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UP के 46 फीसदी कुपोषित बच्चों को छोड़कर, योगी सरकार मंदिरों में बांटेगी गाय के दूध का प्रसाद

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिसाब से नहीं बल्कि धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से यूपी जैसे बड़ प्रदेश को चला रही है। यही वजह है कि कानून व्यवस्था पर बुरी तरह नाकाम योगी सरकार गाय, गौमूत्र, कांवड़, गूलर के पेड़ और मंदिरों में उलझी हुई है। दरअसल सरकार की मानसिकता को भांप उनके मंत्री और अधिकारी भी उसी लाइन लेंथ पर फैसले लेना शुरू कर देते हैं।

डेयरी विकास मंत्री का सामाजिकता को दरकिनार कर धार्मिक फैसला- 

उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा में बताया है कि प्रदेश में डब्ल्यूएचओ के मानदंडों के अनुरूप प्रति हजार लोगों पर एक भी डॉक्टर नहीं है. प्रति हजार लोगों पर बमुश्किल 0.63 सरकारी और निजी डॉक्टर हैं. इसके अलावा राज्य में प्रति एक हजार लोगों के लिए केवल अस्पताल में 1.5 बेड है.

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एक तरफ सरकार विधानसभा में यह बता रही थी कि उसके पास लोगों को इलाज मुहैया कराने लायक भी संसाधन भी नहीं है, उसी समय राज्य के दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के धार्मिक स्थलों पर अगली नवरात्रि से गाय के दूध से बनी मिठाइयों का प्रसाद उपलब्ध कराने पर विचार कर रही है.

चौधरी ने समाचार एजेंसी भाषा से कहा, ‘गाय के दूध को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रदेश सरकार गाय के दूध से बनी मिठाइयां मथुरा, अयोध्या, विंध्याचल और काशी जैसे धार्मिक स्थलों पर प्रसाद के रूप में उपलब्ध कराने की योजना बना रही है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो श्रद्धालुओं को गाय के दूध से बनी मिठाइयों का प्रसाद उपलब्ध होगा.

प्रसाद बांंटने से पहले कुपोषित बच्चों को दूध तो पिला तो- 

सरकार की प्रसाद बांटने की इस योजना को ध्यान में रखते हुए इन आंकड़ों पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि हाल ही मेें आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पूरे देश में टॉप पर है. बिहार के बाद सबसे ज़्यादा ठिगने बच्चे उत्तर प्रदेश में ही हैं.

उत्तर प्रदेश में पांच साल तक के 46.3 फीसदी बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं. कुपोषण का एक दूसरा प्रकार उम्र के हिसाब से वजन न बढ़ना है, इसमें भी उत्तर प्रदेश के 39.5 प्रतिशत बच्चे सामने आए हैं, जबकि भारत में अभी 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं. यानी उत्तर प्रदेश में स्थिति राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है.

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46 फीसदी बच्चे कुपोषित- 

स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर कराए जाने वाले इस स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार यूपी में 0 से 5 साल तक की आयु वर्ग के 46.3 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. बिहार में 48.3 प्रतिशत, जबकि यूपी में 39.5 प्रतिशत बच्चे अपनी आयु के हिसाब से कम वजन के हैं.

पिछले वर्ष आई स्टेट न्यूट्रीशन मिशन-2014 की रिपोर्ट का कहना था कि ‘उत्तर प्रदेश में हर रोज 650 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हो रही है. 50 फीसदी माताएं खून की कमी से जूझ रही हैं. सरकारी आंकड़ों से इतर बात करें तो साल में तीन लाख से भी ज्यादा बच्चों की मौत हर साल कुपोषण से होती है. प्रदेश में 12 लाख 60 हजार बच्चे अति कुपोषित हैं.’

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मंत्री जी की प्राथमिकता- 

डेयरी विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने कहना है कि उनका विभाग नवरात्रि से बाजार में गाय के दूध से बने विभिन्न उत्पाद पेश करने की योजना बना रहा है. उन्होंने बताया कि इस समय गाय का दूध 22 रुपये लीटर मिलता है जबकि भैंस का दूध 35 रुपये लीटर है. प्रदेश सरकार गाय का दूध 42 रुपये लीटर बेचे जाने की दिशा में काम कर रही है. तभी गायों की सही देखभाल होगी और उन्हें कोई आवारा नहीं छोड़ेगा.

देश के सामान्य किसान, पशुपालक और ग्रामीण जनता जो वास्तव में पशुपालन में लगी है, उसके लिए बेहतर स्थितियां उत्पन्न करने की बजाय सरकार अगर खुद ही मंदिर में प्रसाद बांटेगी तो इससे गाय या किसान की स्थिति में क्या फर्क पड़ेगा, यह रहस्य ही है.

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सदन में स्वास्थ्य मंत्री के आंकड़ें-

स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने विधानसभा में कहा, डब्ल्यूएचओ के मानदंडों के अनुरूप इस समय प्रति 1000 लोगों पर एक डाक्टर भी नहीं है. सिंह ने बजट पर चर्चा के दौरान हस्तक्षेप करते हुए कहा कि इसके अलावा राज्य में प्रति एक हजार लोगों के लिए केवल अस्पताल में 1.5 बेड है.

नेशनल जनमत के सवाल- 

सबसे अधिक कुपोषण वाले राज्य की अपने 46 प्रतिशत कुपोषित बच्चों के बारे में क्या योजना है? मंदिर में गाय के दूध का बना प्रसाद बांटने से इन बच्चों को किस तरह का स्वास्थ्य लाभ मिलेगा? प्रदेश के संसाधन को सरकार इन बच्चों पर खर्च करने की जगह प्रसाद बांटने पर क्यों बर्बाद करना चाहती है?

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न्यूज वेबसाइट THE WIRE से साभार…..

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