ऐसे ही आज से 4 दिन पहले शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ के बारे में खूब लिखा गया. लोगो ने ददुआ को भारत का असली रॉबिनहुड बताया, गरीबो-मजलूमों का हमदर्द बताया, बीहड़ो में सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाला बागी बताया, सामंतवाद का गुरूर तोड़ने वाला बताया.

जबकि कानून और मुख्य धारा की मिडिया के हिसाब से दोनों कुख्यात अपराधी थे, दोनों ने जातीय-वैमस्यता को हवा दी और जंगलराज चलाने वाले मुजरिम थे. आखिरकार सोशल साइट्स में बहुतायत लोग इन दोनों लोगों को क्यों याद कर रहे हैं?

किसान क्रान्ति सेना के अध्यक्ष हार्दिक पटेल ट्वीट करते है – ददुआ और फूलन देवी अपराध की दुनिया में क्यों जाते है. इनके मरने पर लाखों लोग आंसू क्यों बहाते है? इसका जिम्मेदार कौन??

फूलन की कई जीवनियां लिखी गयी हैं लेकिन सबसे प्रमाणिक जीवनी माला सेन की इण्डिया’ज बैंडिट क्वीन है. माला सेन ने फूलन के कई इंटरव्यू लेकर, उनकी निजी जिंदगी के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया है अपनी किताब में.

जन्म से ही विद्रोही थीं फूलन- 

फूलन का जन्म 1963 में कानपूर देहात जिला के घुरा के पुरवा में एक मल्लाह परिवार में हुआ था. मल्लाह जाति का पेशा नाव चलाना होता है और और अक्सर ये नदी किनारे अपना घर बनाते है, मल्लाह अति-पिछड़ा वर्ग से ताल्लुकात रखते है. फूलन देवी का परिवार अत्यंत ही गरीब था. परिवार की जीविका मजदूरी पर आश्रित थी. फूलन शुरू से विद्रोही स्वाभाव की थी. जब वो 11 साल की थी तभी उसने विद्रोही तेवर दिखाए थे.

फूलन के चचेरे भाई ने पैत्रक जमीन बेचनी चाही, फूलन अपने भाई से लड़ गयी थी. लड़कियों का विद्रोही स्वभाव का होना परिवार के लिये घातक था. फूलन के चचेरे भाई ने फूलन की माँ को समझाकर 11 वर्षीय फूलन की शादी 30 वर्षीय पुत्तिलाल से कर दी. पुत्तीलाल ने फूलन के गौना होने का इंतज़ार भी नहीं किया और जबरदस्ती कई बार बलात्कार किया.

फूलन ने पुत्तीलाल का भरसक विरोध किया और अंत में अपने पति को छोड़कर मायके आ गयी और मजदूरी करके अपना गुजर-बसर करने लगी. फूलन का पितृ-सत्ता के खिलाफ पहला प्रतिरोध था. फूलन मजदूरी से अपनी जिंदगी चला रही थी. एक बार मकान बनवा रहे व्यक्ति ने फूलन को उसकी मजदूरी नहीं दी. फूलन को इतना गुस्सा आया कि उस व्यक्ति का मकान मिटटी के ढेर में बदल दिया.

वो व्यक्ति सवर्ण जाति से ताल्लुक रखता था. गाँव के संपन्न लोगों की आंखों में फूलन किरकिरी बनने लगी थी. गांव के दबंगों ने फूलन के साहस का मर्दन करने के लिये फूलन के माता-पिता के सामने फूलन का रेप किया. फूलन उस समय 15 वर्ष की थी. दबंग जातियों के सामने मल्लाहो की कोई हैसियत न थी उस समय. जबकि भारत आजाद हो चूका था, भारतीय संविधान लागू हो चूका था लेकिन घुरा के पुरवा में सवर्ण जातियों का ही कानून चलता था.

