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अब बिजली विभाग में निजीकरण करके आरक्षण खात्मे की ओर बढ़ी योगी सरकार, कर्मचारी आंदोलनरत

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो।

रेलवे से लेकर हवाई यात्रा, चिकित्सा से लेकर शिक्षा देश की हर जरूर सेवा का निजीकरण करने पर आमादा भारतीय जनता पार्टी की सरकार अब मूलभूत जरूरतों में शामिल बिजली विभाग का निजीकरण करने को तैयार है। योगी सरकार ने गुपचुप तरीके से कैबिनेट में निर्णय भी पास कर दिया है।

बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जयपुर में पिछले महीने कहा था कि आरक्षण बरकरार तो रहेगा लेकिन हम उसे इतना कमजोर कर देंगे कि उसके रहने ना रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। जरूरी सेवाओं का निजीकरण करके सरकार इस बात को सच साबित करती दिख रही है।

27 मार्च से पूरे प्रदेश में होगा आंदोलन- 

वाराणसी, लखनऊ, गोरखपुर, मेरठ, मुरादाबाद जैसे पांच जिलों की बिजली व्यवस्था को निजी हाथों में देने के फैसले पर पावर कॉरपोरेशन के सभी संगठनों ने एक स्वर में विरोध शुरू कर दिया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति समेत विभिन्न संगठन लगातार धरना प्रदर्शन करके विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है जिस दिन निजीकरण को लेकर टेंडर होगा उसी दिन प्रदेश के लाखों कर्मचारी तत्काल हड़ताल पर चले जाएंगे। राज्य विद्युत परिषद जूनियर इंजिनियर संगठन ने भी हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है।

पिछड़े-दलितों को रोकने की साजिश- 

उत्तर प्रदेश पावर ऑफीसर्स एसोसिएशन के कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार वंचित तबके को किसी भी तरह से नौकरियों में आने से रोकना चाहती है इसलिए हर जरूरी सेवा का निजीकरण करने पर तुली है।

श्री वर्मा ने कहा कि जब पावर कारपोरेशन ने करोड़ों रूपये इंफ्रास्ट्रक्चर में खर्च कर दिए तो सरकार अपने उद्योगपति मित्रों अडानी-अंबानी को बिजली विभाग बेचने का आदेश दे रही है। इसका हर कीमत पर विरोध किया जाएगा। इसके लिए लखनऊ में सोमवार से और 27 मार्च से पूरे प्रदेश में आंदोलन का बिगुल फूंका जाएगा।

संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि संगठन सीएम योगी आदित्यनाथ से इस फैसले को वापस लेने की मांग करेगा। मांगों को न मानने पर प्रदेश के सवा लाख से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी आंदोलन करने को विवश हो जाएंगे।

जेई एसोसिएशन भी विरोध में- 

जेई एसोसिएशन के अध्यक्ष जीबी पटेल ने कहा कि आगरा और कानपुर को एकसाथ निजीकरण करने की बात थी। जिसमें आगरा का निजीकरण पहले ही कर दिया गया और कानपुर का नहीं हुआ।

आज इंजीनियरों और कर्मचारियों की मेहनत से कानपुर का थ्रू रेट (एक यूनिट बिजली खर्च के बदलने मिलने वाली राशि) 6.25 रुपये से ज्यादा है। वहीं, आगरा का थ्रू रेट निजीकरण के बाद 3.25 रुपये ही रह गया है।

इसमें करीब एक यूनिट बिजली में तीन रुपये का अंतर आ रहा है। उन्होंने कहा कि अगर निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया गया तो संगठन आंदोलन करने को बाध्य होगा।

निजीकरण का नुकसान- 

– बिजली सस्ती नहीं होगी और थ्रू रेट में कम बढ़ोतरी होगी

– निजीकरण के बाद सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम होगी

– निजीकरण होने से नियुक्ति में आरक्षण खत्म हो जाएगा.

– रिटायर होने के बाद धीरे-धीरे रोजगार के अवसर कम होंगे।

– कर्मचारियों का शोषण बढ़ेगा।

– पांच से सात हजार रुपये के वेतन पर दस घंटे से ज्यादा काम लिया जाएगा।

– पैसा पावर कॉरपोरेशन का खर्च होगा और मुनाफा निजी कम्पनियों के हाथ में जाएगा।

दूसरी ओर ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का कहना है कि यह व्यवस्था जनता की सुविधा के लिए लागू की जा रही है। सरकार का यह भी दावा है कि वितरण व्यवस्था निजी कंपनियों के पास जाने से शिकायत करने पर तत्काल कर्मचारी पहुंच सकेंगे। बिजली चोरी कम होगी, जर्जर तार बदले जा सकेंगे, कटिया नहीं लगाई जा सकेगी।

सपा कार्यकर्ता करेंगे विरोध- 

सरकारी संगठनों के बाद राजनीतिक दलों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध करना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ने नेशनल जनमत से कहा कि उनकी पार्टी निजीकरण के खिलाफ है।

इससे रोजगार कम होने के साथ ही दलितों-पिछड़ों का आरक्षण खत्म होता है और पूंजीपतियों को दखल बढ़ता है। श्री उत्तम ने कहा कि उनकी पार्टी हर कीमत पर इस निर्णय का विरोध करके इससे वापस लेने के लिए सरकार को बाध्य करेगी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शनिवार को विधानसभा के सामने योगी सरकार का पुतला फूंका। इस दौरान माकपा जिला मंत्री प्रदीप शर्मा ने कहा कि इसको लेकर पूरे प्रदेश में आंदोलन किया जाएगा।

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