You are here

हमेशा ऐसी नहीं रही ठाकुर सियासत, वीपी सिंह-अर्जुन सिंह को मसीहा मानते हैं वंचित

नई दिल्ली। सोबरन कबीर यादव

इस समय चारों तरफ सहारनपुर हिंसा की चर्चा है. दलितों और ठाकुरों के बीच बैमनस्य की खबरें भी मीडिया खूब परोस रहा है. पर एक सच्चाई ये भी है कि इस देश में जो बड़े सामाजिक बदलाव हुए हैं, जिनसे ब्राह्मणवादी सत्ता को चुनौती मिली है, उनमें ठाकुर जाति के लोगों का बहुत बड़ा हाथ रहा है. फिर चाहे वो विश्वनाथ प्रताप सिंह हों या अर्जुन सिंह. सहारनपुर हिंसा में इन्हीं उदारवादी ठाकुर नेताओं से सीख लेने की जरूरत है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को.

इसे भी पढ़ें-अनुज पटेल की पीट पीटकर हत्या, आरोपी ब्राह्मणों की गिरफ्तारी ना होने से कुर्मी समाज में उबाल

सामाजिक बदलाव के नेता रहे हैं वीपी सिंह-

सामाजिक बदलाव की चर्चा में वीपी सिंह का नाम न लिया जाए तो चर्चा अधूरी सी लगती है. ठाकुर जाति से ताल्लुक रखने वाले राजा मांडा, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ही वो नेता हैं, जिन्होंने बाबा साहब अंबेडकर को सम्मान देते हुए अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उन्हें भारत रत्न दिया. इतना ही नहीं इन्होंने ही बाबा साहब अंबेडकर का चित्र देश की संसद में लगवाया.

इसके अलावा वीपी सिंह ने ही देश की पिछड़ी जातियों को 27 फीसदी आरक्षण देकर सामाजिक बदलाव की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण काम किया. उनके इसी कदम के चलते आज भी मनुवादी मानसिकता के लोग वीपी सिंह को ही नहीं बल्कि उदार प्रवृत्ति वाले ठाकुर जाति के लोगों को भी गालियां देते हैं.

उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया था अर्जुन सिंह ने-

ठाकुर जाति के ही नेता अर्जुन सिंह की बात करें तो उन्होंने सन् 2007 में उच्च शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए रिजर्वेशन देकर सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया. 2007 से पहले तक उच्च शिक्षा में पिछड़ी जातियों की बहुत ही बदहाल स्थिति थी. ये अर्जुन सिंह की ही देन थी कि देश में, आईआईटी, और एमबीबीएस कॉलेजों सहित डीयू, जेएनयू, बीएचयू , इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसी प्रतिष्ठित वि.वि. में पिछड़ी जाति के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा हासिल करने का अवसर मिला. आज आईआईटी, आईआईएम से लेकर देश की तमाम यूनिवर्सिटियों में पिछड़ी जाति के जो भी विद्यार्थी दिखाई दे रहे हैं, उसमें अर्जुन सिंह का बहुत कुछ योगदान रहा है.

दरअसल, सहारनपुर हिंसा को लेकर समाज में ठाकुर बनाम दलित मानसिकता को गढ़ने की कोशिश की जा रही है. इसका कारण ये भी है कि वीपी सिंह ही नहीं अन्य लोग भी अब देश की सत्ता चलाने वालों की नीयत को भी समझ चुके हैं. यही कारण है कि अपनी सवर्णवाद का चोला ओढ़ाकर मलाई खा रहे लोगों से, भागीदारी की मांग को लेकर ठाकुर जाति की भी नई पौध खड़ी हो रही है.

इसे भी पढ़ें-योगीराज में ठाकुर-ब्राह्मणों का थानों पर कब्जा, दलित पिछड़ों का झुनझुना

यथास्थितिवादी ब्राह्मणवादी ताकतों के लिए यही चिंता का सबब है. उनकी चिंता ये है कि अगर तलवार, रायफल लेकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हितों के लिए समर्पित रहने वाले ठाकुर ही अगर अपनी हिस्सेदारी के लिए झगड़ने लगे तो फिर ब्राह्मणवादी व्यवस्था की रक्षा कौन करेगा. इसलिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था के संचालकों ने तेजी से बढ़ती उदारवादी ठाकुरों की पौध को सहारनपुर हिंसा की आग में झुलसा कर खत्म करने का षड़यंत्र रच दिया ताकि ठाकुरों को फिर से ब्राह्मणवादी सत्ता को बचाने के काम में लगाया जा सके.

Related posts

Share
Share