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जातिगत दंभ और सामंतवादी रौब के लिए, सहारनपुर में हो रहा है तलवार का प्रयोग !

नई दिल्ली। नीरज भाई पटेल

भारत देश योद्धाओं के शौर्य पराक्रम और वीरगाथाओं की बखान करने वाला देश रहा है. इसय समय पचास साल के उम्र का तकरीबन हर व्यक्ति अपने बचपन में देश पर मर मिटने वाले योद्धाओं की यशगाथा और उन पर बनी कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ है. इस यश, शौर्य और पराक्रम की प्रतीक होती थी तलवार जो हर योद्धा की मूर्ति में देखकर बच्चे से लेकर बड़े तक आज भी गर्व महसूस करते हैं.

हैरत की बात है कि आज ये तलवार दुश्मन के खिलाफ, किसी गरीब, मजलूम की हिफाजत में ना उठकर अपने ही गरीब-मजदूर भाईयों के रक्त की प्यासी हो गई है. सहारनपुर में घरों से निकल रही ये तलवारें सिर्फ जातिगत क्रूरता और सामंती सोच की प्रतीक बनकर उभरी हैं.

जातिगत दंभ और सामंती सोच की प्रतीक बन गई है तलवार-

सहारनपुर में लाठी-डंडों, चाकू, तमंचे को छोड़कर दलितों के खिलाफ सबसे ज्यादा इस्तेमाल तलवार का हो रहा है. चाहे वो शब्बीपुर में हुई हिंसा हो या मायावती के सहारनपुर रैली से लौटते लोगों पर हमला सबसे ज्यादा जिस शस्त्र का इस्तेमाला हुआ वो तलवार ही थी. रैली के लौटते लोगों दर्जनों लोगों को तलवारों से काटकर बुरी तरह लहुलुहान कर दिया गया. मकसद स्पष्ट है किसी को मारना या सिर्फ घायल करना ही मकसद नहीं बल्कि जातिगत दंभ, सामंतवादी सोच की और पढ़ लिखकर उठ रहे सिरों को झुकाना ही उस तलवार का प्रतीकात्मक मकसद है.

योद्धा का मतलब होता है कमजोर का साथ देने वाला जान लेने वाला नहीं-

उ.प्र. के ठाकुर बिरादरी के लोग खुद को महाराणा प्रताप की परंपरा से जोड़ते हैं.महाराणा प्रताप के बारे जो पड़ा उसमें मुख्य बात जो सबको बताई जाती है वो ये है कि अपने राज्य की प्रजा के लिए उन्होंने घास की रोटियां तक खाईं थीं. ऐसे महाराणा की जयंती की शोभायात्रा में दलितों पर हमला करना या उनके घर जला देना कौन सी राजपूत परंपरा का हिस्सा है. क्षत्रिय या राजपूत वो है जो गरीब प्रजा की रक्षा के लिए आगे आए कमजोर के लिए संहार के लिए तलवार ना उठाए.

 

 

इस स्थिति में सामाजिक न्याय के योद्दा अनूप पटेल के ये शब्दबाण मौजू हैं- 

(मुख्य फोटो के साथ इसको पढ़े और मारक हो जाएगा)

पुलिस: वीर! तलवार बांधकर कहाँ जा रहे हो?
ठाकुर: युद्ध लड़ने।

पुलिस: कैसा युद्ध, क्या बॉर्डर जा रहे हो?
ठाकुर: धर्म युद्ध, पास के गांव जा रहे हैं।

पुलिस: किनसे लड़ना है?
ठाकुर: नीच हिन्दुओ से, शास्त्रों के ख़िलाफ़ हो गये है।

पुलिस: आप मत लड़ें, कानून अपना काम करेगा।
ठाकुर: धर्मयुद्ध ईश्वरीय है, अलौकिक है। कानून का कोई बंधन नही है।

पुलिस: धर्मयुद्ध जरूरी है। आप सही कह रहे है। आपके लौटने का इंतज़ार करूँ?
ठाकुर: ठीक है बिरादर। जय भवानी।

सहारनपुर की स्थिति को देखते हुए शासन-प्रशासन के लोगों को भी अपनी जातिगत सोच से ऊपर उठकर कमजोर के पक्ष में आवाज बुलंद करनी होगी. सरकार चाहे और हिंसा पर रोक ना लगे ऐसा कभी हुआ है भला. बस जरूरत है सरकार को वोटबैंक की राजनीति और सामंतवादी सोच से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक मूल्यों की हितों की रक्षा करने की. जिस दिन ये हो गया सहारनपुर ही नहीं प्रदेश में कहीं भी जातिगत दंगे नहीं होंगे.

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