फूलन को समाज, परिवार से घृणा हो गयी और उसने बीहड़ का रास्ता अपनाया. फूलन चम्बल घाटी में सक्रिय डकैतों के एक गैंग को ज्वाइन कर लिया. गैंगवार के चलते फूलन को निशाना बनाया गया. फूलन देवी का अपहरण करके बेहमई गांव में ठाकुरों ने रेप किया और उसे मरा समझकर छोड़ दिया.

फूलन को तब साथ मिला विक्रम मल्लाह का. फूलन ने विक्रम मल्लाह से शादी की. दोनों ने अपना गैंग बनाया और और सन 1981 में बेहमई का वीभत्स काण्ड हुआ. फूलन ने दो बलात्कारियों की शिनाख्त कर ली थी, फूलन उन्हें अपने साथ बेहमई गाँव में ले आयी और गैंग-रेप में शामिल अन्य लोगो को ढूंढ निकाला. फूलन ने 22 बलात्कारियों को जो संयोग से सभी ठाकुर जाति के थे, को एक लाइन में खड़ा करके गोली मार दी.

एक महिला द्वारा अपने बलात्कार का बदला इससे भयानक और कहीं नहीं हो सकता. बेहमई हत्याकाण्ड के बाद देश-विदेश में फूलन के नाम की चर्चा होने लगी थी और चम्बल के बीहड़ में एक महिला डकैत का वर्चस्व हो गया था. लेकिन फूलन पर पुलिस का शिकंजा भी कसने लगा था. इसी बीच फूलन का पति विक्रम मल्लाह पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी फूलन के साथ हुयी ज्यादती और समाज के प्रति उसकी नफरत से वाकिफ थी. इंदिरा गांधी ने फूलन को सरेंडर करने को कहा. फूलन ने 1983 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और सामाजिक न्याय के समर्थक अर्जुन सिंह के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया. आत्म समपर्ण करने के एवज में फूलन ने अर्जुन सिंह के समक्ष शर्ते रखी जिसे मान लिया गया. शर्ते थी-

उसके साथियों को मृत्युदंड नहीं दिया जाये। फूलन की अगली शर्त ये थी कि उसके गैंग के सभी लोगों को 8 साल से अधिक की सजा न दी जाए। लेकिन 11 साल तक फूलन देवी को बिना मुकदमे के जेल में रहना पड़ा और 1994 में आई समाजवादी सरकार ने फूलन को जेल से रिहा किया। फूलन अपने गैंग की लीडर थी और एक लीडर की भांति अपने गैंग के लोगो का भी ध्यान रखा.

समाज को एकजुट रखने के लिए एकलव्य सेना बनाई- 

रिहा होने के बाद फूलन ने अपने समाज को एकजुट करने के लिये एकलव्य सेना बनाई. इसी बीच फूलन ने देश के कई समाजवादी नेताओं के साथ मंच साझा किया और पिछड़े समाज के उत्थान के प्रति अपने विचार प्रकट किए. लेकिन राजनीति समाजवादी पार्टी के बैनर से ही शुरू की।

फूलन 1996 में मिर्जापुर से लोकसभा के लिये चुनी गयी और लगातार दो बार सांसद रहीं. फूलन का सफ़र एक बीहड़ के डकैत से शुरू होकर संसद तक गया. संसद में उस समय सबसे चर्चित शक्सियत फूलन देवी ही थी. सांसद फूलन देवी पर सिनेमा और साहित्य की भी नजरें पड़ी.

विश्विख्तात पत्रिका ‘टाइम’ ने फूलन को सदी की सर्वश्रेष्ठ महिलाओं में से एक बताया. भारतीय मीडिया और बौद्धिक जगत फूलन को भारतीय समाज और राजनीति के लिये कलंक बताता रहा वहीं पूरी दुनिया में फूलन के साहस भरी जिंदगी को सलाम किया गया.

