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विश्व रेडियोग्राफी डे विशेष- भारत में डार्क रूम एक्स-रे से आधुनिक सीटी स्कैन तक का सफर

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

आज हम बीमारी का पता लगाने के लिए जिस आधुनिकतम तकनीकों का सहारा ले रहे हैं उसके अविष्कार का श्रेय विलियम सी रोन्टजन को जाता है। जिन्होंने 8 नवंबर 1895 को एक्सरे की खोज की थी।

8 नवंबर को विश्व रेडियोग्राफी डे पर नेशनल जनमत ने लखनऊ स्थित संजय गाांधी स्नात्तकोत्तर आर्युविज्ञान संस्थान के सीनियर टेक्निकल ऑफीसर बीआर वर्मा और रेडियोलॉजी विभाग में प्राविधिज्ञ सरोज वर्मा से विशेष बातचीत की।

मरीज के लिए आधुनिक रेडियोग्राफी किसी संजीवनी से कम नहीं है। पहले जब एक्स-रे का प्रचलन शुरू हुआ था, उस वक्त कई जटिलताएं थी। इससे रेडियोग्राफर व खुद मरीज को भी गुजरना पड़ता था, लेकिन आधुनिक रेडियोलॉजी में क्रांतिकारी परिवर्तनों ने चिकित्सा प्रक्रिया को आसान बना दिया है।

यही वजह है कि पहले मरीज के रोग का सही पता नहीं चल पाता था। मरीज को रोग कुछ होता था और उसका उपचार कुछ और होता रहता था। इस कारण ज्यादातर मरीजों की उचित उपचार के अभाव में मृत्यु हो जाती थी।

ब्लाइंड थी पुरानी रेडियोलॉजी- 

एसटीओ बीआर वर्मा बताते हैं कि पुरानी रेडियोलॉजी पूरी तरह से ब्लाइंड थी। इसके लिए डार्क रूम की जरूरत थी। एक्स-रे को डार्क रूम में विकसित करना पड़ता था। अगर एक्स-रे एक बार में ठीक न आए तो मरीज को फिर से बुलाकर एक्स-रे करना पड़ता था।

इस पूरी प्रक्रिया में मरीज का समय भी अधिक लगता था और बीमारी का पता भी देरी से लगता था। अब कंप्यूटराइज्ड सिस्टम है। इसे सीआरएस (कंप्यूटर रेडियोलॉजी सिस्टम) कहते हैं। यह दस व 15 साल में विकसित हुई है। इससे कंप्यूटर में ही एक्स-रे आता है और डार्क रूम का झंझट खत्म हो गया है।

सीआरएस के बाद डीआरएस सिस्टम- 

कंप्यूटर के बाद डीआरएस (डिजिटलाइज्ड रेडियोग्राफी सिस्टम) आया है। इसमें साथ-साथ ही फोटो आ जाती है। इस प्रक्रिया से रिपीट का मतलब खत्म हो रहा है। जिस रिपोर्ट को लेने में पहले एक से दो दिन लगता था, वह रिपोर्ट साथ-साथ ही मिल रही है।

इसका रिकॉर्ड ऑनलाइन हर जगह उपलब्ध है। इसके साथ ही सीएआरएम सिस्टम के तहत भी रेडियोग्राफी हो रही है।

क्या है सीएआरएम तकनीक- 

पहले जब सर्जन मरीज को ऑपरेट करते थे तो पहले पता नहीं चलता था कि कहां पर समस्या है और कौन से हिस्से की सर्जरी होनी है, लेकिन सीआर्म सिस्टम से सर्जन जब ऑपरेट करता है तब एक कमरे में रखे मॉनीटर पर दिखता रहता है कि सर्जन लक्ष्य से भटका तो नहीं है।

अब सीआर्म सिस्टम में ऑपरेशन होने के साथ-साथ ही मरीज के शरीर के भीतर के भाग की सारी तस्वीर व वीडियो दिखते रहते है। इससे न केवल मरीज व चिकित्सक को लाभ हुआ है, बल्कि कमरे में जब मरीज का ऑपरेशन चल रहा होता है तो स्टूडेंट को मॉनीटर के माध्यम से सारी व्यवस्था व पढ़ाई करवाई जाती है।

आज तकनीक और विकसित हुई और भारत में थ्रीडी एक्स-रे आ गया है। इसे सीटी स्कैन कहते हैं। जहां जैसे देखना चाहते हैं, उसे देख सकते हैं। पहले उपचार में कमी रहती थी, लेकिन आज सीटी स्कैन, एमआरआइ व डिजिटलाइज्ड रेडियोग्राफी मरीज व चिकित्सा के क्षेत्र के लिए संजीवनी बन गई है।

सरोज वर्मा अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं कि सिटी स्कैन के खतरनाक विकिरण परेशानी का सबब बने सकते हैं। मरीजों को भी कई जरूरी बातों का ध्यान रखना होगा। जो इस प्रकार हैं-

1. डॉक्टर सिटी स्कैन के लिए लिखे तो पूछे कि क्या एक्सरे से काम चल सकता है।

2. छाती के एक्स-रे के समय 0.1 मिली सीर्वट रेडिएशन का डोज जबकि सिटी स्कैन में 8 मिली सीर्वट रेडिएशन का डोज शरीर में जाता है।

3. एक्स-रे रूम में जाएं तो लेड एप्रन जरूर पहनें। यदि लेड एप्रन नहीं है तो वहां से एक्सरे या सिटी स्कैन न कराएं।

4. जब किसी प्रेग्नेंट लेडी का एक्सरे और सिटी स्कैन हो रहा हो तो उसे इस बारे में जरूर बताएं।

5. एक्स-रे रूम में सिर्फ मरीज होना चाहिए।

6. यदि साथ में कोई अटेंडेंट जाता है तो उसे लेड एप्रन पहनना चाहिए।

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