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योगीराज में चल रहा है जातिवाद का नंगनाच, वकालत ना करने वाले सवर्णों को भी बना दिया सरकारी वकील

लखनऊ/नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

अखिलेश सरकार को जातिवादी कहकर और इस जातिवाद के खात्मे के नाम पर उत्तर प्रदेश में ठाकुर अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी थी बीजेपी सरकार। लेकिन इस सरकार में छुपा कर नहीं खुले तौर पर जातिवाद का नंगनाच चल रहा है। आरक्षण पर लगातार होते हमलों और सरकार की ट्रांसफर पोस्टिंग नीति से साफ है कि सरकार ओबीसी-एससी के नेताओं और लोगों को खुली चुनौती दे रही है कि अब हम ही सरकार हैं, जो बिगाड़ना हो बिगाड़ लो।

कई अधिवक्ताओं के नाम एओआर में दर्ज नहीं- 

पिछले हफ्ते जारी हुई 311 अधिवक्ताओं की सूची में 216  नाम अकेले ब्राह्मण और ठाकुर अधिवक्ताओं के हैं। उनमें भी 151 सिर्फ ब्राह्मणों के नाम हैं। अब खबर ये आ रही है कि योगी सरकार ने जिन वकीलों को सरकारी वकील का ओहदा दिया है, उनमें से कई का हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एडवोकेट ऑन रोल (एओआर) में नाम ही दर्ज नहीं है। इसलिए राज्य सरकार की ओर से नियुक्त 311 नए सरकारी वकीलों में से 12 से अधिक को शासकीय अधिवक्ता अधिष्ठान ने ज्वाइन करवाने से मना कर दिया है।

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हाईकोर्ट में किसी भी वकील के वकालत करने का प्रथम सबूत होता है कि उसका नाम एओआर सूची में दर्ज हो। इन नवनियुक्त सरकारी वकीलों में  गिरीश तिवारी, प्रवीण कुमार शुक्ला, शशि भूषण मिश्र, दिवाकर सिंह, वीरेंद्र तिवारी एवं दिलीप पाठक शामिल हैं जिनको सरकारी वकील तो बना दिया है लेकिन इनका नाम एओआर में है ही नहीं।

एओआर क्या है- 

सुप्रीम कोर्ट में किसी भी वकील को वकालत नामा फाइल करने का अधिकार तभी मिलता है जब वो एओआर यानि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड हो जाएं। इसके लिए बकायदा परीक्षा पास करनी होती है और पांच साल वकील के बतौर अनुभव दिखाना होता है। एओआर बनने के बाद ही आप सुप्रीम कोर्ट में अपने वकालत नामा पर केस फाइल कर सकते हैं।

हाईकोर्ट में एओआर का मतलब एडवोकेट ऑन रोल यानि वो ही अधिवक्ता उस हाईकोर्ट में अपने नाम से केस फाइल कर सकता है जिसका नाम उस हाईकोर्ट की एओआर सूची में लिस्टिड हो।

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एओआर में नाम ना होने का मतलब- 

एओआर में नाम ना होने का मतलब ये है जो लोग जुगाड़ से सरकारी वकील बन गए हैं। ये हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में प्रेक्टिस ही नहीं करते हैं। लेकिन उनको सरकार की तरफ से हाइकोर्ट में बात रखने के लिए सरकारी वकील बना दिया गया है।

मुख्य स्थायी अधिवक्ता रमेश पांडे का कहना है कि महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह के निर्देश पर बिना एओआर वाले सरकारी वकीलों को फिलहाल जॉइनिंग करवाने से रोक दिया गया है। लखनऊ में ऐसी चर्चा है कि बिना एओआर वाले वकीलों की संख्या 49 है।

सूची में भी खेल-  

311 वकीलों की सूची में पांच सरकारी वकीलों के नाम दो जगह लिखे हैं। इनमें अनिल कुमार चौबे, प्रत्युश त्रिपाठी, सोमेश सिंह, राजाराम पांडेय व श्याम बहादुर सिंह शामिल हैं। वहीं सूची के पेज नंबर तीन पर ब्रीफ होल्डर सिविल की श्रेणी में पांच सरकारी वकीलों के नाम गायब हैं।

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15 फीसदी सवर्णों के हिस्से में 90 फीसदी से ज्यादा सीट-

311 वकीलों को सरकारी काम काज के लिए हाईकोर्ट में सरकारी वकील के रूप में तैनाती देने में योगी सरकार ने जो लिस्ट जारी की है वह चौकाने वाली है। वैसे तो सरकार का दावा है कि पीएम मोदी की मंशा सबका साथ सबका विकास के अनुसार काम कर ही है, लेकिन 311 वकीलों की तैनाती में जो आंकड़ा है वह इसके बिलकुल उलट है और सरकार की झूठी मंशा को साबित कर रहा है।

देखिए जातिवाद का खेल-

4 मुख्य स्थाई अधिवक्ता- ब्राह्मण- 3 ओबीसी- 1

25 अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता- ब्राह्मण – 12 ठाकुर- 7

103 स्थाई अधिवक्ता – 60 ब्राह्मण- 17 ठाकुर

65 ब्रीफ होल्डर सिविल- ब्राह्मण- 8 ठाकुर

114 ब्रीफ होल्डर क्रिमिनल- ब्राह्मण, 33 ठाकुर

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311 में से अकेले 70 फीसदी ठाकुर-ब्राह्मण-

इस लिस्ट में स्थायी अधिवक्ता (उच्च न्यायालय), मुख्य स्थाई अधिवक्ता, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता और ब्रीफ होल्डर (क्रिमिनल) और ब्रीफ होल्डर सिविल के पद हैं। इसमें 311 में से अकेले 216 पद ब्राह्मण 65 पद ठाकुरों के पास हैं। यानि कि अकेले 70 फीसदी पद ठाकुर-ब्राह्मणों के पास हैं। अन्य वर्ग में 20 ओबीसी, 2 एससी और 4 मुसलमानों को इस लिस्ट में जगह दी गई है। झोली भरकर बीजेपी को वोट देने वाले कुर्मी समाज से सिर्फ 1 व्यक्ति को सरकारी वकील बनाया गया है।

 

 

 

 

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