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मनुस्मृति के नियमों को तार-तार करके शिवाजी को बहुजन प्रतिपालक राजा बनाने वाली राष्ट्रमाता जीजाबाई

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

जाति की बेड़ियां तोड़कर अछूत समझी जाने वाली जातियों को अपनी सेना में भर्ती करके उनको मराठा सैनिक का नाम देने वाले बहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष को सिर्फ धर्म युद्ध में सीमित करके कुछ साम्प्रदायिक-जातिवादी संगठन उनके नाम का इस्तेमाल करते आ रहे हैं।

शिवाजी के भगवा ध्वज का इस्तेमाल करके उनको हिन्दु हृदय सम्राट राजा के बतौर स्थापित करने का कुत्सित प्रयास किया गया ताकि उनके जीवन का वास्तविक पक्ष लोगों के सामने आ ही नहीं आ सके। जबकि हकीकत ये है कि राष्ट्रमाता जीजाबाई ने अपने पुत्र शिवाजी महाराज को सबसे पहले जाति बंधन तोड़कर बहुजन प्रतिपालक राजा बनने की सीख दी थी।

लेकिन राष्ट्रपिता ज्योतिबाफुले शिवाजी के इतिहास को लोगों कसामने लेकर आए। माता जीजाबाई और शिवाजी के इसी पक्ष को समझाने की कोशिश कर रहे हैं सामाजिक कार्यकर्ता रामायण पटेल जो बीएचयू मे शोधार्थी हैं। 

तत्कालीन संघर्ष राजनीतिक संघर्ष था। अगर धर्मयुद्ध या धर्म का शासन होता तो मुस्लिम राजाओं के 670 साल के शासन काल में देश में एक भी हिन्दु ना बचता क्योंकि धर्म परिवर्तित करने के लिए तो 5 वर्ष ही काफी हैं। देखा जाए तो सारे मुस्लिम राजाओं की सेना में 80 प्रतिशत सेना हिंदु, उनके प्रदेश की जनसंख्या में 80 प्रतिशत से ज्यादा हिंदु समाज था.

कोई एक मुस्लिम शासक चाहता तो शायद 10 वर्ष के अंतराल में भारत की जनसंख्या इस्लामिक बन जाती। औरंगजेब का सेनापति हमेशा हिंदु रहा, सलाहकार ब्राह्मण रहे. प्रमुख पदो पर तो हिंदु ही रहे।

जीजाबाई ने भारत को सामाजिक आंदोलनकारी दिया- 

जीजाबाई ने भारत वर्ष को एक राजा ही नही दिया, उन्होंने एक सामाजिक आंदोलक भी दिया। सामाजिक एकता का एक संकल्पबद्ध राजा दिया, उन्होने एक बहुभाषिक राजा दिया, उन्होने एक वास्तु रचनाकार दिया।

एक वास्तविक सोशल इंजीनियरिंग का स्वरूप भी दिया। एक अनोखा राजनीतिज्ञ दिया, एक कृषि वैज्ञानिक दिया, उन्होंने एक नये-नये शस्त्र औजारों का खोजकर्ता दिया। एक नई युद्धनीति का निर्माता दिया, एक नया जासूसी तंत्र दिया, एक विदेशनीतिकार दिया, सबको समान अवसर देनेवाला राजा दिया।

जीजाऊ ने सेना में जातिय विभेद मिटा दिया- 

जीजाऊ ने सारी जातियों का एकीकरण करके उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान दी थी, वह थी मावला (मावळा)। इसमें समस्त छोटी-बडी जातियों का एकीकरण किया गया और एक नये नाम के साथ पहचान और उपाधी दी गई मावला.

शिवराय के समाज और सैनिको की पहचान बनी मावला. ना कोई मोची ना कोई भंगी ना कोई गड़रिया ना कोई राजपूत ना कोई ठाकुर, ना कोई आदिवासी। सबको एक प्रतिष्ठा, एक विचार, एक समाज, एक स्वराज्य संकल्प, एक धर्म एक संस्कृति की पहचान दिलाई वह है मावला.

आज भारतीय सेना में अलग अलग रेजिमेंट है. जाति के नाम पर. लेकिन शिवाजी के राज्य में भारतीय समाज को एक स्वाभिमानी प्रतिष्ठा देकर एकीकरण किया गया, सबकी पहचान मावला बनाई गई। शत्रुओं की ताकत साम-दाम-दंड भेद रही परंतु शिवराय की ताकत उनके सेनानियों में, समाज में संस्कारित विचार था।

जातिवादी समाज के खिलाफ बिगुल फूंका जीजाऊ ने- 

शिवाजी महाराज के लिए उनके जीवन में तकरीबन 3 बार साथी सैनिक शिवाजी महाराज बनकर शत्रु के पास गए और शिवराय को सही सलामत निकाला. यह इतिहास दुनिया के किसी राजा महाराजाओं के संदर्भ में आपको नही मिलेगा।

इन सब कार्यान्वयन के पीछे थीं राष्ट्रमाता जिजाऊ। जो जमात दूसरी जमात के आंगन में नही जा सकती थी. वैसे सैकड़ों बिरादरियों को जिजाऊ ने इन्सानी प्रतिष्ठा देकर शिवाजी के साथ खाना खिलाया, एक पंक्ति में बैठाया।

स्वराज्य आंदोलन शुरु करने से पहले का यह जो सामाजिक एकता का परिवर्तन जिजाऊ ने शिवबा के माध्यम से स्थापित किया, जिससे प्राप्त एक वैचारिक संकल्प दृढता ने ही भारतीय समाज को स्वराज्य प्रदान दिया।

जीजाऊ ने एक शेर पैदा किया था- 

महाराष्ट्र के जाधव राजा की पुत्री जीजाऊ ने कुन्बी/ कुर्मी जागीरदार शाहजी भोंसले से घर की मर्जी के खिलाफ शादी करके स्पष्ट कर दिया था कि वो सामाजिक बंधनों की गुलाम नहीं हैं। इस शेरनी से उत्पन्न पुत्र एक शेर ही हो सकता था। जिसे अपने संस्कार और शौर्य देकर जीजाऊ ने छत्रपति की कुर्सी तक पहुंचा दिया।

जीजाबाई ने शिवाजी में जो संस्कार दिए उससे शिवाजी महाराज ने एक राष्ट्रीय सेना बनाई जिसे मावला नाम दिया। जिसमें हजारों जातियों के एकीकरण से एक राष्ट्रीय सेना एक राष्ट्रीय समाज बना था। उससे पहले मनुस्मृति के नियमों के अनुसार सिर्फ राजपूतों को ही सेना मे भर्ती होने की छूट थी।

शिवाजी के बाद पेशवाओ ने शिवाजी के पोते शाहूजी प्रथम को धोखे से मारकर मराठा सल्तनत के स्वराज्य पर कब्जा कर लिया। इसके बाद राष्ट्रीय सेना में जातियों की पक्तियां खड़ी कर दी गईं। सतारा से राजधानी पुणे ले आये और आगे चलकर भारतीय समाज के स्वाभिमान को पेशवाओं ने चकनाचूर कर दिया।

इस राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की जनक राष्ट्रमाता जिजाऊ ने शिवाजी के राज्याभिषेक के बारवें दिन, 17 जून 1674 को इस संसार से अपना जीवन त्याग दिया।

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