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पेरियार की धरती पर ब्राह्मणवाद के ‘जनेऊ NEXUS’ के खिलाफ 7 अगस्त को सुअर का ‘जनेऊ संस्कार’

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

पेरियार रामास्वामी नायकर की धरती से एक क्रांतिकारी कदम की घोषणा हुई है. ब्राह्मणवादियों के जनेऊ नेक्सस या जनेऊ गठजोड़ के कारण गैरबराबरी और जातिवाद से ग्रसित समाज ने 7 अगस्त को सुअरों का उपनयन संस्कार करने यानि जनेऊ पहनाने की घोषणा की है।

टीपीडीके संगठन का क्रांतिकारी कदम- 

तमिलनाडु के संगठन Thanthai Periyar Dravidar Kazhagam (TPDK) ने एक पोस्टर जारी करके घोषणा की है कि 7 अगस्त को चेन्नई के संस्कृत कॉलेज में सुअरों को ब्राह्मणों का पवित्र धागा यानि जनेऊ पहनाया जाएगा। इस प्रदर्शन को ‘Panrikku Poonool podum porattum’, नाम दिया गया है।

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7 अगस्त ही क्यों चुना गया ? 

इस विरोध प्रदर्शन के आयोजकों ने बताया कि 7 अगस्त को इस कार्यक्रम को रखने के पीछे एक खास मकसद है। दरअसल सात अगस्त को तमिलनाडु के ब्राह्मणों का पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन तमिलनाडु के ब्राह्मण वार्षिक समारोह करके पवित्र धागा यानि जनेऊ बदलते हैं। इसलिए हम इस दिन इस जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन स्वरूप सुअर को जनेऊ पहनाएंगे।

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जनेऊ पर टारगेट क्यों ? 

टीपीडीके संगठन के चेन्नई अध्यक्ष एस कुमारन कहते हैं कि ब्राह्मण जनेऊ पहनकर अपने आप को अन्य समाज से अलग और श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश करते हैं और चार वर्णों के सिस्टम को मजबूती से निभाते हुए दलितों के साथ भेदभाव करते हैं इसलिए हम एक जानवर को जिसे ये लोग गंदा समझते हैं उसे जनेऊ पहनाएंगे।

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इसके अलावा एस कुमारन कहते हैं कि इस समय केन्द्र में संघ के लोग मजबूत होने से संघी ब्राह्मणों का अन्य वंचित जातियों के प्रति अत्याचार बहुत बढ़ गया है। इसलिए इस कार्यक्रम  को करना बहुत जरूरी हो गया था।

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं कि-

टिप्पणी नम्बर – 1 

पेरियार की धरती से एक और अभिनव प्रयोग। 7 अगस्त को तमिलनाडु में सूअरों का उपनयन संस्कार किया जाएगा।

जनेऊ अगर किसी को पवित्र बनाता है, तो वराह में क्या बुराई है?

बलात्कारी, हत्यारे, ठग, डकैत, कालाबाजारिए, सभी जब जनेऊ पहनने के कारण समाज में श्रेष्ठ और सबसे ऊपर हैं, तो सूअर भी श्रेष्ठ बनेगा।

मेरी टिप्पणी – अब ऊँची जातियों को जन्म का अहंकार छोड़कर भारतीय गणराज्य का सामान्य नागरिक बन जाना चाहिए। संविधान निर्माता यही चाहते थे।

जाति अगर कर्म से तय होती, तो बलात्कारियों के जनेऊ परिवार वाले उतार लेते।

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टिप्पणी नम्बर- 2

मशहूर लेखिका और एक्टिविस्ट मीना कंडासामी ने 2013 में काले रंग के जनेऊ के साथ तस्वीर डालकर एक साथ ब्राह्मण सत्ता और पुरुषसत्ता को चुनौती दी थी। तमिलनाडु में यह सब सांस्कृतिक जागरण का हिस्सा है। अब वहाँ के पेरियारवादी लोग सूअरों का यज्ञोपवित यानी उपनयन संस्कार करना चाहते हैं। जाति का श्रेष्ठताबोध जब तक रहेगा, तब तक बहुसंख्यक लोग उसे चुनौती देते रहेंगे। राष्ट्रीय एकता के लिए जनेऊ का त्याग करें।

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टिप्पणी नम्बर- 3 

क्या इन तस्वीरों से माल्या जी या भागवत जी की मानहानि होती है?

बल्कि यह धागा तो उनका जन्मजात गर्व है। यह उन्होंने अर्जित नहीं किया है। वे भ्रष्ट हैं तो भी पहनते हैं। समाज को तोड़ने जैसा गंदा काम करते हैं, तो भी पहनते हैं। हिंदू धर्म के 95% लोगों से अलग दिखाने वाली इस पहचान को वे गर्व से क्यों धारण करते हैं?

संविधान निर्माता इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोग जन्मगत श्रेष्ठताबोध से मुक्त नहीं हो पा रहे है। संविधान सभा के आख़िरी भाषण में 25 नवंबर, 1949 को बाबा साहेब ने जातिभेद को भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़े ख़तरों में बताया था।

तमिलनाडु में पेरियारवादियों ने शांतिपूर्ण प्रतिरोध के तौर पर, वराह को जनेऊ पहनाने का फ़ैसला किया है। जातिमुक्ति के लिए अब संघ और शंकराचार्यों को पहल करनी चाहिए। सवर्ण उन्हीं की बात सुनते हैं।

जिन भक्तों को खबर पर संदेह हो वो पूरी खबर इस लिंक पर देखें-

http://www.thenewsminute.com/article/dravidian-outfit-make-pigs-wear-sacred-thread-avani-avittam-day-protest-brahminism-65563

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