प्रसिद्द फिल्मकार शेखर कपूर ने माला सेन की किताब के आधार पर 1996 में फिल्म बनाई, बैंडिट क्वीन. फिल्म में फूलन का किरदार प्रसिद्द अभिनेत्री सीमा विस्वास ने निभाया. फिल्म काफी विवादस्पद रही. खुद फूलन ने इस फिल्म के कुछ फिल्मांकन का विरोध किया और न्यायलय में फिल्म के खिलाफ केस भी किया. फूलन को फिल्म के चार फिल्मांकन से ऐतराज था.

शेखर कपूर ने वादा किया था कि वो सीन काट देंगे लेकिन कुछ समय के बाद फिल्म जस की तस रिलीज हुयी. फूलन ने प्रसिद्द पत्रकार और आज के बड़े कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला को दिए गये एक इंटरव्यू में कहा था- उन्हें फिल्म से कोई ऐतराज नहीं है, जो मेरे साथ हुआ है उसे पूरी दुनिया को देखना चाहिये. बस गलत सीन्स न दिखाये.

फूलन ने सांसद बनने के बाद उम्मेद सिंह से विवाह किया. ये उनकी तीसरी शादी थी. उम्मेद सिंह के साथ उनके सम्बन्ध खट्टे-मीठे रहे. फूलन प्यार, जज्बात और अहसास को ताउम्र खोजती रहीं, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी.

सांसद फूलन देवी 25 जुलाई 2001 में जब संसद से लौट रही थी तो उनके घर के पास पहले से घात लागाये लोगों ने फूलन पर ताबड़तोड़ गोलिया चलाई. फूलन ने वही दम तोड़ दिया. फूलन की हत्या की जिम्मेदारी शेर सिंह राणा ने ली. राणा ने बेहमई हत्याकाण्ड का बदला लेने की बात कही. लेकिन फूलन की मौत भी शानदार रही. फूलन की मौत एक जन-प्रतिनिधि के रूप में हुयी.

फूलन का हत्यारा आज पे-रोल पर जेल से बाहर है और हाल में हुये सहारनपुर दंगो में उसकी संलिप्तता बतायी जा रही है. राणा का बाहर होना भारतीय कानून ब्यवस्था और न्याय व्यवस्था का मजाक होना है. फूलन देवी की हत्या हुये आज 16 साल हुये है, लेकिन आज के दायर में फूलन नारी शक्ति का प्रतीक बन गयी है.

एक मल्लाह की बेटी ने अपने साहस-हौसला से पितृसत्ता को धुआं-धुआं कर दिया। जो आज फूलन को याद नही कर रहे वो किस दर्जे के/की फेमिनिस्ट होंगे, आप खुद सोचिये।

अब बात शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ की- 

वहीं दूसरी और शिवकुमार पटेल उर्फ़ ददुआ बुन्देलखण्ड के रोबिनहुड के रूप में फेमस हुआ. ददुआ का जन्म 1955-56 में चित्रकूट जिले के देवकली ग्राम में हुआ था. बुन्देलखण्ड का इलाका हमेशा से उपेक्षित रहा है. उत्तर प्रदेश में किसी की भी सरकार रही हो बुन्देलखण्ड पर सरकार बहादुर की नजरे कभी इनायत नहीं हुयी.

खेती-किसानी के अलावा और कोई जीविका का साधन नहीं था उस समय. शिवकुमार युवावस्था में खेती-किसानी में अपने पिता का हांथ बंटाना शुरू किया. किसी विवाद के चलते पास के गांव रायपुर निवासी जगन्नाथ से झगडा हो गया. जगन्नाथ ने अन्य लोगों के साथ मिलकर शिवकुमार के पिता को गांव में नंगा घुमाया और मार दिया.

शिवकुमार को जब ये पता चला तो सीधा वो जमींदार जगन्नाथ के घर पंहुचा, वहां दबंगों ने शिवकुमार को पकड़कर फिर पीटा इसके बाद ददुआ ने गुस्से की आग में उसके सीने में दो गोलियां दाग दीं और वहां से कहता हुए घर पहुंचा की मैंने अपनी पिता की मौत का बदला ले लिया। यही से शिव कुमार पटेल ‘ददुआ’ बन गया.

