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आरक्षण विरोधियों सुन लो अश्वेतों के आरक्षण के बाद ही दक्षिण अफ्रीकी टीम आज विश्व में नंबर 1 है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

भारत- पाकिस्तान के बीच जब भी मैच होता है तो भारतीय मीडिया और बाजारू राष्ट्रवादी लोग क्रिकेट को खेल ना रहने देकर युद्ध की संज्ञा दे देते हैं. इसके अलावा न्यूज चैनलों पर भविष्यवाणी करने वाले कुछ पाखंडी लोगों को बुलाकर जनमानस में भाग्यवाद और पाखंड का बीज बोया जाता है. खैर चैंपियंस ट्राफी के फाइनल में हार के बाद भारतीय टीम के सवर्णवादी स्वरूप पर लोग सवाल उठा रहे हैं.

सोशल मीडिया पर लोगों ने क्रिकेट में सिफारिशो की बजाए मेहनत से आए लोगों को शामिल करने की बात भी कही. जेएनयू में भी यूनाइडेट स्टूंडेट फोरम के बैनर तले टीम सिलेक्शन में ओबीसी-एससी-एसटी के लिए आरक्षण की मांग की गई.

सोशल मीडिया में ये बात चर्चा में है कि दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड में अश्वेतों को आरक्षण मिला है, इसलिए आज के दिन दक्षिण अफ्रीका विश्व की नंबर एक टीम है.

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अश्वेतों को मिलता है आरक्षण टीम  सिलेक्शन में –

 

पिछले साल दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड (सीएसए) ने जोहांसबर्ग में क्रिकेट में नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए बड़ा फैसला लेते हुए दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम में आरक्षण लागू कर दिया था. इसमें यह तय हुआ कि आगे से सभी सीरीज के लिए कम से कम छह अश्वेत खिलाड़ियों को शामिल किया जाएगा।

टीम में डायवर्सिटी लाने और सिर्फ गोरे खिलाड़ियों का एकाधिकार खत्म करने के लिए दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम ने ये कदम उठाया था. नए नियम के तहत कम से कम 54 फीसदी काले खिलाड़ी और 18 फीसदी काले अफ्रीकी खिलाड़ी नेशनल टीम के लिए आईसीसी द्वारा मान्यता प्राप्त सभी प्रतियोगिताओं में खेलेंगे।

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यह कदम खेल मंत्री फिकिले बालुला द्वारा तीन महीने पहले उस घोषणा के बाद किया गया है जिसमें उन्होंने घोषणा की थी कि रग्बी, क्रिकेट, नेटबॉल और एथलेटिक्स जैसे खेल तब तक कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित नहीं कर पाएंगे जब तक कि वे कोटा सिस्टम लागू नहीं करते हैं।

क्या है आरक्षण का तरीका- 

प्रदेश स्तर की और फ्रेंचाइजी क्रिकेट लीग के लिए आरक्षण का नियम पिछले तीन वर्षों से है लेकिन पहली बार इसे राष्ट्रीय टीम के लिए भी अपनाया गया है। 11 सदस्यों की टीम में कम से कम 4 काले खिलाड़ी शामिल होंगे, जिनमें से एक का अफ्रीकी ब्लैक होना जरूरी है.

आईसीसी ने लगाया था बैन- 

टीम में खिलाड़ियों के चयन में रंगभेद का विवाद साउथ अफ्रीकी टीम में हमेशा से रहा है और टीम में सिर्फ गोरे खिलाड़ियों के चुने जाने के कारण आईसीसी ने 1970 में साउथ अफ्रीका पर इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर बैन लगा दिया था। लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि भारत में सिर्फ सवर्ण खिलाड़ियों का ही क्रिकेट में कब्जा है।

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इसकी बानगी आपको कई खिलाड़ियों के साथ हुए भेदभाव से देखने को मिल जाएगी। चाहे प्रणव धनावड़े हों या विनोद कांबली। उनके प्रतिभाशाली होने के बाद भी भारतीय क्रिकेट में उनकी अनदेखी की गई, और उनकी जगह सवर्ण खिलाड़ियों को अहमियत दी गई।

भारत से उठ रही है मांग- 

जेएनयू के यूनाइटेड ओबीसी फोरम के छात्रों द्वारा क्रिकेट में आरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन करने के साथ ही सोशल मीडिया पर भी खेल में आरक्षण को लेकर बहस छिड़ चुकी है. सामाजिक चिंचकों को मानना है कि टीम में विविधता आने से क्रिकेट टीम और अन्य किसी भी टीम का प्रदर्शन और बेहतर साबित होगा.

सचिन तेंदुलकर- विनोद कांबली विवाद- 

भारत में सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को लेकर काफी विवाद हुआ था। सचिन को बार-बार मौके मिलते रहे जबकि कांबली को भेदभाव के कारण बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड होने के बावजूद मौके नहीं मिल पाए।

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अर्जुन तेंदुलकर-प्रणव धनावड़े मामला-

क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के पुत्र अर्जुन तेंदुलकर व रिक्शा चालक के बेट प्रणव धनवड़े का मामला भी सुर्खियों में रहा। यहां भी योग्यता विरासत के आगे बौनी साबित हुई। क्योंकि मुंबई अंडर 16 टीम में 1009 रन बनाने वाले रिक्शा चालक के बेटे को टीम में जगह नहीं दी गई बल्कि इसकी जगह सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर को जगह दी गई थी जिसपर देशभर में बहस छिड़ गई थी।

साभार- नेशनल दस्तक

 

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