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झारखंड के बाद UP के ‘रामराज’ में भी बिना आधार नहीं मिला राशन, बीमार महिला की भूख से मौत

नई दिल्ली/लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

लगता है मोदीराज में महिमामंडित करके घोषित की गई योजनाओं को आधी-अधूरी तैयारियो के साथ जनता के ऊपर थोपने की परिपाटी बन गई है। फिर चाहे वो नोटबंदी हो, जीएसटी हो या आधार कार्ड से विभिन्न चीजों को जोड़ने का फरमान।

देश की जनता की जमीनी हकीकत, उनकी शिक्षा, गरीबी और मानसिक स्तर समझे बगैर राष्ट्रवाद की आड़ में आधी-अधूरी योजनाएं उन पर लागू कर दी जाती हैं। जिसका खामियाजा देश के गरीब और अशिक्षित तबके को भुगतना पड़ता है।

सरकारों को योजना लागू करते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनके देश की जनता कितनी समझदार, शिक्षित और आर्थिक रूप से सम्पन्न है। इसके साथ ही सरकार को सरकारी सिस्टम की जमीनी हकीकत भी समझने की जरूरत है।

बीमार महिला के फिंगर फ्रिंट पर अड़ा था कोटेदार- 

हालिया मामला उत्तर प्रदेश के बरेली का है जहां आधार कार्ड के राशन कार्ड से जुड़े नहीं होने पर एक गरीब महिला को राशन नहीं दिया गया, जिससे भूख से उसकी मौत हो गई।  महिला पिछले पांच दिनों से बीमार चल रही थी, महिला को पति जब राशन लेने दुकान पर गया तो दुकानदार ने कहा कि तुम्हारी पत्नी के फिंगरप्रिंट के बिना राशन नहीं मिलेगा।

बीमार पड़ी महिला उठकर दुकान तक जाने के लिए सक्षम नहीं थी। न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद महिला की भूख से मौत हो गई। ऐसा यह तीसरा मामला है, इससे पहले दो मामले झारखंड से सामने आए थे।

जहां राशन कार्ड से आधार कार्ड लिंक नहीं था, जिसकी वजह से राशन नहीं मिला और एक युवक और एक 11 साल की बच्ची की भूख से मौत हो गई। हालांकि, सरकार ने इसे मानने से इंकार कर दिया कि उनकी मौत भूख से हुई है।

साथ ही सरकार ने कहा था कि सभी राशन दुकानों से कहा गया था कि आधार कार्ड नहीं होने पर राशन के लिए मना ना किया जाए।

झारखंड में भी ऐसे दो मामले सामने आए हैं- 

बता दें, झारखंड के सिमड़ेगा में 11 साल की एक बच्ची की 8 दिन से खाना न मिलने के कारण 28 सितंबर को भूख से मौत हो गई थी। छह महीने पहले बच्ची के परिवार का सरकारी राशन कार्ड रद्द कर दिया गया था क्योंकि उसे आधार से लिंक नहीं कराया गया था।

राइट टू फूड कैंपेन के एक्टिविस्ट्स ने बताया कि संतोषी कुमारी के परिवार को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन स्कीम के तहत राशन दे दिया जाता तो बच्ची को 8 दिनों तक भूखा नहीं रहना पड़ता।

करीमति गांव की रहने वाली संतोषी के परिवार के पास न तो जमीन है, न कोई नौकरी और न ही कोई स्थायी आय है, जिसके कारण उसका परिवार पूर्ण रूप से नेशनल फूड सिक्यूरिटी के तहत मिलने वाले राशन पर ही निर्भर था।

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