मानिकपुर के जंगल और ददुआ- 

ददुआ ने मानिकपुर के जंगलो को अपना अड्डा बनाया. उस समय बीड़ी के व्यापारी आदिवासियों का बहुत शोषण करते थे वही दूसरी ओर क्रेशर मशीन वाले धन्ना सेठ आदिवासियों के जंगल और पहाड़ का दोहन कर रहे थे. ददुआ आदिवासियों का मसीहा बनकर उभरा. ददुआ ने बीड़ी व्यापारियों और और क्रेशर मशीन के मालिको को खूब लूटा और लुटे हुये माल-असबाब को गरीब आदिवासियों में बांटा. आदिवासी ददुआ को भगवान की तरह पूजने लगे थे.

ददुआ की राजनैतिक समझ बहुत तगड़ी थी. ददुआ के प्रभाव के चलते करीब 500 ग्राम प्रधान उनके समर्थक बन गये थे. ददुआ का प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश के जबलपुर तक था. ददुआ ने बुन्देलखण्ड में सवर्णों के वर्चस्व को काफी हद तक कम कर दिया था. ददुआ शुरूआती दिनों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक थे. इसके बाद वो बसपा से जुडे.

ददुआ के इस ऐलान के बाद बुन्देलखण्ड का दलित-पिछड़ा निडर होकर वोट करता था. ददुआ के समय बुन्देलखण्ड बसपा का मजबूत गढ़ माना जाता था. लेकिन ददुआ का अंत बसपा सरकार के समय पर ही हुआ. ददुआ करीब 30 सालों तक बीहड़ो में रहा. आजाद भारत में बीहड़ो में सबसे ज्यादा (वीरप्पन से भी ज्यादा) समय रहने का रिकार्ड ददुआ के नाम ही रहा. पिछले साल ददुआ और उनकी पत्नी का भव्य मंदिर बनवाया गया है.

फतेहपुर के एक गांव में ददुआ का बना मंदिर- 

बुन्देलखण्ड के कुछ लोगो के लिये वो एक अपराधी था, लेकिन कुछ लोगों के लिये वो आज भी देवता से कम नहीं और आज भी उनकी पूजा की जा रही है. फतेहपुर के नरसिंहपुर कबरहा गांव में ददुआ के बनवाए मंदिर में उनकी व उनकी पत्नी की मूर्ति ददुआ के भाई पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल ने लगवाई है। इस बार में बालकुमार पटेल कहते हैं कि असलियत में  ददुआ के चाहने वालों की कमी नहीं हैं। बीहड़ में आज भी लोग उन्हें गरीबों के मसीहा की तरह पूजते हैं। उनका कहना है कि ददुआ ने हमेशा सामंतो और साहूकारों से छीनकर गरीबों का हक दिलाया।

ददुआ पर बन रही है फिल्म द गॉड ऑफ गन-

नवंबर में खबर आई थी कि ददुआ के जीवन पर द गॉड अॉफ गन मूवी बन रही है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक रईस खान हैं। लेकिन फिलहाल मूवी कहां तक पहुंची अभी जानकारी नहीं हो पाई।

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है, इन दोनों शख्सियतो को लोग बहुतायत में याद कर रहे है. आखिर क्या क्या वजहें है कि कानून की नजरों में अपराधी व्यक्तियों में आम जनता की श्रद्धा बढती जा रही है. क्या आम आदमी, गरीब-दलितों का कानून-व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है. क्या लोकतंत्र पूजीपति और उच्च जातियों की मुठियों में कैद होता जा रहा है? क्या फूलन देवी और ददुआ पैदा होते रहेंगे या फिर हमारा समाज में बदलाव होगा, ये सवाल अनुत्तरित है.

(लेखक अनूप पटेल स्वयं बुंदेलखंड के बांदा से आते हैं और जेएनयू में शोधार्थी हैं)

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