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जन्मजात कमजोरी को ताकत बनाने वाले ‘गूंगे पहलवान’ वीरेन्दर यादव, सुशील कुमार भी जिसे कभी नहीं हरा पाए

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

गूंगा पहलवान के नाम से मशहूर वीरेंदर सिंह यादव ने अपनी कामयाबियों से अच्छे-अच्छे पहलवानों के पसीने छुड़ा दिए हैं। मूक और बधिर होने के बावजूद उन्होंने कभी भी इस कमी को अपने सपनों की उड़ान में आड़े आने नहीं दिया। बल्कि इस कमजोरी को अपनी कुश्ती की ताकत बना लिया। इसी काबिलियत की बदौलत, कुश्ती की दांव-पेंच में महारत से दंगल में कई बड़े-बड़े पहलवानों को चित कर भारत को कई पदक दिलवाए हैं इस गूंगे पहलवान ने।

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वीरेन्दर सिंह यादव वो नाम है जिसने कई रिकार्ड अपने नाम किये। दुनिया-भर में अपनी पहलवानी का लोहा मनवाया। मेहनत, जोश और लगन से खूब नाम कमाया है। साबित किया कि अगर इंसान के हौसले बुलंद है और उसमें कुछ बड़ा हासिल करने का जज्बा है तो अपंगता कामयाबी को रोक नहीं सकती

गांव के लोग गूंगा कहते थे- 

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वीरेंदर का जन्म हरियाणा के झज्जर जिले के सासरोली गांव में हुआ। वीरेंदर बचपन से न सुन सकते थे और न ही बोल नहीं सकते थे। आस-पड़ोस के लोग उन्हें ‘गूंगा’ बुलाते थे और धीरे-धीरे यही शब्द उनकी पहचान बन गया। वीरेंदर के गांव के लोग मूक और बधिर लोगों को ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे और ये मानते थे इन लोगों का कोई भविष्य नहीं होता। वीरेंदर से भी किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। लेकिन, जैसे ही वीरेंदर अपने गाँव से दिल्ली गए उनकी किस्मत ने भी करवट ली।

दिल्ली पहुंचे कैसे ?

दिल्ली जाने के पीछे भी एक घटना थी। बचपन में वीरेंदर के पैर में दाद हुई । उनके एक रिश्तेदार इलाज के लिए वीरेंदर को अपने साथ दिल्ली ले गए। वीरेंदर काफी समय दिल्ली में रहे और इसी दौरान वे छत्रसाल अखाड़ा जाने लगे। छत्रसाल अखाड़ा भारत-भर में काफी मशहूर है और यहां से कई चैंपियन पहलवान निकले हैं।

छत्रसाल अखाड़े में आते-जाते वीरेंदर की कुश्ती में दिलचस्पी लगातार बढ़ती गयी। और इसी दिलचस्पी के चलते वो अखाड़े में कूद पड़े और कुश्ती की शुरुआत हो गयी। वैसे तो उन्हें पहलवानी का शौक अपने गाँव के घर के पास वाले अखाड़े से लगा जहां उनके पिता अजित सिंह भी पहलवानी करते थे, लेकिन छत्रसाल अखाड़े में उनका शौक परवान चढ़ा था।

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छत्रसाल अखाड़े ने बदल दी जिंदगी- 

अखाड़े के कोच की देखरेख में ही वीरेंदर ने पढ़ाई की। उन्होंने कोच के प्रोत्साहन से दसवीं की परीक्षा भी पास कर ली और फिर अखाड़े में ज्यादा समय देने लगे। वीरेंदर ने दंगल में जी-जान लगाकर कुश्ती के दांव पेंच सीखे। उन्होंने अब ठान लिया था कि वे पहलवान ही बनेंगे। लेकिन , परिवारवाले वीरेंदर के इस फैसले से नाराज़ हो गए। वे वीरेंदर के अखाड़ा जाने और पहलवान बनने के खिलाफ थे।

परिवार वाले मानते थे कि पहलवान बनकर वीरेंदर को कुछ भी नहीं मिलेगा। सिर्फ समय बर्बाद होगा। परिवारवालों को लगता था कि वीरेंदर भी अपने पिता की ही तरह बनेंगे। वीरेंदर के पिता भी एक पहलवान थे और उन्हें कुश्ती से कुछ नहीं मिला था।

