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क्या जस्टिस जोसेफ से उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के खिलाफ फैसला देने का बदला ले रही है मोदी सरकार ?

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

भारतीय जनता पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने बीजेपी को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। अब पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म सा है, सिर्फ इस जोड़ी का साम्राज्य चलता है।

पार्टी के अंदर लोकतंत्र खत्म करने वाली इस जोड़ी ने जैसी ही देश की सत्ता संभाली यहां भी तानाशाही शुरू कर दी। केन्द्र सरकार पर नोटबंदी और जीएसटी लगाने जैसे कई फैसलों पर पहले भी सवाल उठाए जा चुके हैं। अब केन्द्र सरकार पर जस्टिस जोसेफ ने अप्रत्यक्ष रूप से मनमानी का आरोप लगाया है।

कॉलेजियम के सदस्य न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कहा कि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब कॉलेजियम की सिफ़ारिश वाले नामों को केंद्र द्वारा वापस भेजा गया हो. इसलिए मामले पर और अधिक चर्चा किए जाने की ज़रूरत है.

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘चीज़ें जो नहीं होनी चाहिए थीं, वे हुईं… यह आम धारणा है.’

जोसेफ ने कहा कि कोलेजियम द्वारा भेजा गया नाम संपादित किया गया हो और कोई नाराज हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

गौरतलब है कि जस्टिस जोसेफ जुलाई 2014 से उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं। उन्हें 14 अक्तूबर , 2004 को केरल हाईकोर्ट में स्थायी जस्टिस नियुक्त किया गया था और उन्होंने 31 जुलाई , 2014 को उत्तराखंड हाईकोर्ट का प्रभार संभाला था। इस साल जून में वह साठ साल के हो जाएंगे।

अधिवक्ता को बनाया जस्टिस तो ठुकराया- 

मालूम हो कि केंद्र की मोदी सरकार ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ को पदोन्नति देकर सुप्रीम कोर्ट जज संबंधी शीर्ष अदालत के कॉलेजियम की सिफारिश बीते 26 अप्रैल को लौटा दी थी.

इसी दिन वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. कॉलेजियम ने 10 जनवरी को एक प्रस्ताव में जस्टिस जोसेफ और इंदु मल्होत्रा को शीर्ष अदालत में न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफ़ारिश की थी.

 

हरीश रावत सरकार को बहाल कर दिया है-  

जस्टिस जोसेफ का नाम उस समय सुर्ख़ियों में आया जब उनकी अध्यक्षता वाली उत्तराखंड उच्च न्यायालय की पीठ ने अप्रैल 2016 के फैसले में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अधिसूचना रद्द करने के साथ ही हरीश रावत सरकार को बहाल कर दिया था.

पांच सदस्यीय कॉलेजियम में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल हैं.

सरकार के इस क़दम पर कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए कहा था कि क्या उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के ख़िलाफ़ फ़ैसले की वजह से उनके नाम को मंज़ूरी नहीं दी गई.

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