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जानिए क्या यादव वाकई जातिवादी लोग हैं और सिर्फ यादवों को ही अपना नेता मानते हैं?

नई दिल्ली । नेशनल जनमत ब्यूरो।

मनुवादियों का प्रचार तंत्र कितना प्रभावशाली है,  इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ये पूरी की पूरी जाति को ही जातिवादी तक कह डालते हैं औऱ समाज के एक बड़े हिस्से में स्वीकृति भी बना लेते हैं.

मनुवादियों के प्रचार तंत्र की ताकत को समझने की कोशिश करते हैं. मनुवादियों के अनुसार यादव वर्ग जातिवादी है. पढ़िए  सामाजिक चिंतक रंजन यादव का लेख जो आपको बताएगा कि यादव कितने जातिवादी होते हैं-

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क्या जयप्रकाश नारायण यादव थे. जो यादव उनके पीछे – पीछे चल पड़े..

जब देश में इमरजेंसी लगी थी तो बिहार में बड़े पैमाने पर लोग जेल गए हुए थे . इसी आन्दोलन के दौरान सम्पूर्ण क्रांति का उद्घोष जय प्रकाश नारायण द्वारा होता है जिसे तत्कालीन रूप से सरकार के विरोधी सभी लोगो ने आहुति दी . इस दौरान यादवो ने जी जान से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व को स्वीकार किया. क्या जयप्रकाश नारायण यादव थे ?

क्या किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह यादव थे- 

चौधरी चरण सिंह के किसान आन्दोलन ने देश की किसान जातियों को जगा दिया था. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकली यह जनक्रांति इटावा ,संभल ,मैनपुरी ,गोरखपुर से होते हुए पटना ,मधेपुरा में पाँव पसारती है . इस आन्दोलन में सम्पूर्ण भारत का यादव वर्ग अपना नेता चरण सिंह को ना सिर्फ मानती है बल्कि उनके विचार -सिद्धांतो को आगे भी बढ़ाती है. पटना मनेर में चरण सिंह के सुझाए उम्मीदवार को लोग आँख मूंदकर वोट दे दिया करते थे पर यादवों को जातिवादी कहने वालों के लिए शायद चरण सिंह यादव ही थे.

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ताऊ देवी लाल को भी यादवों ने अपना नेता माना- 

हरियाणा के ताऊ देवी लाल के सामाजिक चिंतन को यादव वर्ग ने अपने राजनीतिक सामजिक चिंतन से जोड़ा. आज भी यादव जाति के लोगों के घरो में देवी लाल ,चरण सिंह के फोटो देखने को मिल जाते है . मनुवादियों के लिए शायद देवी लाल भी यादव थे .

मंडल की लड़ाई में वीपी सिंह का खुलकर साथ गिया- 

मंडल -कमंडल कि लड़ाई में यादव वर्ग ने जी जान से अपनी भागीदारी सुनिश्चित की . विश्वनाथ प्रताप सिंह को इस वर्ग ने ना सिर्फ अपना नेता माना बल्कि वीपी के विचार सिद्धांत को गांव -गांव , गली -गली पहुंचाने का काम भी किया . विरोधी लोग जब वीपी सिंह को आरक्षण सम्बंधित मुद्दे पर कुछ भी बोलते है तो यादव वर्ग ही प्रतिकार करने में सबसे आगे रहता है .

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मनुवादियों की नजर में नीतीश कुमार भी शायद यादव हैं- 

बिहार में लालू यादव की आरजेडी की नीतीश की जेडीयू से भी ज्यादा सीटें आईं इसके बाद भी लालू यादव अपने वायदे पर कायम रहे. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री सरकार बहुत कायदे और सामंजस्य के साथ चल रही है. यादवों को जातिवादी कहने वालों की नजर में नीतीश कुमार भी शायद यादव ही होंगे.

मनुवादियों की नजर में कर्पूरी ठाकुर, लोहिया और भोला पासवान भी यादव थे- 

बिहार के पहले पिछड़े मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी -ठाकुर, भोला पासवान और लोहिया के नेतृत्व को यादव वर्ग ने सहर्ष स्वीकार किया और कंधे से कंधा मिलाकर सामजिक क्रांति के आन्दोलन का सृजन किया. अब ये लोग यादव तो नहीं थे. अचरज होता है .समाज के सबसे बड़े सोशलिस्ट वर्ग को जातिवादी के तमगे में बांध दिया जाता है.

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जो भी मनुवादियों के प्रभुत्व को चुनौती देता है, मनुवादी अपने प्रचार तंत्र से उस जाति को जातिवादी बना देते है- 

मनुवादियों के प्रचार तंत्र की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस जाति ने भी मनुवादियों की सत्ता को चुनौती दी मनुवादियों ने अपने प्रचार तंत्र की ताकत के बल पर उस जाति को ही जातिवादी कह कर बदनाम कर दिया.

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उदाहारण के लिए यूपी औऱ बिहार के यादव मनुवादियों के लिए जातिवादी हैं. गुजरात , यूपी और बिहार के पटेल भी मनुवादियों के लिए जातिवादी होते जा रहे हैं. दिल्ली , राजस्थान, हरियाणा, और पंजाब के जाट मनुवादियों के लिए जातिवादी हैं. दिल्ली, राजस्थान और गुजरात के गूजर भी मनुवादियों के लिए जातिवादी है. राजस्थान के मीणा भी मनुवादियों के लिए जातिवादी हैं. और लगभग सारे उत्तर भारत में फैले जाटव बिरादरी के लोग भी मनुवादियों के लिए जातिवादी है. महाराष्ट्र के मराठा भी मनुवादियों के लिए जातिवादी हैं.

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इस देश की सत्ता में जो भी जाति मनुवादियों से अपनी हिस्सेदारी मांगती है मनुवादी अपने प्रचार तंत्र की ताकत से उस जाति को ही बदनाम करके जातिवादी बना डालते हैं.

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