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वीरेंदर को खुद पर यकीन था- 

वीरेंदर के हौसले बुलंद थे। उनमें जोश था। सपने उड़ान भर रहे थे। भविष्य उज्जवल नज़र आ रहा था। उन्हें भरोसा था कि वो चैंपियन पहलवान बनेंगे। दंगल में प्रतिद्वंद्वियों को पटकनी देंगे और अपनी किस्मत भी बदल डालेंगे।

वीरेंदर के जोश और हौसलों के सामने परिवारवालों को झुकना पड़ा। इसके बाद वीरेंदर ने अपनी पूरी ताकत अखाड़े में झोंक दी।  शुरुआत में अभ्यास के दौरान कोच को उन्हें समझाने में कई सारी दिक्कतें पेश आती थीं, लेकिन धीरे-धीरे वीरेंदर सब कुछ समझने लगे।

2002 से दंगल लड़ने की शुरूआत की बन गए गूंगा पहलवान- 

साल 2001 में वीरेंदर ने दंगल लड़ना शुरू किया। हर कुश्ती में वे प्रतिद्वंद्वी को पटकनी देते। पटकनी देने का सिलसिला जारी रहा और वे लगातार आगे बढ़ते चले गए।

धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी। देश-भर में नाम भी होने लगा। लोग उन्हें “गूंगा पहलवान” के नाम से जानने-पहचाने लगे। देश के दंगल में शोहरत हासिल करने के बाद वीरेंदर ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेना शुरू किया। वीरेंदर ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी अपना लोहा मनवाया। कई बड़े पहलवानों को दंगल में मात दी।

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सफलता का सफर- 

2005 में मेलबर्न में हुए डेफलिम्पिक्स में भारत का पहला और एकमात्र गोल्ड मेडल।

2008 वर्ल्ड डेफ रेस्लिंग में रजत पदक और

2009 ताइपेई डेफलिम्पिक्स में कांस्य पदक,

2012 की वर्ल्ड डेफ रेस्लिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता।

2013 में बुल्गारिया में हुए डेफलिम्पिक्स में उन्होंने दोबारा स्वर्ण पदक जीता।

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हरियाणा का मशहूर नौ सेरवें खिताब वीरेन्दर के नाम- 

वीरेंदर को ‘नौ सेरवें’ के खिताब से भी नवाज़ा जा चुका है। यह खिताब उन पहलवानों को मिलता है, जो लगातार नौ रविवार तक सभी दंगल जीतते हैं। 2009 में वीरेंदर ने ये कामयाबी हासिल की थी।

सुशील कुमार कभी नहीं हरा पाए वीरेंदर को- 

ओलिंपिक पदक विजेता सुशील कुमार के ओलंपिक अभियान में वीरेंदर ने काफी मदद की है। सुशील भी छत्रसाल अखाड़े में ही अभ्यास करते हैं और यहीं वीरेंदर ने उनकी हर मुमकिन मदद की।

फेमस रेसलर सुशील कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मैं वीरेंदर से पांच बार भिड़ा, पर हरा नहीं पाया सभी मैच ड्रॉ ही रहे।
बता दें कि वीरेंद्र के कारण ही भारत के लिए डीफगेम्स ने दरवाज़े खोल दिए। वीरेंद्र पर एक “गूंगा पहलवान” नाम से छोटी फिल्म भी बनाई गई है।

अपनी काबिलियत और दांव-पेच से वीरेंदर कईयों का दिल जीत चुके हैं। कुश्ती के महारथी गुरु सतपाल और कोच रामफल मान भी उनके मुरीद हैं। वीरेंदर के चाहने वाले अब दुनिया-भर में हैं।

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गूंगा पहलवान फिल्म बन चुकी है- 

वीरेंदर की कामयाबी की कहानी से कई लोग काफी प्रभावित हैं। तीन युवकों – विवेक चौधरी, मीत जानी और प्रतीक गुप्ता ने उनके संघर्ष और कामयाबियों पर ‘गूंगा पहलवान’ के नाम से डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनायी है ।

लेकिन, वीरेंदर एक बात से बहुत दुखी हैं। उनका मानना है कि सरकारों से उन्हें उतनी मदद नहीं मिली जितनी की मिलनी चाहिए थी। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पतक जीतने पर लोग सम्मान और राशि सामान्य पहलवानों और दूसरे खिलाड़ियों को दी जाती है वो मूक-बधिर या फिर अन्य विकलांग खिलाड़ियों को नहीं दी जाती। वीरेंदर अपने जैसे खिलाड़ियों को न्याय दिलवाने के लिए संघर्ष भी कर रहे हैं।

 

 

 

 

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