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UPPSC की सीबीआई जांच में सामने आ जाएगा 86 में से 54 यादव एसडीएम का झूठ

लखनऊ। नेशनल जनमत ब्यूरो 

आखिरकार उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पिछड़ी जाति के छात्रों की मांग के आगे झुकते हुए उ.प्र. लोक सेवा आयोग में सपा सरकार के समय हुई परीक्षाओं की सीबीआई जांच का आदेश देने का मन बना लिया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जल्द ही कैबिनेट की बैठक में इस फैसले पर निर्णय ले लिया जाएगा.

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मीडिया के दिमाग की उपज थी 86 में से 54 यादवों का एसडीएम बनना- 

दरअसल कुछ कॉरपोरेट मीडिया के जातिवादियों ने अखिलेश यादव की सरकार पर आरोप लगाया था कि उनके कार्यकाल में पीसीएस की परीक्षा में 86 में 54 यादव जाति के अभ्यार्थी एसडीएम पद पर चयनित हो गए है.  बाद में जब सच्चाई सामने आई तो ये पता लगा कि अखिलेश यादव के पूरे 5 साल के कार्यकाल को मिलाकर भी यादव जाति के 54 लोग एसडीएम नहीं बने हैं.

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सिर्फ 5 यादव हुए थे चयनित- 

2012 की जिस पीसीएस परीक्षा को लेकर ये शोर मचाया गया था. उसकी सच्चाई ये है कि इस परीक्षा में कुल 379 पद थे. जिसमें से सिर्फ 30 पद ही एसडीएम पद के लिए स्वीकृत थे.  इन 30 पदों पर यादव जाति के सिर्फ 5 उम्मीदवार ही चयनित हुए थे.

इससे साफ हो गया कि अखिलेश सरकार के खिलाफ अन्य पिछड़ी जातियों को भड़काने के लिए इंडिया टुडे और आजतक इस खबर को जोर शोर से उठाया था.

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अन्य ओबीसी के उम्मीदवारों को बता दिया यादव-

दरअसल, ओबीसी समुदाय हमेशा से यूपी लोकसेवा आयोग पर ये आरोप लगाता रहा है कि इस समुदाय के लोगों को इंटरव्यू में कम अंक देकर भेदभाव किया जाता है. इसलिए लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव ने पहली बार इंटरव्यू को पारदर्शी बनाते हुए अभ्यर्थी का नाम और जाति इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों को न पता चले ये व्यवस्था कर दी.  ताकि धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव को रोका जा सके.

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यही कारण है कि ये व्यवस्था आते ही कुछ योग्य पिछड़ी जाति के लोगों को इंटरव्यू में भी अधिक नम्बर मिलने लगे. ऐसा पहली बार था कि कुछ संख्या में दलित और पिछड़ी जातियों के अभ्यर्थी भी जनरल सीट पर चयनित हुए. इस बात से चिंतित होकर ही मीडिया समूहों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ अन्य ओबीसी जातियों को भड़काने के लिए पटेल, मौर्या, और विश्वकर्मा जैसी जातियों के उन अभ्यार्थियों को भी यादव बता दिया जिन्हें इंटरव्यू में अधिक अंक दिए गए थे.

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वोट के लालच में अखिलेश सरकार ने छुपाई सच्चाई-

इस खबर के फैलते ही अखिलेश सरकार पर यादववादी होने का आरोप लगने लगा. इन आरोपों का पर्दाफाश करने वजाय सपा के रणनीतिकारों ने चुप्पी साधे रहना ही बेहतर समझा ताकि उनका वोट बैंक प्रभावित न हो.

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