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कोई लड़ रहा है तो कोई मौन है, आओ देखते हैं क्रांतिकारी कौन हैं…सूरज कुमार बौद्ध की कविता

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

क्रांतिकारी भूख का एहसास भूल जाता है,
गमगीन आंखों को देख प्यास भूल जाता है।

कोई लड़ रहा है तो कोई मौन है।
आओ देखते हैं क्रांतिकारी कौन है।

ऐसा नहीं कि क्रांतिकारी
पेट से भरपूर है
और ना ही वह किसी
मंजिली महलों की नूर है।

वह गरीब क्रांतिकारी है जो
शोषक मालिक के खिलाफ बगावत करता है।
वह मजदूर क्रांतिकारी है जो
अपने पसीने की मोल पाना चाहता है।

वह विद्यार्थी क्रांतिकारी है जो
द्रोणाचार्यों के खिलाफ विद्रोह करता है।
वह महिला क्रांतिकारी है जो
पितृसत्तात्मकता को तमाचा मार रही है।

वह मुसलमान क्रांतिकारी है जो
कट्टर फतवों का बहिष्कार करता है।
वह समाज क्रांतिकारी है जो
दकियानूसी खाप को धिक्कार करता है।

वह आदिवासी क्रांतिकारी है जो
अपने जल-जंगल-जमीन,
संस्कृति-सम्मान-स्वाभिमान के लिए
कानूनी गुंडों से भिड़ने का माद्दा रखता है।

वह साथी क्रांतिकारी है जो
अपने जलाए गए बस्तियों तथा
अपनी बहनों पर हाथ डालने वाले
गुनहगारों से खुली जंग लड़ता है।

वह भूमिहीन-सीमांत किसान क्रांतिकारी है जो
भूमिहरों के खेत में मजदूरी करके
भूमिहीन होकर भी देश का पेट भरता है।

वह वंचित समाज क्रांतिकारी है जो
जातिवाद को अपने पैरो तले कुचल रहा है।

वह नास्तिक क्रांतिकारी है जो
कोर कल्पित देवों को नजरअंदाज करता है।

क्रांतिकारी सिर्फ क्रांति का इजहार करता है,
अपने महबूब ‘मौत’ से बेहद प्यार करता है।

आओ संघर्ष के खिलाड़ी बनें
सरकारी नहीं क्रांतिकारी बनें।

( लेखक सूरज कुमार बौद्ध इलाहाबाद वि.वि. में अध्ययनरत क्रांतिकारी विचारों के साथी हैं ) 

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