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मोदी सरकार की नीतियों से टेलीकॉम कम्पनियां हो गई बर्बाद

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

मोदी सरकार की नोट बंदी योजना के दुष्परिणाम अब देश वासियों के सामने आने लगे हैं। मोदी सरकार की गलत नीतियों से कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग, लगभग तबाह हो गए हैं। लाखों लोगों की नौकरियां भी चली गई हैं। हालात ये हैं कि हजारों करोड़ों का मुनाफा कमाने वाली टेलीकॉम सेक्टर की कम्पनियां भी मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण घाटे में जा रही हैं।

हालात ये हैं कि देश के कई उद्योगपति बैंकों से पैसा ले ले रहे हैं पर चुका नहीं पा रहे हैं। बाद में जुगाड़ से उस कर्जे को एनपीए (नॉन प्रोफेटेबल असेट ) बताकर रफा-दफा किया जा रहा है। सरकार के इस कदम से कई बैंको के भी डूबने का खतरा बढ़ गया है। आकड़ों के मुताबिक अकेले एसबीआई ने उद्योगपतियों के 1 लाख करोड़ रूपए को एनपीए घोषित किया है।

सरकार ने टेलीकॉम सेक्टर में प्रतियोगिता समाप्त करने के लिए रिलायंस को दी फ्री में नेट डाटा देने की छूट

टेलीकॉम सेक्टर में भारी प्रतियोगिता के चलते उपभोक्ताओं को कुछ लाभ हो रहा था. पर मोदी सरकार ने मुकेश अम्बानी को लाभ पहुंचाने के मकसद से और टेलीकॉम सेक्टर में प्रतियोगिता खत्म करके रिलायंस को एकाधिकार देने के उद्देश्य से जियो को मुफ्त में नेट की सेनाऐं देने से नहीं रोका। ताकि अन्य टेलीकॉम कम्पनियां घाटे में जाकर बंद हो जाऐं और बाद में टेलीकॉम सेक्टर में रिलायंस अकेली कम्पनी ही बचे और फिर वो जो चाहे रेट तय करके उपभोक्ताओं को लूट सके.

बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा की वजह से टेलीकॉम कंपनियों के मुनाफे पर करारी चोट पड़ी है। लेकिन यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं है। सरकार ने देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो को बेहद सस्ती दरों पर सेवा मुहैया कराने से नहीं रोका है।

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बैंकों का कर्जा चुकाने में नाकाम रही हैं टेलीकॉम कम्पनियां

देश के बड़े बैंकों ने टेलीकॉम सेक्टर के लिए खतरे की घंटे बजा दी है। देश की मोबाइल कंपनियों को सबसे ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक भारतीय स्टेट बैंक, एचडीएफसी, पंजाब नेशनल बैंक और एक्सिस ने एक अंतर मंत्रालय समूह से कहा है कि इस सेक्टर का लोन एक्सपोजर बहुत बढ़ गया है और कुछ कंपनियां कर्जा चुकाने में नाकाम रह सकती हैं। इससे पहले से भारी फंसे हुए कर्जों की समस्या से परेशान बैंकों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।

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विशेषज्ञों का कहना है बाजार में भारी प्रतिस्पर्धा की वजह से टेलीकॉम कंपनियों के मुनाफे पर करारी चोट पड़ी है। लेकिन यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं है। सरकार ने देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो को बेहद सस्ती दरों पर सेवा मुहैया कराने से नहीं रोका है। रिलायंस की बेहद सस्ती सेवाओं ने भारती एयरटेल, वोडाफोन, टाटा और एयरसेल जैसी कंपनियों के लिए काफी मुश्किलें खड़ी कर दी है।

रिलायंस की सस्ती कॉलिंग और डाटा दरों का मुकाबला करने के लिए उन्हें भी अपनी सेवाएं सस्ती करनी पड़ी है और इस चक्कर में उन्हें जबरदस्त घाटा हो रहा है। ये कंपनियां लगातार ट्राई से रिलायंस को सस्ती से सस्ती सेवाएं लांच करने से रोकने की मांग कर रही हैं। लेकिन ट्राई ने अब तक कोई फैसला नहीं किया है।

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इस बीच टेलीकॉम सेक्टर पर बैंकों का कर्ज बढ़ कर 4.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जबकि टेलीकॉम कंपनियों की सालाना कमाई 65,000 करोड़ रुपये तक पहुंची है। ऐसे में ये कंपनियां बैंकों का कर्ज कैसे उतारेंगी। अंतर मंत्रालय समूह इस समस्या पर बात करने के लिए भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेल्यूलर के साथ 16 तारीख को बैठक करेगा। टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि रिलायंस जियो के बेहद सस्ते प्लान ने उनका कारोबार लगभग ध्वस्त कर दिया है।

कम्पनियों को हो रहा है घाटा

जनवरी-मार्च की तिमाही में आइडिया सेल्यूलर को 325 करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ। इस तिमाही में भारती एयरटेल की कमाई 72 फीसदी घट गई। इसके पीछे रिलायंस जियो की आक्रामक प्राइसिंग रही है। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार से बेहतर संबंधों की वजह से रिलायंस को खासा फायदा हो रहा है। इसका फायदा उठा कर वह बाजार में अपने प्रतिस्पर्धियों पर भारी पड़ रही है। मोदी सरकार बाजार में जिस पारदर्शिता की बात करती है, उसका क्या हाल हुआ है और यह किसी से छिपा नहीं है।

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