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IPS के अधिकारों में कटौती: अब SHO व इंस्पेक्टर नियुक्त नहीं कर पाएंगे SP, DM से लेनी होगी अनुमति

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

प्रमोशन को लेकर प्रांतीय पुलिस सेवा (पीपीएस) व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी पहले से ही नाराजगी व्यक्त करते रहे हैं। दोनों ही सेवाओं के पुलिस अधिकारी आरोप लगाते हैं कि उनके ही बैच में चयनित हुए पीसीएस व आईएएस अधिकारी जल्दी प्रमोशन पा जाते हैं।

जबकि पुलिस अधिकारियों की विभागीय प्रोन्नति समिति (डीपीसी) में देरी होने से वो अपने ही बैच के पीसीएस व आईएएस अधिकारियों से वरिष्ठता क्रम में नीचे रह जाते हैं। अब एक पुराने आदेश का रिमाइंडर देकर आईपीएस अधिकारियों के अधिकारों में कटौती का फरमान गृह विभाग ने दोबारा से जारी कर दिया है।

मुख्य सचिव राजीव कुमार के समय में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश के आईपीएस अफसरों के अधिकार में कटौती करने का एक शासनादेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार क्राइम मीटिंग की अध्यक्षता पुलिस कप्तान की जगह जिलाधिकारी करेंगे।

जिलाधिकारी की अध्यक्षता में होने वीली क्राइम मीटिंग में जिला पुलिस प्रमुख (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अथवा पुलिस अधीक्षक) को भी शामिल होना अनिवार्य है।

अब गृह विभाग से जारी निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि जिले में थानाध्यक्षों व इंस्पेक्टरों की तैनाती में अब किसी प्रकार औपचारिकता नहीं चलेगी। इसके लिए पुलिस कप्तानों को जिलाधिकारी से बकायदा अनुमति लेनी पड़ेगी। यानि अब पुलिस कप्तानों का जिले में कप्तान डीएम होंगे।

‘नेशनल जनमत’ ने कई आईपीएस अफसरों से बात करने की कोशिश कि लेकिन इस मामले में खुलकर बोलने को कोई तैयार नहीं हुआ, लेकिन दबी जुबान तकरीबन सभी ने अधिकारों में कटौती को गलत बताया।

पूर्व डीआईजी डीके चौधरी का कहना है कि जिले में थानाध्यक्षों और इंस्पेक्टरों से नियमित सम्पर्क में पुलिस कप्तान ही होते हैं। उनसे बेहतर काम लेने और कानून व्यवस्था को सुचारू ढ़ंग से चलाने की पहली जिम्मेदारी पुलिस कप्तान की ही होती है।

ऐसे में अधिकार में कटौती करना अविश्वास जताने जैसा कदम है। जिससे पुलिस अधिकारियों का मनोबल प्रभावित होगा।

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